rishabha's profileऋषभ की कविताएँPhotosBlogListsMore Tools Help

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    August 23

    जाने कैसी स्त्री थी वह

    जाने कैसी स्त्री थी वह

    जाने कैसी स्त्री थी वह , कितनी धीर , कितनी सबल ! कैसे कहा होगा उसने माता पिता से, पीहर और ससुराल से - - नहीं ,मुझे यह विवाह स्वीकार नहीं - न, मैं नहीं मानती बालपने की शादी को - गुडिया के खेल तक की समझ न थी मुझे विवाह की समझ कैसे होती - आपका दिया यह पति मेरा पति नहीं ! कैसे टटोला होगा अपने आप को जवाब दिया होगा दुनिया को - - बंधन है बिना प्रेम का विवाह और मुझे अस्वीकार - कोई पुरुष दीखा ही नहीं प्रेम के योग्य ; एक परमपुरुष के सिवा - वह आलोकसुंदर परमपुरुष ही मेरा प्रियतम है ! कैसे किया होगा सामना तन मन को बींधती ज़हरबुझी नज़रों का , नकारा होगा अध्यात्म का भी आकर्षण तोड़कर शृंखला की कड़ियाँ सारी भारी - - स्त्री पुरुष में जो भेद करे वह धर्म मेरा नहीं - स्त्री जाति से जो भयभीत हो वह गुरु मेरा नहीं ! कैसे बाँटा होगा उसने अपने अस्तित्व को अपने स्वयं रचे परिवार में - किसी विधवा नौकरानी को किसी सेवक को किसी जिज्ञासु को किसी गाय, किसी गिलहरी , किसी मोरनी को ! उसने जीते जी मुक्ति अर्जित की विराटता सिरजी - कभी बदली कभी दीप कभी कीर बनकर. उसी ने दिखाया मुक्ति का मार्ग मेरी स्त्री को संपूर्ण आत्मदान के बहाने न्यस्त करके स्वयं को सर्वजन की आराधना में . वह सच ही महादेवी थी !!

    हे अग्नि!

    हे अग्नि! हे अग्नि! तुम्हें प्रणाम करते हैं हम। बहुत क्षमता है तुममें बड़ा ताप है - बड़ी जीवंतता। तुम जल में भी सुलगती हो और वायु में भी, भूगर्भ में भी तुम्हीं विराजमान हो और व्यापती हो आकाश में भी तुम। हमारे अस्तित्व में अवस्थित हो तुम प्राण बनकर। परमपावनी! तुममें अनंत संभावनाएँ हैं तुम्हीं से पवित्रता है इस जगत में। फूँकती हो तुम सारे कलुष को, शोधती हो फिर-फिर हिरण्यगर्भ ज्ञान की शिखा को। तुम ही तो जगती हो हमारे अग्निहोत्र में और आवाहन करते हैं तुम्हारा ही तो संध्या के दीप की लौ में हम। जगो, आज फिर, खांडवप्रस्थ फैला है दूर-दूर डँसता है प्रकाश की किरणों को, फैलाता है अँधेरे का जाल उगलता है भ्रम की छायाओं को। उठो, तुम्हें करना है छायाओं में छिपे सत्य का शोध। तुम चिर शोधक हो, हे अग्नि! तुम्हें प्रणाम करते हैं हम।

    July 30

    राधा क्या चाहे


    राधा क्या चाहे 


    ''राधिके!''
    ''हूँ?''
    ''भला क्या तो है तेरे कान्हा में?''
    ''पता नहीं.''


    ''पौरुष?''
    ''होगा.
    बहुतों में होता है.''


    ''सौंदर्य?''
    ''होगा.
    पर वह भी बहुतों में है.''


    ''प्रभुता?''
    ''होने दो.
    बहुतों में रही है.''


    ''फिर क्यों खिंची जाती है तू
    बस उसी की ओर?''
    ''उसे मेरी परवाह है न!''

    http://streevimarsh.blogspot.com/2009/07/blog-post_17.html

    July 15

    अम्मा, ग़रज़ पड़ै चली आओ चूल्हे की भटियारी !

     

    दो बेटे हैं मेरे.
    बहुत प्यार से धरे थे मैंने
    इनके नाम - बलजीत और बलजोर!

    गबरू जवान निकले दोनों ही.
    जब जोट मिलाकर  चलते,
    सारे गाँव की छाती पर साँप लोट जाता.
    मेरी छातियाँ उमग उमग पड़तीं.
    मैं बलि बलि जाती
    अपने कलेजे के टुकडों की!

    वक़्त बदल गया.
    कलेजे के टुकडों ने
    कलेजे के टुकड़े कर दिए.
    ज़मीन का तो बँटवारा किया ही,
    माँ भी बाँट ली!

    ज़मीन के लिए लड़े दोनों
          - अपने अपने पास रखने को,
    माँ के लिए लड़े दोनों
         - एक दूसरे के मत्थे मढ़ने को!

    बलजोर ने बरजोरी लगवा लिया अँगूठा 
    तो माँ उसके काम की न रही,
    बलजीत के भी तो किसी काम की न रही!

    दोनों ने दरवाजे बंद कर लिए,
    मैं बाहर खड़ी तप रही हूँ भरी दुपहरी;
                        दो जवान बेटों की माँ!

    जीवन भर रोटी थेपती आई.
    आज भी जिसका चूल्हा झोंकूँ,
    रोटी दे दे ...शायद!

    June 16

    गाड़िया लुहारिन का प्रेम गीत



    पिता ने संडासी जैसे दृढ़ हाथों से
    बड़ी संडासी में
    पकड़ रखा है तपता हुआ लौहखंड
    जकड़कर.

    माँ धौंक रही
    हवा से फुलाकर
    धौंकनी लगातार.

    भट्टी तप रही.
    दुपहरी भी तप रही.
    तप रहे हम दोनों.

    मैं और तुम
    आमने - सामने,
    तुम्हारे हाथ में घन,
    मेरे हाथ में भी
    उतना ही भारी घन.

    पिता ने भरी हुंकारी.
    उठे दोनों घन.
    चक्राकार घूमे हवा में.
    दनादन पड़ने लगे
    तपते लौहखंड पर
    एक के बाद एक,
    क्रम से,
    दुगुने दम से.

