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November 22 1. ओ पिता! तुम्हारा धन्यवाद नन्हें हाथों में कलम धरी. भाई! तेरा भी धन्यवाद आगे आगे हर बाट करी. तुम साथ रहे हर संगर में मेरे प्रिय! तेरा धन्यवाद; बेटे! तेरा अति धन्यवाद हर शाम दिवस की थकन हरी.
शिव बिना शक्ति कब पूरी है शिव का भी शक्ति सहारा है. मेरे भीतर की अमर आग को तुमने नित्य सँवारा है. अनजान सफ़र पर निकली थी विश्वास तुम्हीं से था पाया; मैं आज शिखर पर खड़ी हुई इसका कुछ श्रेय तुम्हारा है.
2. ओ पिता! तुम्हारा धन्यवाद सपनों पर पहरे बिठलाए | भाई! तेरा भी धन्यवाद तुम दूध छीन कर इठलाए || संदेहों की शरशय्या दी पतिदेव! आपका धन्यवाद ; बेटे! तुमको भी धन्यवाद आरोप-दोष चुन-चुन लाए ||
मैं आज शिखर पर खड़ी हुई इसका सब श्रेय तुम्हारा है! तुमसब के कद से बड़ी हुई इसका सब श्रेय तुम्हारा है! कलकल छलछल बहती सरिता जम गई अहल्या-शिला हुई; मन की कोमलता कड़ी हुई इसका सब श्रेय तुम्हारा है!
कब से देख रही हूँ रास्ता माँ के घर से बुलावा आएगा मैं पीहर जाऊँगी सबसे मिलूँगी बचपन से अपनी पसंद के पकवान जी भर खाऊँगी निंगोल चाक्कौबा पर्व मनाऊँगी
बरस भर से देख रही हूँ रास्ता
याद आता है बचपन बड़ी बहन इसी दिन हर बरस आती थी दूर पहाड़ी की तलहटी में खिलखिलाते गाँव से घाटी के घर में, भाभी इसी दिन हर बरस जाती थी पर्वत शिखर से बतियाते अपने पीहर
ससुराल की घाटी से
कितनी बार कहा इमा से कितनी बार कहा इपा से कितनी बार कहा तामो से
मैं इतनी दूर नहीं जाऊँगी इतनी दूर ब्याही गई तो जी नहीं पाऊँगी
पर ब्याही गई इतनी ही दूर काले कोसों कहाँ घाटी में माँ का घर कहाँ नौ पहाड़ियों के पार मेरी ससुराल
सबने यही कहा था निंगोल चाक्कौबा पर तो हर बरस आओगी ही [इस दिन मिट जाती हैं सब दूरियाँ घाटी और पहाड़ी की] सारी सुहागिनें इस दिन न्यौती जाती हैं माँ के घर
प्रेम से भोजन कराएगी माँ अपने हाथ से उपहार देगा भाई
हमारे मणिपुर में इसी तरह तो मनाते थे निंगोल चाक्कौबा पिछले बरस तक विवाहित लड़कियों [निंगोल] को घर बुलाते थे भोजन कराते थे [चाक्कौबा]
घाटी और पहाड़ी का प्यार इस तरह बढ़ता जाता था हर बरस सारा समाज मनाता था मणिपुरी बहनापे का पर्व
पर इस बार कोई बुलावा नहीं आया कोई न्यौता नहीं आया
भाई भूल गया क्या? माँ तू कैसे भूल गई दूर पहाड़ी पार ब्याही बेटी को? मैं तड़प रही हूँ यहाँ तुम वहाँ नहीं तड़प रहीं क्या?
माँ बेटी के बीच में भाई बहन के बीच में पर्वत घाटी के बीच में यह राजनीति कहाँ से आ गई अभागी???
क्यों अलगाते हो पर्वत को घाटी से भाई को बहन से माँ को बेटी से ???
मुझे मेरा पीहर लौटा दो मेरी माँ मुझे लौटा दो मेरा निंगोल चाक्कौबा लौटा दो !!!
कब से देख रही हूँ रास्ता ........
तुम तो त्रिलोक के स्वामी हो.
तुमने देवों को जीता है. सब रत्न तुम्हारे चरणों में. सब पर अधिकार तुम्हारा है. तुमने ऐरावत छीन लिया बिगडे घोड़ों को साधा है. धरती पर्वत आकाश वायु पाताल सिंधु को बाँधा है.
तुमने मुझको भी रत्न कहा . चाहा किरीट में जड़ लोगे. जीवित ज्वाला की लहरों को अपनी मुट्ठी में कर लोगे.
मुझको यह प्रभुता रास नहीं. मैं रत्न नहीं! मैं दास नहीं!
तेरा स्वभाव तो प्रभुता का . 'ना' सुनने का अभ्यास नहीं.