    तुम्हारी आँखें मेरी आँखों में,
    मेरी आँखें तुम्हारी आँखों में.
    त्राटक! मारणमन्त्र! सम्मोहन!
    लोहा पिटता रहा,
    कुटता रहा,
    ढलता रहा.
    साँस फूलती रही
    मेरी भी
    तुम्हारी भी.

    एक गोले में घिरे हम.
    सब घेरकर पुकार रहे
    तुम्हें उकसाते हुए,
    मुझे शाबासी देते हुए.

    घन बिजली की तरह चले.
    चिंगारियाँ फूटीं.
    साँस फूलती रही.
    पसीना चू पड़ा तुम्हारी झबरी मूँछों से.
    तरबतर हो गई मेरी छींट की कोरी अँगिया.

    ढल गया लोहा.
    बन गया औजार.
    पिता ने डाल दिया पानी में
    बुझने को.

    चिहुँक उठा सारा कबीला.
    न तुम हारे
    न मैं हारी,
    न तुम जीते
    न मैं जीती.
    तुम्हारा पौरुष
    मेरे बल से टकराकर
    हो गया दुगुना.

    पंचों ने हमारी शादी तय कर दी है!

    लोहा एक बार फिर
    लोहे से टकरा रहा है.
    आग के फूल खिल रहे हैं
    मेरी नज़रों में,
    तेरी निगाहों में.

    सच में तू मेरी जोट का है !

    http://streevimarsh.blogspot.com/2009/06/blog-post_14.html
    June 03

    इतिहास हंता मैं




    इतिहास हंता मैं


    मैं घर से निकल आई थी
    तुम्हें पाने को ,
    मैंने धरम की दीवार गिराई थी
    तुम्हें पाने को,
    अपने पिता से आँख मिलाई थी -
    भाई से ज़बान लड़ाई थी -
    तुम्हें पाने को!




    माँ अपनी कोख नाखूनों से नोंचती रह गई ,
    पिता ने जीते जी मेरा श्राद्ध कर दिया;
    मैंने मुड़ कर नहीं देखा.
    मैं अपना इतिहास जलाकर आई थी -
    तुम्हें पाने को!




    तुमने मुझे नया नाम दिया -
    मैंने स्वीकार किया ,
    तुमने मुझे नया मज़हब दिया -
    मैंने अंगीकार किया.
    वैसे ये शब्द उतने ही निरर्थक थे
    जितना मेरा जला हुआ अतीत.
    मैंने प्रतिकार नहीं किया था .
    तुम जैसे भी थे,जो भी थे -
    बेशर्त मेरे प्रेमपात्र थे.
    मैं भागी चली आई थी
    तुम्हें पाने को ;




    और सो गई थी
    थककर चकनाचूर.




    आँख खुली तो तुम्हारी दाढ़ी उग आई थी ,
    तुम हिजाब कहकर
    मेरे ऊपर कफ़न डाल रहे थे.




    तुम्हारी आँखों में देखा मैंने झाँककर -
    ये तो मेरे पिता की आँखें हैं!
    मैं देखती ही रह गई ;
    तुमने मुझे ज़िंदा कब्र में गाड़ दिया!




    एक बार फिर
    सब कुछ जलाना होगा -
    मुझे
    खुद को पाने को!!


    May 19

    प्रशस्तियाँ



    प्रशस्तियाँ
    मैंने जब भी कुछ पाया मर खप कर पाया खट खट कर पाया अग्नि की धार पर गुज़र कर पाया पाने की खुशी लेकिन कभी नहीं पाई खुशी से पहले हर बार सुनाई देती रहीं मेरी प्रशस्ति में दुर्मुखों की फुसफुसाहटें धोबियों की गालियाँ और मन्थराओं की बोलियाँ शिक्षा हो या व्यवसाय प्रसिद्धि हो या पुरस्कार हर बार उन्होंने यही कहा - चर्म-मुद्रा चल गई! [चर्म-चर्वण से परे वे कभी गए ही नहीं!] मैंने हर दौड़ में उन्हें पीछे छोड़ा हर मैदान में पछाड़ा, उन्होंने मेरा पीछा नहीं छोड़ा मैं कच्चे सूत पर चलकर भर लाई घड़ों पानी वे किनारे पर ही ऊभ-चूभ हैं!! O

    April 16

    गर्भभार

    गर्भभार


    सँभलकर, बहुरिया,
    त्रिशला देवी के सोलहों सपनों का सच
    तेरे गर्भ में है.


    नहीं,
    दिव्यता का आलोक
    केवल तीर्थंकरों की माताओं के ही
    आनन पर नहीं विराजता ;
    हर बेटी, हर बहू
    जब गर्भ भार वहन करती है
    उतनी ही आलोकित होती है.


    हिरण्यगर्भ है
    हर स्त्री.
    उसके भीतर प्रकाश उतरता है,
    प्रभा उभरती है,
    प्रभामंडल जगमगाते हैं.
    प्रकाश फूटता है
    उसी के भीतर से.

    प्रकाश सोया रहता है
    हर लड़की के घट में,
    और जब वह माँ बनती है
    नहा उठती है
    अपने ही प्रकाश में,
    अपनी प्रभा में.
    अपने प्रभामंडल में.


    सँभलकर, बहुरिया,
    तेरे अंग अंग से किरणें छलक रही हैं!



    -ऋषभ देव शर्मा


    Posted to Beyond The Second Sex (स्त्रीविमर्श)

    March 17

    बनाया था माँ ने वह चूल्हा



    बनाया था माँ ने वह चूल्हा


    चिकनी पीली मिट्टी को
    कुएँ के मीठे पानी में गूँथ कर
    बनाया था माँ ने वह चूल्हा
    और पूरे पंद्रह दिन तक
    तपाया था जेठ की धूप में
    दिन - दिन भर



    उस दिन
    आषाढ़ का पहला दौंगड़ा गिरा,
    हमारे घर का बगड़
    बूँदों में नहा कर महक उठा था,
    रसोई भी महक उठी थी -
    नए चूल्हे पर खाना जो बन रहा था.



    गाय के गोबर में
    गेहूँ का भुस गूँथ कर
    उपले थापती थी माँ बड़े मनोयोग से
    और आषाढ़ के पहले
    बिटौड़े में सजाती थी उन्हें
    बड़ी सावधानी से .



    बूँदाबाँदी के बीच बिटौड़े में से
    बिना भिगोए उपले लाने में
    जो सुख मिलता था ,
    आज लॉकर से गहने लाने में भी नहीं मिलता.



    सूखे उपले
    भक्क से पकड़ लेते थे आग
    और
    उँगलियों को लपटों से बचाती माँ
    गही में सेंकती थी हमारे लिए रोटी
    - फूले फूले फुलके.



    गेहूँ की रोटी सिंकने की गंध
    बैठक तक ही नहीं , गली तक जाती थी.
    हम सब खिंचे चले आते थे
    रसोई की ओर.



    जब महकता था बारिश में बगड़
    और महमहाती थी गेहूँ की गंध से रसोई -
    माँ गुनगुना उठती थी
    कोई लोकगीत - पीहर की याद का.



    माँ के गीतों में प्यार बहुत था
    पर पीड़ा और शिकायत भी थी.



    बारिश में बना रही हूँ रोटियाँ,
    भीगे झोंके भीतर घुसे आते हैं.
    मेरे बीरा ! इन झोंकों को रोक दे न !
    बड़े बदमाश हैं ये झोंके,
    कभी आग को बढ़ा देते हैं
    कभी बुझा देते हैं आग को.



    आग बढ़ती है
    तो रोटी जलने लगती है.
    तेरे बहनोई को जली रोटी पसंद नहीं रे!
    रोटी को बचाती हूँ तो उँगली जल जाती है.



    माँ की उँगलियाँ छालों से भर जाती थीं
    पर पिताजी की रोटी पर एक भी काला निशान कभी नहीं दिखा!



    माँ के गीतों में प्यार बहुत था
    पर पीड़ा और शिकायत भी थी.



    बारिश में बना रही हूँ रोटियाँ,
    भीगे झोंके भीतर घुसे आते हैं.
    मेरे बीरा ! इन झोंकों को रोक दे न !
    बड़े बदमाश हैं ये झोंके ,
    कभी आग को बढ़ा देते हैं
    कभी बुझा देते हैं आग को.



    आग बुझती है
    तो रोटी फूलती नहीं
    तेरा भानजा अधफूली रोटी नहीं खाता रे!
    बुझी आग जलाती हूँ तो आँखें धुएँ से भर जाती हैं.



    माँ की आँखों में मोतियांबिंद उतर आया
    पर मेरी थाली में कभी अधफूली रोटी नहीं आई!



    माँ के गीतों में प्यार बहुत था
    पर पीड़ा और शिकायत भी थी.



    रोटी बनाना सीखती मेरी बेटी
    जब तवे पर हाथ जला लेती है,
    आँखें मसलती
    रसोई से निकलती है.
    तो लगता है
    माँ आज भी गुनगुना रही है .



    मेरे बीरा ! इन झोंकों को रोक दे न!
    बड़े बदमाश हैं ये झोंके,
    कभी आग को बढ़ा देते हैं
    कभी बुझा देते हैं आग को.



    माँ के गीतों में प्यार बहुत था
    पर पीड़ा और शिकायत भी थी.



    - ऋषभ देव शर्मा


    Beyond The Second Sex (स्त्रीविमर्श)

    March 06

    औरतें औरतें नहीं हैं !



    औरतें औरतें नहीं हैं !

    वे वीर हैं
    मैं वसुंधरा.
    उनके-मेरे बीच एक ही सम्बन्ध -
    'वीर भोग्या वसुंधरा.'

    वे सदा से मुझे जीतते आए हैं
    भोगते आए हैं,
    उनकी विजयलिप्सा अनादि है
    अनंत है
    विराट है.

    जब वे मुझे नहीं जीत पाते
    तो मेरी बेटियों पर निकालते हैं अपनी खीझ
    दिखाते हैं अपनी वीरता.

    युद्ध कहने को राजनीति है
    पर सच में जघन्य अपराध !
    अपराध - मेरी बेटियों के खिलाफ
    औरतों के खिलाफ !

    युद्धों में पहले भी औरतें चुराई जाती थीं
    उनके वस्त्र उतारे जाते थे
    बाल खींचे जाते थे
    अंग काटे जाते थे
    शील छीना जाता था ,
    आज भी यही सब होता है.
    पुरुष तब भी असभ्य था
    आज भी असभ्य है,
    तब भी राक्षस था
    आज भी असुर है.

    वह बदलता है हार को जीत में
    औरतों पर अत्याचार करके.

    सिपाही और फौजी
    बन जाते हैं दुर्दांत दस्यु
    और रौंद डालते हैं मेरी बेटियों की देह ,
    निचोड़ लेते हैं प्राण देह से.

    औरते या तो मर जाती हैं
    [ लाखों मर रही हैं ]
    या बन जाती हैं गूँगी गुलाम
    ..

    वे विजय दर्प में ठहाके लगाते हैं !

    वे रौंद रहे हैं रोज मेरी बेटियों को
    मेरी आँखों के आगे.
    पति की आँखों के आगे
    पत्नी के गर्भ में घुसेड़ दी जाती हैं गर्म सलाखें.
    माता-पिता की आँखों आगे
    कुचल दिए जाते हैं अंकुर कन्याओं के.

    एक एक औरत की जंघाओं पर से
    फ्लैग मार्च करती गुज़रती है पूरी फौज,
    माँ के विवर में ठूँस दिया जाता है बेटे का अंग !

    औरतें औरतें हैं
    न बेटियाँ हैं, न बहनें;
    वे बस औरतें हैं
    बेबस औरतें हैं.
    दुश्मनों की औरतें !

    फौजें जानती हैं
    जनरल जानते हैं
    सिपाही जानते हैं
    औरतें औरतें नहीं होतीं
    अस्मत होती हैं किसी जाति की.

    औरतें हैं लज्जा
    औरतें हैं शील
    औरतें हैं अस्मिता
    औरते हैं आज़ादी
    औरतें गौरव हैं
    औरतें स्वाभिमान.

    औरतें औरतें नहीं
    औरतें देश होती हैं.
    औरत होती है जाति
    औरत राष्ट्र होती है.

    जानते हैं राजनीति के धुरंधर
    जानते हैं रावण और दुर्योधन
    जानते हैं शुम्भ और निशुम्भ
    जानते हैं हिटलर और याहिया
    कि औरतें औरतें नहीं हैं,
    औरतें देश होती हैं.
    औरत को रौंदो
    तो देश रौंदा गया ,
    औरत को भोगो
    तो देश भोगा गया ,
    औरत को नंगा किया
    तो देश नंगा होगा,
    औरत को काट डाला
    तो देश कट गया.