तेरी लोलुपता आहत हो मेरे केशों की ओर बढ़ी. तू मुझे धरा पर खींचेगा, मेरी मर्यादा नोंचेगा; था ज्ञात मुझे तू इसी तरह वश में करने की सोचेगा.
पर मेरे केश नहीं आते तेरे जैसों की मुट्ठी में. मैं तिरस्कार का कालकूट पी चुकी प्रथम ही घुट्टी में. मैं कोमल मधुमय दीपशिखा आशीष बरसने वाली हूँ. अपनी करुणा की किरणों से रसधार सरसने वाली हूँ. पर मैं ही ज्वालामुखी शिखर. मैं ही श्मसान का आर्तनाद. प्राणों में झंझावात लिए मैं प्रलय निशा का शंखनाद. तू मुझको जान नहीं पाया. कोई न अभी तक भी जाना. मैं वस्तु नहीं, जीवित प्राणी. पर तूने मुझे भोग्य माना.
बस इसीलिए तो मुझको यह संग्राम जीतना ही होगा. जो सचमुच मेरा प्रतिबल हो वह प्रणय खोजना ही होगा! August 23 जाने कैसी स्त्री थी वह
जाने कैसी स्त्री थी वह , कितनी धीर , कितनी सबल !
कैसे कहा होगा उसने माता पिता से, पीहर और ससुराल से - - नहीं ,मुझे यह विवाह स्वीकार नहीं - न, मैं नहीं मानती बालपने की शादी को - गुडिया के खेल तक की समझ न थी मुझे विवाह की समझ कैसे होती - आपका दिया यह पति मेरा पति नहीं !
कैसे टटोला होगा अपने आप को जवाब दिया होगा दुनिया को -
- बंधन है बिना प्रेम का विवाह और मुझे अस्वीकार - कोई पुरुष दीखा ही नहीं प्रेम के योग्य ; एक परमपुरुष के सिवा - वह आलोकसुंदर परमपुरुष ही मेरा प्रियतम है !
कैसे किया होगा सामना तन मन को बींधती ज़हरबुझी नज़रों का , नकारा होगा अध्यात्म का भी आकर्षण तोड़कर शृंखला की कड़ियाँ सारी भारी -
- स्त्री पुरुष में जो भेद करे वह धर्म मेरा नहीं - स्त्री जाति से जो भयभीत हो वह गुरु मेरा नहीं !
कैसे बाँटा होगा उसने अपने अस्तित्व को अपने स्वयं रचे परिवार में - किसी विधवा नौकरानी को किसी सेवक को किसी जिज्ञासु को किसी गाय, किसी गिलहरी , किसी मोरनी को !
उसने जीते जी मुक्ति अर्जित की विराटता सिरजी - कभी बदली कभी दीप कभी कीर बनकर. उसी ने दिखाया मुक्ति का मार्ग मेरी स्त्री को संपूर्ण आत्मदान के बहाने न्यस्त करके स्वयं को सर्वजन की आराधना में .
वह सच ही महादेवी थी !!
हे अग्नि!
हे अग्नि!
तुम्हें प्रणाम करते हैं हम।
बहुत क्षमता है तुममें
बड़ा ताप है -
बड़ी जीवंतता।
तुम जल में भी सुलगती हो
और वायु में भी,
भूगर्भ में भी तुम्हीं विराजमान हो
और व्यापती हो आकाश में भी तुम।
हमारे अस्तित्व में अवस्थित हो तुम
प्राण बनकर।
परमपावनी!
तुममें अनंत संभावनाएँ हैं
तुम्हीं से पवित्रता है इस जगत में।
फूँकती हो तुम सारे कलुष को,
शोधती हो फिर-फिर
हिरण्यगर्भ ज्ञान की शिखा को।
तुम ही तो जगती हो
हमारे अग्निहोत्र में
और आवाहन करते हैं तुम्हारा ही तो
संध्या के दीप की लौ में हम।
जगो, आज फिर,
खांडवप्रस्थ फैला है दूर-दूर
डँसता है प्रकाश की किरणों को,
फैलाता है अँधेरे का जाल
उगलता है भ्रम की छायाओं को।
उठो, तुम्हें करना है
छायाओं में छिपे सत्य का शोध।
तुम चिर शोधक हो, हे अग्नि!
तुम्हें प्रणाम करते हैं हम।
July 30
राधा क्या चाहे
''राधिके!'' ''हूँ?'' ''भला क्या तो है तेरे कान्हा में?'' ''पता नहीं.''
''पौरुष?'' ''होगा. बहुतों में होता है.''
''सौंदर्य?'' ''होगा. पर वह भी बहुतों में है.''
''प्रभुता?'' ''होने दो. बहुतों में रही है.''