    जानते हैं वे
    देश नहीं जीते जाते जीत कर भी,
    जब तक स्वाभिमान बचा रहे!

    इसीलिए
    औरत के जननांग पर
    फहरा दो विजय की पताका
    देश हार जाएगा आप से आप!

    इसी कूटनीति में
    वीरगति पा रही हैं
    मेरी लाखों लाख बेटियाँ
    और आकाश में फहर रही हैं
    कोटि कोटि विजय पताकाएँ!

    इन पताकाओं की जड़ में
    दफ़न हैं मासूम सिसकियाँ
    बच्चियों की
    उनकी माताओं की
    उनकी दादियों-नानियों की.

    उन सबको सजा मिली
    औरत होने की
    संस्कृति होने की
    सभ्यता होने की.

    औरतें औरतें नहीं हैं
    औरतें हैं संस्कृति
    औरतें हैं सभ्यता
    औरतें मनुष्यता हैं
    देवत्व की संभावनाएँ हैं औरतें!

    औरत को जीतने का अर्थ है
    संस्कृति को जीतना
    सभ्यता को जीतना,
    औरत को हराने का अर्थ है
    मनुष्यता को हराना,
    औरत को कुचलने का अर्थ है
    कुचलना देवत्व की संभावनाओं को,

    इसीलिए तो
    उनके लिए
    औरतें ज़मीनें हैं;
    वे ज़मीन जीतने के लिए
    औरतों को जीतते हैं!



    -ऋषभ देव शर्मा

    Posted By कविता वाचक्नवी to Beyond The Second Sex (स्त्रीविमर्श) at 3/05/2009 04:52:00 AM

    February 18

    अश्लील है तुम्हारा पौरुष


    पहले वे
    लंबे चोगों पर सफ़ेद गोल टोपी
    पहनकर आए थे
    और
    मेरे चेहरे पर तेजाब फेंककर
    मुझे बुरके में बाँधकर चले गए थे.



    आज वे फिर आए हैं
    संस्कृति के रखवाले बनकर
    एक हाथ में लोहे की सलाखें
    और दूसरे हाथ में हंटर लेकर.



    उन्हें शिकायत है मुझसे !



    औरत होकर मैं
    प्यार कैसे कर सकती हूँ ,
    सपने कैसे देख सकती हूँ ,
    किसी को फूल कैसे दे सकती हूँ !



    मैंने किसी को फूल दिया
    - उन्होंने मेरी फूल सी देह दाग दी.
    मैंने उड़ने के सपने देखे
    - उन्होंने मेरे सुनहरे पर तराश दिए.
    मैंने प्यार करने का दुस्साहस किया
    - उन्होंने मुझे वेश्या बना दिया.



    वे यह सब करते रहे
    और मैं डरती रही, सहती रही,
    - अकेली हूँ न ?



    कोई तो आए मेरे साथ ,
    मैं इन हत्यारों को -
    तालिबों और मुजाहिदों को -
    शिव और राम के सैनिकों को -
    मुहब्बत के गुलाब देना चाहती हूँ.
    बताना चाहती हूँ इन्हें --



    ''न मैं अश्लील हूँ , न मेरी देह.
    मेरी नग्नता भी अश्लील नहीं
    -वही तो तुम्हें जनमती है!
    अश्लील है तुम्हारा पौरुष
    -औरत को सह नहीं पाता.
    अश्लील है तुम्हारी संस्कृति
    - पालती है तुम-सी विकृतियों को !



    ''अश्लील हैं वे सब रीतियाँ
    जो मनुष्य और मनुष्य के बीच भेद करती हैं.
    अश्लील हैं वे सब किताबें
    जो औरत को गुलाम बनाती हैं ,
    -और मर्द को मालिक / नियंता .
    अश्लील है तुम्हारी यह दुनिया
    -इसमें प्यार वर्जित है
    और सपने निषिद्ध !



    ''धर्म अश्लील हैं
    -घृणा सिखाते हैं !
    पवित्रता अश्लील है
    -हिंसा सिखाती है !''



    वे फिर-फिर आते रहेंगे
    -पोशाकें बदलकर
    -हथियार बदलकर ;
    करते रहेंगे मुझपर ज्यादती.



    पहले मुझे निर्वस्त्र करेंगे
    और फिर
    वस्त्रदान का पुण्य लूटेंगे.



    वे युगों से यही करते आए हैं
    - फिर-फिर यही करेंगे
    जब भी मुझे अकेली पाएँगे !



    नहीं ; मैं अकेली कहाँ हूँ ....
    मेरे साथ आ गई हैं दुनिया की तमाम औरतें ....
    --काश ! यह सपना कभी न टूटे !



    - ऋषभ देव शर्मा




    --
    Posted By कविता वाचक्नवी to Beyond The Second Sex (स्त्रीविमर्श) at 2/17/2009 11:56:00 PM

    February 03

    मुझे पंख दोगे ?




    मैंने किताबें माँगी
    मुझे चूल्हा मिला ,
    मैंने दोस्त माँगा
    मुझे दूल्हा मिला.


    मैंने सपने माँगे
    मुझे प्रतिबंध मिले ,
    मैंने संबंध माँगे
    मुझे अनुबंध मिले.


    कल मैंने धरती माँगी थी
    मुझे समाधि मिली थी,
    आज मैं आकाश माँगती हूँ
    मुझे पंख दोगे ?


    ० ऋषभ देव शर्मा

    http://streevimarsh.blogspot.com/2009/02/blog-post.html

    January 17

    मुझे तो न्याय चाहिए *


    गन्धर्वों के देश
    आया था एक राजकुमार
    भरतवंशी.
    छलछलाता हुआ पौरुष.
    मूर्तिमान काम देव.
    उछलती हुई मछलियाँ।


    उफनता हुआ यौवन
    आँखों में लहरा उठा समुद्र
    पहली ही दृष्टि में।


    बँध गए हम दोनों बाहुबंधन में.
    पिघल - पिघल गया मेरा रूप.
    जान पाई मैं पहली बार
    स्त्री होने का सुख।


    मैं बाँस का वन थी - वह संगीत था.
    मैं पर्वत थी - वह गूँजती आवाज़.
    देह की साधना थी,
    आत्मा का आनंद था.
    उसे पाकर मैं धन्य थी,
    मुझे पाकर वह पूर्ण था.