''फिर क्यों खिंची जाती है तू बस उसी की ओर?'' ''उसे मेरी परवाह है न!''
http://streevimarsh.blogspot.com/2009/07/blog-post_17.html
July 15 
दो बेटे हैं मेरे. बहुत प्यार से धरे थे मैंने इनके नाम - बलजीत और बलजोर!
गबरू जवान निकले दोनों ही. जब जोट मिलाकर चलते, सारे गाँव की छाती पर साँप लोट जाता. मेरी छातियाँ उमग उमग पड़तीं. मैं बलि बलि जाती अपने कलेजे के टुकडों की!
वक़्त बदल गया. कलेजे के टुकडों ने कलेजे के टुकड़े कर दिए. ज़मीन का तो बँटवारा किया ही, माँ भी बाँट ली!
ज़मीन के लिए लड़े दोनों - अपने अपने पास रखने को, माँ के लिए लड़े दोनों - एक दूसरे के मत्थे मढ़ने को!
बलजोर ने बरजोरी लगवा लिया अँगूठा तो माँ उसके काम की न रही, बलजीत के भी तो किसी काम की न रही!
दोनों ने दरवाजे बंद कर लिए, मैं बाहर खड़ी तप रही हूँ भरी दुपहरी; दो जवान बेटों की माँ!
जीवन भर रोटी थेपती आई. आज भी जिसका चूल्हा झोंकूँ, रोटी दे दे ...शायद! June 16
पिता ने संडासी जैसे दृढ़ हाथों से बड़ी संडासी में पकड़ रखा है तपता हुआ लौहखंड जकड़कर.
माँ धौंक रही हवा से फुलाकर धौंकनी लगातार.
भट्टी तप रही. दुपहरी भी तप रही. तप रहे हम दोनों.
मैं और तुम आमने - सामने, तुम्हारे हाथ में घन, मेरे हाथ में भी उतना ही भारी घन.
पिता ने भरी हुंकारी. उठे दोनों घन. चक्राकार घूमे हवा में. दनादन पड़ने लगे तपते लौहखंड पर एक के बाद एक, क्रम से, दुगुने दम से.
तुम्हारी आँखें मेरी आँखों में, मेरी आँखें तुम्हारी आँखों में. त्राटक! मारणमन्त्र! सम्मोहन! लोहा पिटता रहा, कुटता रहा, ढलता रहा. साँस फूलती रही मेरी भी तुम्हारी भी.
एक गोले में घिरे हम. सब घेरकर पुकार रहे तुम्हें उकसाते हुए, मुझे शाबासी देते हुए.
घन बिजली की तरह चले. चिंगारियाँ फूटीं. साँस फूलती रही. पसीना चू पड़ा तुम्हारी झबरी मूँछों से. तरबतर हो गई मेरी छींट की कोरी अँगिया.
ढल गया लोहा. बन गया औजार. पिता ने डाल दिया पानी में बुझने को.
चिहुँक उठा सारा कबीला. न तुम हारे न मैं हारी, न तुम जीते न मैं जीती. तुम्हारा पौरुष मेरे बल से टकराकर हो गया दुगुना.
पंचों ने हमारी शादी तय कर दी है!
लोहा एक बार फिर लोहे से टकरा रहा है. आग के फूल खिल रहे हैं मेरी नज़रों में, तेरी निगाहों में.
सच में तू मेरी जोट का है ! http://streevimarsh.blogspot.com/2009/06/blog-post_14.html June 03

इतिहास हंता मैं
मैं घर से निकल आई थी तुम्हें पाने को , मैंने धरम की दीवार गिराई थी तुम्हें पाने को, अपने पिता से आँख मिलाई थी - भाई से ज़बान लड़ाई थी - तुम्हें पाने को!
माँ अपनी कोख नाखूनों से नोंचती रह गई , पिता ने जीते जी मेरा श्राद्ध कर दिया; मैंने मुड़ कर नहीं देखा. मैं अपना इतिहास जलाकर आई थी - तुम्हें पाने को!
तुमने मुझे नया नाम दिया - मैंने स्वीकार किया , तुमने मुझे नया मज़हब दिया - मैंने अंगीकार किया. वैसे ये शब्द उतने ही निरर्थक थे जितना मेरा जला हुआ अतीत. मैंने प्रतिकार नहीं किया था . तुम जैसे भी थे,जो भी थे - बेशर्त मेरे प्रेमपात्र थे. मैं भागी चली आई थी तुम्हें पाने को ;
और सो गई थी थककर चकनाचूर.
आँख खुली तो तुम्हारी दाढ़ी उग आई थी , तुम हिजाब कहकर मेरे ऊपर कफ़न डाल रहे थे.
तुम्हारी आँखों में देखा मैंने झाँककर - ये तो मेरे पिता की आँखें हैं! मैं देखती ही रह गई ; तुमने मुझे ज़िंदा कब्र में गाड़ दिया!
एक बार फिर सब कुछ जलाना होगा - मुझे खुद को पाने को!!
May 19
प्रशस्तियाँ
मैंने जब भी कुछ पाया
मर खप कर पाया
खट खट कर पाया
अग्नि की धार पर गुज़र कर पाया
पाने की खुशी
लेकिन कभी नहीं पाई
खुशी से पहले हर बार
सुनाई देती रहीं मेरी प्रशस्ति में
दुर्मुखों की फुसफुसाहटें
धोबियों की गालियाँ
और मन्थराओं की बोलियाँ
शिक्षा हो या व्यवसाय
प्रसिद्धि हो या पुरस्कार
हर बार उन्होंने यही कहा -
चर्म-मुद्रा चल गई!
[चर्म-चर्वण से परे वे कभी गए ही नहीं!]
मैंने हर दौड़ में उन्हें पीछे छोड़ा
हर मैदान में पछाड़ा,
उन्होंने मेरा पीछा नहीं छोड़ा
मैं कच्चे सूत पर चलकर भर लाई घड़ों पानी
वे किनारे पर ही ऊभ-चूभ हैं!! O
April 16
गर्भभार
सँभलकर, बहुरिया, त्रिशला देवी के सोलहों सपनों का सच तेरे गर्भ में है.
नहीं, दिव्यता का आलोक केवल तीर्थंकरों की माताओं के ही आनन पर नहीं विराजता ; हर बेटी, हर बहू जब गर्भ भार वहन करती है उतनी ही आलोकित होती है.
हिरण्यगर्भ है हर स्त्री. उसके भीतर प्रकाश उतरता है, प्रभा उभरती है, प्रभामंडल जगमगाते हैं. प्रकाश फूटता है उसी के भीतर से.
प्रकाश सोया रहता है हर लड़की के घट में, और जब वह माँ बनती है नहा उठती है अपने ही प्रकाश में, अपनी प्रभा में. अपने प्रभामंडल में.
सँभलकर, बहुरिया, तेरे अंग अंग से किरणें छलक रही हैं!
Posted to Beyond The Second Sex (स्त्रीविमर्श)
March 17
बनाया था माँ ने वह चूल्हा
चिकनी पीली मिट्टी को
कुएँ के मीठे पानी में गूँथ कर
बनाया था माँ ने वह चूल्हा
और पूरे पंद्रह दिन तक
तपाया था जेठ की धूप में
दिन - दिन भर
उस दिन
आषाढ़ का पहला दौंगड़ा गिरा,
हमारे घर का बगड़
बूँदों में नहा कर महक उठा था,
रसोई भी महक उठी थी -
नए चूल्हे पर खाना जो बन रहा था.
गाय के गोबर में
गेहूँ का भुस गूँथ कर
उपले थापती थी माँ बड़े मनोयोग से
और आषाढ़ के पहले
बिटौड़े में सजाती थी उन्हें
बड़ी सावधानी से .
बूँदाबाँदी के बीच बिटौड़े में से
बिना भिगोए उपले लाने में
जो सुख मिलता था ,
आज लॉकर से गहने लाने में भी नहीं मिलता.
सूखे उपले
भक्क से पकड़ लेते थे आग
और
उँगलियों को लपटों से बचाती माँ
गही में सेंकती थी हमारे लिए रोटी
- फूले फूले फुलके.
गेहूँ की रोटी सिंकने की गंध
बैठक तक ही नहीं , गली तक जाती थी.
हम सब खिंचे चले आते थे
रसोई की ओर.
जब महकता था बारिश में बगड़
और महमहाती थी गेहूँ की गंध से रसोई -
माँ गुनगुना उठती थी
कोई लोकगीत - पीहर की याद का.
माँ के गीतों में प्यार बहुत था
पर पीड़ा और शिकायत भी थी.
बारिश में बना रही हूँ रोटियाँ,
भीगे झोंके भीतर घुसे आते हैं.
मेरे बीरा ! इन झोंकों को रोक दे न !
बड़े बदमाश हैं ये झोंके,
कभी आग को बढ़ा देते हैं
कभी बुझा देते हैं आग को.
आग बढ़ती है
तो रोटी जलने लगती है.
तेरे बहनोई को जली रोटी पसंद नहीं रे!
रोटी को बचाती हूँ तो उँगली जल जाती है.
माँ की उँगलियाँ छालों से भर जाती थीं
पर पिताजी की रोटी पर एक भी काला निशान कभी नहीं दिखा!
माँ के गीतों में प्यार बहुत था
पर पीड़ा और शिकायत भी थी.