    'सुरत कलारी भई मतवारी
    मदवा पी गई बिन तोले'।


    खुमार उतरा
    तो वह जा चुका था
    वापस अपने देसों!
    काले कोसों !


    मैं अकेली रह गई।



    मैं मेघदूत की यक्षिणी नहीं थी,
    नहीं थी मैं नैषध की दमयंती.
    मैं शकुन्तला भी नहीं थी,
    राधा बनना भी मुझे स्वीकार न था.


    मैं चल पड़ी -
    बियाबान लाँघती,
    शिखर - शिखर फलाँगती.
    रास्ता रोका समन्दरों ने,
    ज्वालामुखियों ने,
    शेर बघेरों ने,
    साँपों ने, सँपेरों ने।


    मन तो घायल था ही,
    तन भी तार - तार कर दिया
    दुनिया ने।



    मैं नहीं रुकी
    मैं नहीं झुकी
    मैं नहीं थमी
    मैं नहीं डरी........



    आ पहुँची
    आग का दरिया तैर कर
    काले कोसों !
    उसके देसों !!



    कितनी खुश थी मैं !
    उससे मिलना जो था !!



    पर
    खुशी पर गिरी बिजली तड़प कर .
    वह तो दूसरी दुनिया बसाए बैठा है !!



    लौट जाऊँ मैं ?
    उसे नई दुनिया में खुश देखकर
    खुश होती रहूँ ?
    रोती रहूँ ??
    उसकी खुशी में खुश रहूँ ???
    - सोचा था मैंने एक बार को




    नहीं, मैं रोई नहीं.
    मैंने थाम लिया उसका गरेबान ;
    और घसीट ले आई
    चौराहे पर.


    नहीं,
    अब मुझे उसकी ज़रूरत नहीं.
    मुझे तो न्याय चाहिए !
    न्याय चाहिए उस नई दुनिया को भी
    जो उसने बसाई है - मेरा घर उजाड़ कर !!



    - ऋषभ देव शर्मा
    *सन्दर्भ


    Posted By कविता वाचक्नवी to Beyond The Second Sex (स्त्रीविमर्श) at 1/17/2009 05:20:00 AM
    January 01

    पहली भोर

    एकालाप -१४

    पहली भोर



    बरस भर वह
    उगलता रहा मेरे मुँह पर
    दिन भर का तनाव
    हर शाम !


    आज
    नए बरस की पहली भोर
    मैंने दे मारा
    पूरा भरा पीकदान
    उसके माथे पर !!


    कैसा लाल - लाल उजाला
    फ़ैल गया सब ओर !!!

    - ऋषभ देव शर्मा






    --
    Posted By कविता वाचक्नवी to Beyond The Second Sex (स्त्रीविमर्श) at 12/31/2008 12:01:00 PM
    December 16

    'न' कहने की सज़ा

     
    258 magnify
    Posted By कविता वाचक्नवी to Beyond The Second Sex (स्त्रीविमर्श) at 12/15/2008 08:15:00 PM

    एकालाप 
    'न' कहने की सज़ा
     
    - उन्होंने जोरों से घोषणा की :
    अब से तुम आजाद हो,
    अपनी मर्जी की मालिक.
     
    - मुझे लगा,
    मैं अब अपने सारेनिर्णय ख़ुद लूंगी,
    इन  देवताओं का बोझ कंधों पर न ढोना  पड़ेगा.
     
    -मैंने खुले आसमान में उड़ान भरी ही थी 
    कि फ़रिश्ते आ गए. 
    बोले-हमारे साथ चलो.
    हम तुम्हें अमृत के पंख देंगे.
     
    -मैंने इनकार कर दिया.
    मेरा अकेले उड़ने का मन था.
    -फ़रिश्ते आग-बबूला हो गए.
    उनके अमृतवर्षी पंख ज्वालामुखी बन गए.
    गंधक और तेजाब की बारिश में मैं झुलस गई.
     
    -सर्पविष की पहली ही फुहार ने मेरी दृष्टि छीन ली 
    और मेरी त्वचा को वेधकर तेजाब की जलन 
    एक एक धमनी में समाती चली गई.
     
    -मैं तड़प रही  हूँ.
    फ़रिश्ते जश्न मना  रहे हैं - जीत का जश्न.
     
    -जब जब वे मुझसे हारे हैं 
    उन्होंने यही तो किया है.
     
    -जब जब मैंने अपनी राह ख़ुद चुनी ,
    जब जब मैंने उन्हें 'ना' कहा,
    तब तब या तो  मुझे 
    आग के दरिया में कूदना पड़ा
    या उन्होंने अपने अग्निदंश से
    मुझे जीवित लाश बना दिया.
     
    -जब जब मैंने अपनी राह ख़ुद चुनी,
    जब जब मैंने उन्हें 'ना' कहा
    तब तब या तो मुझे धरती में समाना पडा
    या महाभारत रचाना पड़ा.
     
    -मैंने कितने रावणों के नाभिकुंड सोखे 
    कितने दुर्योधनों के रक्त से केश सींचे
    कितनी बार मैं महिषमर्दिनी से लेकर दस्युसुंदरी तक बनी
    कितनी बार....
    कितनी बार...
     
    -पर उनका तेजाब आज भी अक्षय है
    घृणा का कोश लिए फिरते हैं वे अपने प्राणों में ;
    और जब भी मेरे होठों से निकलती है एक 'ना' 
    तो वे सारी नफरत 
    सारा तेजाब 
    उलट देते हैं मेरे मुँह पर . 
     
    -मैं अब नरक में हूँ
    अन्धकार और यातना के नरक में . 
     
    -अब मुझे नींद नहीं आती
    आते हैं जागती आँखों डरावने सपने.
    नहीं,
    उड़ान के सपने नहीं,
    आग के सपने 
    तेजाब के सपने 
    साँपों  के सपने
    यातनागृहों के सपने
    वैतरणी के सपने . 
     
    -यमदूतो ! मुझे नरक में तो जीने दो!!
     

    Oऋषभ देव शर्मा
    December 04

    'सूँ साँ माणस गंध' : अनुभूति में ऋषभदेव शर्मा की रचनाएँ

     

    प्रत्येक सोमवार को प्रकाशित
     
    पत्र व्यवहार का पता
    teamanu@anubhuti-hindi.org

    अभिव्यक्ति  १. १२. २००८

    अंजुमनउपहार कवि काव्य चर्चाकाव्य संगमकिशोर कोनागीतगौरव ग्रामगौरवग्रंथदोहेरचनाएँ भेजें
    अभिव्यक्तिनई हवा पाठकनामापुराने अंकसंकलनहाइकुहास्य व्यंग्यक्षणिकाएँदिशांतरसमस्यापूर्ति

    'सूँ साँ माणस गंध'

     

    सुनो दुश्मन!
    मैं न तो
    किसी फौज का जनरल हूँ,
    न किसी देश का प्रधानमंत्री,
    मैं दूरदर्शन का निदेशक भी नहीं हूँ
    और खुफ़िया विभाग की नौकरी भी
    कब का छोड़ चुका हूँ,
    मैं कोई वाइस चांसलर भी नहीं हूँ,
    न मैं किसी का अंग रक्षक हूँ
    न मेरा कोई अंग रक्षक।

    मैं तो एक यात्री हूँ
    बस या ट्रेन की सीट पर ऊँघता हुआ,
    दफ्तर, बाज़ार और
    घर के तिकोन में भटकता हुआ,
    और इसीलिए
    तुम्हारी हिट-लिस्ट का
    एक नाम-रूप-हीन निशाना हूँ।

    हर दिशा में मेरा पीछा कर रही है
    तुम्हारी आर डी एक्स की दैत्याकार आँख-
    सूँघती हुई बारूदी नथुनों से
    'सूँ साँ माणस गंध'

    लगातार दौड़ रहा हूँ मैं
    पर यह निगोड़ी 'माणस गंध'
    छिपाए नहीं छिपती।

    तो ठीक है
    इस गंध को ही
    हथियार बनाना पड़ेगा अब मुझे...

    लो,
    दौड़ना छोड़कर आ खड़ा हुआ हूँ
    तुम्हारे सामने
    निर्णायक युद्ध में,
    क्योंकि अर्थहीन हो गए हैं।
    वे सारे देवता
    जिन्होंने लिया था भार भारत का,
    लोकतंत्र के योगक्षेम का,

    जय अथवा पराजय
    अप्रासंगिक है
    मेरे और तुम्हारे इस युद्ध में...
    प्रासंगिक है तो केवल
    तुम्हारा आसुरी उन्माद,
    प्रभुओं की नपुंसकता
    और मेरे अभिमन्युपन की
    शाश्वत माणस गंध!!!

    -ऋषभदेव शर्मा

    अनुभूति में ऋषभदेव शर्मा की रचनाएँ-

    नई रचनाएँ-
    दुआ
    मैं झूठ हूँ
    सूँ साँ माणस गंध

    तेवरियों में-
    रोटी दस तेवरिया
    लोकतंत्र दस तेवरियाँ

     

    हर औरत काँपती है

    एकालाप (१३) : स्त्रीविमर्श







    हर औरत काँपती है



    आज मैं काँप रही हूँ
    सदा ऐसा ही होता है
    जब जब वे लड़ते हैं
    मैं काँपती रहती हूँ





    वे लड़ते हैं
    लड़ना उनकी फ़ितरत है
    कभी ज़र के लिए
    कभी जोरू के लिए
    कभी ज़मीन के लिए
    कभी जुनून के लिए




    वे लड़ते हैं
    लड़कर उन्हें संतोष मिलता है
    कभी शहीद होने का
    कभी जीत के जश्न का
    कभी स्वर्ग की लिप्सा का
    कभी राज्य के भोग का




    वे लड़ते हैं
    लड़ाई उन्हें महान बनाती है
    कभी वे शवाब कमाते हैं
    कभी जेहाद करते हैं
    कभी क्रांति लाते हैं
    कभी तख्ता पलटते हैं




    लड़ते वे हैं
    काँपती मैं हूँ





    लड़े कोई भी
    मरे कोई भी
    काँपना मुझी को है हर हाल में




    वे जिनका खून बहाते हैं
    मैं उन सबकी माँ हूँ न
    वे जिसके परखचे उड़ाते हैं
    वह मेरा सुहाग है न
    वे जिससे बलात्कार करते हैं
    वह मेरी कोखजनी है न




    मुझे काँपना ही है हर हाल में -




    वे जो खून पीते हैं
    वे जो नरमेध करते हैं
    वे जो बलात्कारी हैं
    मैं उनकी भी तो माँ हूँ
    मैं उनकी भी तो बेटी हूँ
    मैं उनकी भी तो बहन हूँ




    मैं काँपती हूँ-




    उनके लिए मैं माँ नहीं रही न
    न बेटी, न बहन
    रिश्ते तो मनुष्यों के होते हैं
    दरिंदों के कैसे रिश्ते - कैसे नाते




    दुनिया को अपने रंग में रंगने का उन्माद
    जब जब
    मनुष्यों को दरिंदों में तब्दील करता है
    तब तब मैं
    काँपती हूँ



    हर माँ काँपती है
    हर औरत काँपती है
    और शाप देती है
    अपनी ही संतानों को




    मैं फिर काँप रही हूँ (26 नवंबर की रात से)
    और दे रही हूँ शाप
    उन सारी आदमखोर संतानों को
    जो दरिंदों में तब्दील होकर
    लील रही हैं मनुष्यों को!

    - ऋषभदेव शर्मा





    --
    Posted By कविता वाचक्नवी to Beyond The Second Sex (स्त्रीविमर्श) at 12/01/2008 12:40:00 AM





    November 18

    औरतें

    औरतें
    -ऋषभ देव शर्मा








    सुनो, सुनो,
    अवधूतो! सुनो,
    साधुओं! सुनो,


    कबीर ने आज फिर
    एक अचंभा देखा है
    आज फिर पानी में आग लगी है
    आज फिर चींटी पहाड़ चढ़ रही है
    नौ मन काजर लाय,
    हाथी मार बगल में देन्हें
    ऊँट लिए लटकाय!





    नहीं समझे?
    अरे, देखते नहीं अकल के अंधो!
    औरतों की वकालत के लिए
    मर्द निकले हैं,
    कुरते-पाजामे-धोती-टोपी वाले मर्द!
    वे उन्हें उनके हक़
    दिलवाकर ही रहेंगे .