बारिश में बना रही हूँ रोटियाँ,
भीगे झोंके भीतर घुसे आते हैं.
मेरे बीरा ! इन झोंकों को रोक दे न !
बड़े बदमाश हैं ये झोंके ,
कभी आग को बढ़ा देते हैं
कभी बुझा देते हैं आग को.
आग बुझती है
तो रोटी फूलती नहीं
तेरा भानजा अधफूली रोटी नहीं खाता रे!
बुझी आग जलाती हूँ तो आँखें धुएँ से भर जाती हैं.
माँ की आँखों में मोतियांबिंद उतर आया
पर मेरी थाली में कभी अधफूली रोटी नहीं आई!
माँ के गीतों में प्यार बहुत था
पर पीड़ा और शिकायत भी थी.
रोटी बनाना सीखती मेरी बेटी
जब तवे पर हाथ जला लेती है,
आँखें मसलती
रसोई से निकलती है.
तो लगता है
माँ आज भी गुनगुना रही है .
मेरे बीरा ! इन झोंकों को रोक दे न!
बड़े बदमाश हैं ये झोंके,
कभी आग को बढ़ा देते हैं
कभी बुझा देते हैं आग को.
माँ के गीतों में प्यार बहुत था
पर पीड़ा और शिकायत भी थी.
- ऋषभ देव शर्मा
Beyond The Second Sex (स्त्रीविमर्श) March 06
औरतें औरतें नहीं हैं !
वे वीर हैं
मैं वसुंधरा.
उनके-मेरे बीच एक ही सम्बन्ध -
'वीर भोग्या वसुंधरा.'
वे सदा से मुझे जीतते आए हैं
भोगते आए हैं,
उनकी विजयलिप्सा अनादि है
अनंत है
विराट है.
जब वे मुझे नहीं जीत पाते
तो मेरी बेटियों पर निकालते हैं अपनी खीझ
दिखाते हैं अपनी वीरता.
युद्ध कहने को राजनीति है
पर सच में जघन्य अपराध !
अपराध - मेरी बेटियों के खिलाफ
औरतों के खिलाफ !
युद्धों में पहले भी औरतें चुराई जाती थीं
उनके वस्त्र उतारे जाते थे
बाल खींचे जाते थे
अंग काटे जाते थे
शील छीना जाता था ,
आज भी यही सब होता है.
पुरुष तब भी असभ्य था
आज भी असभ्य है,
तब भी राक्षस था
आज भी असुर है.
वह बदलता है हार को जीत में
औरतों पर अत्याचार करके.
सिपाही और फौजी
बन जाते हैं दुर्दांत दस्यु
और रौंद डालते हैं मेरी बेटियों की देह ,
निचोड़ लेते हैं प्राण देह से.
औरते या तो मर जाती हैं
[ लाखों मर रही हैं ]
या बन जाती हैं गूँगी गुलाम
..
वे विजय दर्प में ठहाके लगाते हैं !
वे रौंद रहे हैं रोज मेरी बेटियों को
मेरी आँखों के आगे.
पति की आँखों के आगे
पत्नी के गर्भ में घुसेड़ दी जाती हैं गर्म सलाखें.
माता-पिता की आँखों आगे
कुचल दिए जाते हैं अंकुर कन्याओं के.
एक एक औरत की जंघाओं पर से
फ्लैग मार्च करती गुज़रती है पूरी फौज,
माँ के विवर में ठूँस दिया जाता है बेटे का अंग !
औरतें औरतें हैं
न बेटियाँ हैं, न बहनें;
वे बस औरतें हैं
बेबस औरतें हैं.
दुश्मनों की औरतें !
फौजें जानती हैं
जनरल जानते हैं
सिपाही जानते हैं
औरतें औरतें नहीं होतीं
अस्मत होती हैं किसी जाति की.
औरतें हैं लज्जा
औरतें हैं शील
औरतें हैं अस्मिता
औरते हैं आज़ादी
औरतें गौरव हैं
औरतें स्वाभिमान.
औरतें औरतें नहीं
औरतें देश होती हैं.
औरत होती है जाति
औरत राष्ट्र होती है.
जानते हैं राजनीति के धुरंधर
जानते हैं रावण और दुर्योधन
जानते हैं शुम्भ और निशुम्भ
जानते हैं हिटलर और याहिया
कि औरतें औरतें नहीं हैं,
औरतें देश होती हैं.
औरत को रौंदो
तो देश रौंदा गया ,
औरत को भोगो
तो देश भोगा गया ,
औरत को नंगा किया
तो देश नंगा होगा,
औरत को काट डाला
तो देश कट गया.
जानते हैं वे
देश नहीं जीते जाते जीत कर भी,
जब तक स्वाभिमान बचा रहे!
इसीलिए
औरत के जननांग पर
फहरा दो विजय की पताका
देश हार जाएगा आप से आप!