    राजनीति में सब कुछ सम्भव है.
    यहाँ घोड़े और घास में
    यारी हो सकती है .
    कुर्सी कुछ भी करा सकती है.
    -कुर्सी महा ठगिनी हम जानी!





    कुर्सी का ही तो प्रताप है
    कि शेर हिरनियों की
    हिफाजत कर रहे हैं
    (मर्द औरतों की वकालत कर रहे हैं).





    सुनो, सुनो,
    अवधूतो! सुनो,
    साधुओं! सुनो,
    इन चीखों को सुनो,
    इतिहास के खंडहरों को चीरकर
    आती हुई ये चीखें औरतों की हैं,
    मर्दों की सताई हुई
    औरतों की कलपती हुई आत्माएं
    नाचती हैं चुडैल बनकर,
    हाहाकार मचाती हैं,
    चीखती चिल्लाती हैं,
    दुनिया की तरफ़
    दोनों हाथ फैलाकर
    बार बार बताती हैं :





    हम चुडै़लें हैं,
    हम औरतें थीं;
    हमारी भी जात-बिरादरी थी,
    हममें भी ऊँच-नीच थी,
    हमारे भी धरम-ईमान थे,
    लकिन मर्दों ने
    जब जब हमें घरों से निकाला,
    हंटरों से पीटा
    ठोकरों से मारा,
    आग में झोंका,
    पहियों तले रौंदा,
    खेतों में फाड़ा,
    दफ्तरों में उघाड़ा,
    बिस्तर में भोगा,
    बाज़ार में बेचा,
    सडकों पर नंगे घुमाया,
    मगरमच्छों को खिलाया,
    तंदूर में पकाया,
    तब तब हमने जाना :
    हमारी कोई
    जात-बिरादरी न थी;
    हममें कोंई
    ऊँच-नीच न थी;
    हमारे कोई
    धरम-ईमान न थे;
    हम औरतें थीं,
    सिर्फ़ औरतें;
    मर्दों की खातिर औरतें!





    रूप कुंवर, शाह बानो,
    लता, अमीना, भंवरी बाई,
    माया त्यागी, फूलन...........,
    श्रीमती अ,
    मैडम ब,
    या बेगम स..........
    नाम कुछ भी हो,
    औरतें सिर्फ़ औरतें हैं
    मर्दों की दुनिया में.
    औरतें.....चुडै़लें......!
    चुडै़लें........औरतें......!




    सुनो, सुनो,
    अवधूतो! सुनो,
    साधुओ! सुनो,
    इन नारों को सुनो,
    इन भाषणों को सुनो,
    संसद और विधान मंडलों को
    घेरकर उठती हुई
    इन आवाजों को सुनो,
    रुदालियों की पोशाक में
    मर्द स्यापा कर रहे हैं,
    छाती पीट रहे हैं,
    धरती कूट रहे हैं,
    आसमान फाड़ रहे हैं.



    मानते हैं -
    औरतजात एक हैं
    सारी दुनिया में;
    पर कुर्सी की राजनीति को
    ऐसा एका बर्दाश्त नहीं,
    कुर्सी की खातिर उन्हें
    तोड़ना ही होगा
    जात - बिरादरी में,
    बिखेरना ही होगा
    धर्म और मजहब में !




    और वे चीख रहे हैं:


    औरतें एक नहीं हैं!
    औरतें एक नहीं हो सकतीं!
    कैसे हो सकती हैं औरतें एक,
    हमसे पूछे बिना?






    सुनो, सुनो,
    अवधूतो ! सुनो,
    साधुओ ! सुनो,
    इतिहास के खँडहर में
    नाच रही हैं चुडै़लें
    हँसती हुईं, रोती हुईं , गाती हुईं :





    दुनिया भर की औरतों , एक हो !
    तुम्हारे पास कुछ भी नहीं है
    खोने को -
    सिवा मर्दों की गुलामी के !!

    (स्रोत : ताकि सनद रहे , २००२, पृष्ठ : ९८-१०२)





    --
    Posted By कविता वाचक्नवी to Beyond The Second Sex (स्त्रीविमर्श) at 11/17/2008 04:17:00 PM
    November 11

    विश्वम्भरा का वार्षिक अधिवेशन एवम् स्थापना दिवस व्याख्यान 12 नव. को








    भारतीय जीवनमूल्यों के लिए समर्पित साहित्यिक,सामाजिक,सांस्कृतिक संस्था
    "विश्वम्भरा" का वार्षिकोत्सव 12 नव. 2008 बुधवार को सायं (ठीक 5 बजे) गगन विहार, नामपल्ली स्थित आ.प्र. हिन्दी अकादमी के सभाकक्ष में संपन्न होगा।


    इस अवसर पर संस्था के मानद मुख्य संरक्षक डॊ. सी. नारायण रेड्डी ( ज्ञानपीठ सम्मान गृहीता,पद्मभूषण) उपस्थित रहेंगे तथा सीफ़ेल (अंग्रेजी एवं विदेशी भाषा विश्वविद्यालय ) के रूसी विभाग के आचार्य डॊ. जगदीश प्रसाद डिमरी "संस्कृत और संस्कृति" विषय पर "विश्वम्भरा-स्थापनादिवस व्याख्यान" देंगे। समारोह की अध्यक्षता "स्वतन्त्र वार्ता" के सम्पादक डॊ. राधेश्याम शुक्ल करेंगे। मुख्य अतिथि के रूप में आ.प्र. हिन्दी अकादमी के अध्यक्ष पद्मश्री डॊ. यार्लगड्डा लक्ष्मीप्रसाद तथा विशेष अतिथि के रूप में प्रसिद्ध चित्रकार एवं कलासंग्राहक पद्मश्री जगदीश मित्तल आसन ग्रहण करेंगे। इस अवसर पर विशेष रूप भाग लेने के लिए जबलपुर से नगर पधार रहे कवि समीक्षक आनन्द कृष्ण भी संस्था का आतिथ्य ग्रहण करेंगे।

    विश्वम्भरा की संस्थापक महासचिव डॊ. कविता वाचक्नवी ने सभी साहित्य व संस्कृतिप्रेमियों को इस अवसर पर आमन्त्रण व उपस्थित रहने का अनुरोध किया है ।
    October 15

    शोकगीत : एक लडकी की आत्मह्त्या पर

    शोकगीत : एक लडकी की आत्मह्त्या पर

     
     
    दहक रही यह चिता तुम्हारी, धधक रहे अंगारे .
    तरुणि! तुम्हारे अल्हड यौवन को लपटें शृंगारें .
    कौन सुन रहा है मरघट में, विकल ह्रदय का रोदन ?
    केवल तीक्ष्ण हवाएं करतीं , 'सांय-सांय' अनुमोदन.
    अरी कुमारी, सखी, वेदने, ओ दर्दों की बेटी !
    असमय परिचित हुई मृत्यु से, और चिता में लेटी .