इसी कूटनीति में
वीरगति पा रही हैं
मेरी लाखों लाख बेटियाँ
और आकाश में फहर रही हैं
कोटि कोटि विजय पताकाएँ!
इन पताकाओं की जड़ में
दफ़न हैं मासूम सिसकियाँ
बच्चियों की
उनकी माताओं की
उनकी दादियों-नानियों की.
उन सबको सजा मिली
औरत होने की
संस्कृति होने की
सभ्यता होने की.
औरतें औरतें नहीं हैं
औरतें हैं संस्कृति
औरतें हैं सभ्यता
औरतें मनुष्यता हैं
देवत्व की संभावनाएँ हैं औरतें!
औरत को जीतने का अर्थ है
संस्कृति को जीतना
सभ्यता को जीतना,
औरत को हराने का अर्थ है
मनुष्यता को हराना,
औरत को कुचलने का अर्थ है
कुचलना देवत्व की संभावनाओं को,
इसीलिए तो
उनके लिए
औरतें ज़मीनें हैं;
वे ज़मीन जीतने के लिए
औरतों को जीतते हैं!
-ऋषभ देव शर्मा
Posted By कविता वाचक्नवी to Beyond The Second Sex (स्त्रीविमर्श) at 3/05/2009 04:52:00 AM
February 18  पहले वे लंबे चोगों पर सफ़ेद गोल टोपी पहनकर आए थे और मेरे चेहरे पर तेजाब फेंककर मुझे बुरके में बाँधकर चले गए थे.
आज वे फिर आए हैं संस्कृति के रखवाले बनकर एक हाथ में लोहे की सलाखें और दूसरे हाथ में हंटर लेकर.
उन्हें शिकायत है मुझसे !
औरत होकर मैं प्यार कैसे कर सकती हूँ , सपने कैसे देख सकती हूँ , किसी को फूल कैसे दे सकती हूँ !
मैंने किसी को फूल दिया - उन्होंने मेरी फूल सी देह दाग दी. मैंने उड़ने के सपने देखे - उन्होंने मेरे सुनहरे पर तराश दिए. मैंने प्यार करने का दुस्साहस किया - उन्होंने मुझे वेश्या बना दिया.
वे यह सब करते रहे और मैं डरती रही, सहती रही, - अकेली हूँ न ?
कोई तो आए मेरे साथ , मैं इन हत्यारों को - तालिबों और मुजाहिदों को - शिव और राम के सैनिकों को - मुहब्बत के गुलाब देना चाहती हूँ. बताना चाहती हूँ इन्हें --
''न मैं अश्लील हूँ , न मेरी देह. मेरी नग्नता भी अश्लील नहीं -वही तो तुम्हें जनमती है! अश्लील है तुम्हारा पौरुष -औरत को सह नहीं पाता. अश्लील है तुम्हारी संस्कृति - पालती है तुम-सी विकृतियों को !
''अश्लील हैं वे सब रीतियाँ जो मनुष्य और मनुष्य के बीच भेद करती हैं. अश्लील हैं वे सब किताबें जो औरत को गुलाम बनाती हैं , -और मर्द को मालिक / नियंता . अश्लील है तुम्हारी यह दुनिया -इसमें प्यार वर्जित है और सपने निषिद्ध !
''धर्म अश्लील हैं -घृणा सिखाते हैं ! पवित्रता अश्लील है -हिंसा सिखाती है !''
वे फिर-फिर आते रहेंगे -पोशाकें बदलकर -हथियार बदलकर ; करते रहेंगे मुझपर ज्यादती.
पहले मुझे निर्वस्त्र करेंगे और फिर वस्त्रदान का पुण्य लूटेंगे.
वे युगों से यही करते आए हैं - फिर-फिर यही करेंगे जब भी मुझे अकेली पाएँगे !
नहीं ; मैं अकेली कहाँ हूँ .... मेरे साथ आ गई हैं दुनिया की तमाम औरतें .... --काश ! यह सपना कभी न टूटे !
- ऋषभ देव शर्मा
-- Posted By कविता वाचक्नवी to Beyond The Second Sex (स्त्रीविमर्श) at 2/17/2009 11:56:00 PM
February 03
मैंने किताबें माँगी
मुझे चूल्हा मिला ,
मैंने दोस्त माँगा
मुझे दूल्हा मिला.
मैंने सपने माँगे
मुझे प्रतिबंध मिले ,
मैंने संबंध माँगे
मुझे अनुबंध मिले.
कल मैंने धरती माँगी थी
मुझे समाधि मिली थी,
आज मैं आकाश माँगती हूँ
मुझे पंख दोगे ?
० ऋषभ देव शर्मा
http://streevimarsh.blogspot.com/2009/02/blog-post.html January 17 गन्धर्वों के देश
आया था एक राजकुमार
भरतवंशी.
छलछलाता हुआ पौरुष.
मूर्तिमान काम देव.
उछलती हुई मछलियाँ।
उफनता हुआ यौवन
आँखों में लहरा उठा समुद्र
पहली ही दृष्टि में।
बँध गए हम दोनों बाहुबंधन में.
पिघल - पिघल गया मेरा रूप.
जान पाई मैं पहली बार
स्त्री होने का सुख।
मैं बाँस का वन थी - वह संगीत था.
मैं पर्वत थी - वह गूँजती आवाज़.
देह की साधना थी,
आत्मा का आनंद था.
उसे पाकर मैं धन्य थी,
मुझे पाकर वह पूर्ण था.
'सुरत कलारी भई मतवारी
मदवा पी गई बिन तोले'।
खुमार उतरा
तो वह जा चुका था
वापस अपने देसों!
काले कोसों !
मैं अकेली रह गई।
मैं मेघदूत की यक्षिणी नहीं थी,
नहीं थी मैं नैषध की दमयंती.
मैं शकुन्तला भी नहीं थी,
राधा बनना भी मुझे स्वीकार न था.
मैं चल पड़ी -
बियाबान लाँघती,
शिखर - शिखर फलाँगती.
रास्ता रोका समन्दरों ने,
ज्वालामुखियों ने,
शेर बघेरों ने,
साँपों ने, सँपेरों ने।
मन तो घायल था ही,
तन भी तार - तार कर दिया
दुनिया ने।
मैं नहीं रुकी
मैं नहीं झुकी
मैं नहीं थमी
मैं नहीं डरी........
आ पहुँची
आग का दरिया तैर कर
काले कोसों !
उसके देसों !!
कितनी खुश थी मैं !
उससे मिलना जो था !!
पर
खुशी पर गिरी बिजली तड़प कर .
वह तो दूसरी दुनिया बसाए बैठा है !!
लौट जाऊँ मैं ?
उसे नई दुनिया में खुश देखकर
खुश होती रहूँ ?
रोती रहूँ ??
उसकी खुशी में खुश रहूँ ???
- सोचा था मैंने एक बार को
नहीं, मैं रोई नहीं.
मैंने थाम लिया उसका गरेबान ;
और घसीट ले आई
चौराहे पर.
नहीं,
अब मुझे उसकी ज़रूरत नहीं.
मुझे तो न्याय चाहिए !
न्याय चाहिए उस नई दुनिया को भी
जो उसने बसाई है - मेरा घर उजाड़ कर !!
०
- ऋषभ देव शर्मा
* सन्दर्भ
Posted By कविता वाचक्नवी to Beyond The Second Sex (स्त्रीविमर्श) at 1/17/2009 05:20:00 AM January 01 एकालाप -१४
पहली भोर
बरस भर वह उगलता रहा मेरे मुँह पर दिन भर का तनाव हर शाम !
आज नए बरस की पहली भोर मैंने दे मारा पूरा भरा पीकदान उसके माथे पर !!
कैसा लाल - लाल उजाला फ़ैल गया सब ओर !!!
December 16
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- उन्होंने जोरों से घोषणा की :
मैं अब अपने सारेनिर्णय ख़ुद लूंगी,
इन देवताओं का बोझ कंधों पर न ढोना पड़ेगा.
-मैंने खुले आसमान में उड़ान भरी ही थी
हम तुम्हें अमृत के पंख देंगे.
मेरा अकेले उड़ने का मन था.
-फ़रिश्ते आग-बबूला हो गए.
उनके अमृतवर्षी पंख ज्वालामुखी बन गए.
गंधक और तेजाब की बारिश में मैं झुलस गई.
-सर्पविष की पहली ही फुहार ने मेरी दृष्टि छीन ली
और मेरी त्वचा को वेधकर तेजाब की जलन
एक एक धमनी में समाती चली गई.
फ़रिश्ते जश्न मना रहे हैं - जीत का जश्न.
-जब जब मैंने अपनी राह ख़ुद चुनी ,
जब जब मैंने उन्हें 'ना' कहा,
आग के दरिया में कूदना पड़ा
या उन्होंने अपने अग्निदंश से
-जब जब मैंने अपनी राह ख़ुद चुनी,
जब जब मैंने उन्हें 'ना' कहा
तब तब या तो मुझे धरती में समाना पडा
-मैंने कितने रावणों के नाभिकुंड सोखे
कितने दुर्योधनों के रक्त से केश सींचे
कितनी बार मैं महिषमर्दिनी से लेकर दस्युसुंदरी तक बनी
-पर उनका तेजाब आज भी अक्षय है
घृणा का कोश लिए फिरते हैं वे अपने प्राणों में ;
और जब भी मेरे होठों से निकलती है एक 'ना'
उलट देते हैं मेरे मुँह पर .
अन्धकार और यातना के नरक में .
आते हैं जागती आँखों डरावने सपने.
-यमदूतो ! मुझे नरक में तो जीने दो!!
| December 04
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'सूँ साँ माणस गंध'
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सुनो दुश्मन! मैं न तो किसी फौज का जनरल हूँ, न किसी देश का प्रधानमंत्री, मैं दूरदर्शन का निदेशक भी नहीं हूँ और खुफ़िया विभाग की नौकरी भी कब का छोड़ चुका हूँ, मैं कोई वाइस चांसलर भी नहीं हूँ, न मैं किसी का अंग रक्षक हूँ न मेरा कोई अंग रक्षक।
मैं तो एक यात्री हूँ बस या ट्रेन की सीट पर ऊँघता हुआ, दफ्तर, बाज़ार और घर के तिकोन में भटकता हुआ, और इसीलिए तुम्हारी हिट-लिस्ट का एक नाम-रूप-हीन निशाना हूँ।
हर दिशा में मेरा पीछा कर रही है तुम्हारी आर डी एक्स की दैत्याकार आँख- सूँघती हुई बारूदी नथुनों से 'सूँ साँ माणस गंध'
लगातार दौड़ रहा हूँ मैं पर यह निगोड़ी 'माणस गंध' छिपाए नहीं छिपती।
तो ठीक है इस गंध को ही हथियार बनाना पड़ेगा अब मुझे...
लो, दौड़ना छोड़कर आ खड़ा हुआ हूँ तुम्हारे सामने निर्णायक युद्ध में, क्योंकि अर्थहीन हो गए हैं। वे सारे देवता जिन्होंने लिया था भार भारत का, लोकतंत्र के योगक्षेम का,
जय अथवा पराजय अप्रासंगिक है मेरे और तुम्हारे इस युद्ध में... प्रासंगिक है तो केवल तुम्हारा आसुरी उन्माद, प्रभुओं की नपुंसकता और मेरे अभिमन्युपन की शाश्वत माणस गंध!!!
-ऋषभदेव शर्मा | | |
अनुभूति में ऋषभदेव शर्मा की रचनाएँ-
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तेवरियों में- रोटी दस तेवरियाँ लोकतंत्र दस तेवरियाँ
एकालाप (१३) : स्त्रीविमर्शहर औरत काँपती है
आज मैं काँप रही हूँ सदा ऐसा ही होता है जब जब वे लड़ते हैं मैं काँपती रहती हूँ वे लड़ते हैं लड़ना उनकी फ़ितरत है कभी ज़र के लिए कभी जोरू के लिए कभी ज़मीन के लिए कभी जुनून के लिए वे लड़ते हैं लड़कर उन्हें संतोष मिलता है कभी शहीद होने का कभी जीत के जश्न का कभी स्वर्ग की लिप्सा का कभी राज्य के भोग का वे लड़ते हैं लड़ाई उन्हें महान बनाती है कभी वे शवाब कमाते हैं कभी जेहाद करते हैं कभी क्रांति लाते हैं कभी तख्ता पलटते हैं लड़ते वे हैं काँपती मैं हूँ लड़े कोई भी मरे कोई भी काँपना मुझी को है हर हाल में वे जिनका खून बहाते हैं मैं उन सबकी माँ हूँ न वे जिसके परखचे उड़ाते हैं वह मेरा सुहाग है न वे जिससे बलात्कार करते हैं वह मेरी कोखजनी है न मुझे काँपना ही है हर हाल में - वे जो खून पीते हैं वे जो नरमेध करते हैं वे जो बलात्कारी हैं मैं उनकी भी तो माँ हूँ मैं उनकी भी तो बेटी हूँ मैं उनकी भी तो बहन हूँ मैं काँपती हूँ- उनके लिए मैं माँ नहीं रही न न बेटी, न बहन रिश्ते तो मनुष्यों के होते हैं दरिंदों के कैसे रिश्ते - कैसे नाते दुनिया को अपने रंग में रंगने का उन्माद जब जब मनुष्यों को दरिंदों में तब्दील करता है तब तब मैं काँपती हूँ हर माँ काँपती है हर औरत काँपती है और शाप देती है अपनी ही संतानों को मैं फिर काँप रही हूँ (26 नवंबर की रात से) और दे रही हूँ शाप उन सारी आदमखोर संतानों को जो दरिंदों में तब्दील होकर लील रही हैं मनुष्यों को!
- ऋषभदेव शर्मा
-- Posted By कविता वाचक्नवी to Beyond The Second Sex (स्त्रीविमर्श) at 12/01/2008 12:40:00 AM
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