    चिता ही है जीवन का सार.
    देवि! नश्वर सारा संसार..[ १ ]
    प्रसव क्षणों की महावेदना से जब मुक्ति जुटा कर.
    जिस दिन पहले-पहल सखी! तुम रोईं जग में आकर .
    सोच रहा था नन्हा मन, यह जीवन का वरदान मिला.
    इसीलिए तो रोकर के भी, नादानी में फूल खिला.
    किंतु तुम्हें क्या ज्ञात, उसी क्षण क्या जननी पर बीता.
    रोया उन्मन निर्धन बापू, देख देख घर रीता.
    ज्ञात था उन्हें विश्व का सार .
    बिना धन जीवन है निस्सार. [२]
    खेलीं छोटे से आँगन में ,जब तुम किलक किलक कर .
    भरा अंक में जब जननी ने तुमको पुलक पुलक कर.
    मुस्कानों से नन्हीं बाला ! तुमने फूल खिलाए .
    औ' ललाट पर निज बापू के स्नेहिल चुम्बन पाए .
    रहीं खेलती और किलकती , पुलक रहीं मन ही मन.
    तुम क्या जानी गृह स्वामी का कैसे सुलगा जीवन ?

    निरीहों पर फणि की फुंकार.
    निर्धनों पर विधि की हुंकार..[३]
    यदा कदा चलता ही रहता अन्न अभाव उपवास.
    कई दिनों तक जीते रहते पीकर बस वातास.
    किंतु तुम्हें तो सखी! सदा ही दूध खरीद पिलाया.
    शुष्क छातियों से पिलवाती क्या निर्धन की जाया ?
    रहीं अपरिचित कैसे घर में हर प्राणी जीता है.
    केवल दर्द भरा है सबमें शेष सभी रीता है.

    मिला उनको शून्य उपहार.
    हँसा उनपर अपना संसार .. [४]
    गली मुहल्ले में जाकर भी , सखी , बहुत तुम खेली.
    निर्धनता किसको कहते हैं ? समझ न सकीं , सहेली!
    बचपन में जितनी लीलाएं की होंगी सीता ने.
    जितना स्नेह दिया गोपों को प्रिय बाला राधा ने.
    रंकसुते ! तुमने भी उतनी लीला करनी चाहीं.
    मन का सारा स्नेह उडेला ,सखियों की गलबाहीं .

    साम्य का बचपन में विस्तार .
    मुग्ध जिस पर कवि का संसार .. [५]

    याद नहीं या वह दिन तुमको? मरघट की सुकुमारी !
    जिस दिन नभ में रंग उड़ा था, गलियों में पिचकारी..
    देख रही थीं तुम क्रीडा को, निज प्यासा मन मारे .
    स्नेहमयी माता शैया पर पड़ी रोग तन धारे.
    बदन तप्त था ,बस गृहस्वामी खड़ा हुआ सिरहाने .
    मन ही मन था देव मनाता , बुरा किया विधना ने !

    फागुन पर बिजली का प्रहार.
    सूना फाग , निर्धन घर-बार ..[६]
    फ़िर दीवाली भी तो आई , जगमग जगमग करती .
    धनिकों के ऊंचे महलों में दीप शिखाएं धरती
    अंधकार में रही उपेक्षित किंतु तुम्हारी कुटिया .
    जला न चूल्हा तक पर वैभव जला रहा फुल झडियाँ .. ..
    पहली बार बताया माँ ने ''बेटी , हम गरीब हैं.
    रो मत मांग न खील खिलौने , बेटी , हम गरीब हैं.''

    गरीबी का पहला उपहार
    भावना का निर्मम संहार .. [७]

    अब तक तो सब ही मानव थे सखी तुम्हारे लेखे
    किंतु वर्ग दो उस दिन तुमने अपनी आंखों देखे.
    टुकडे कर डाले मानस के नर ने धन के पीछे
    मानव स्वयं समाज मध्य ही सीमा रेखा खींचे
    प्रश्न उठा था उस दिन मन में ,किसने करी व्यवस्था ?
    समझ न सकी पहेली लेकिन , रही अबोध अवस्था

    बने सपने झंझा अवतार
    रुदन ही निर्धन का आधार [८]

    धीरे धीरे सखी खो रहीं थीं तुम अपना बचपन
    .इठलाना इतराना यों ही सीख रहा था जीवन.
    तभी तुम्हारी एक सहेली , विदा हुई ससुराल
    लाखों की संपत्ति गई थी यह धनिकों की चाल .
    बिखर रहे थे जब डोली पर खन खन खोटे सिक्के .
    लूट रही थीं तुम भी उनको, खाकर धक्के मुक्के

    वधू ने किए सभी श्रृंगार
    देख मचला मन का संसार . [९]

    एक कल्पना मन में बैठी ,है मुझको भी सजना
    हाथों में रचनी है मेहदी , चरण महावर रचना
    स्वर्ण भूषणों से लद करके मुझको भी जाना है.
    और स्वर्ण से कीर्तिमान निज साजन को पाना है.
    पति-इच्छा ने तुमको क्रमश: यौवन दिया कुमारी
    होठों पर मीठी मुस्कानें ,आँखें ज़हर कटारी
    .
    रूपरेखा मनसिज की मार
    बिंधा फूलों से ही संसार .. [१०]
    कठिन हैं कठिन,किशोरी , सत्य , पुष्प-धन्वा के तीर .
    कठिन है कठिन कुंवारी आयु , कठिन रीता पण पीर ..
    बांधता काम देव का पाश , स्वयं चंचल मन उन्को.
    प्रकृति को सदा पुरूष के साथ ,यौवन से यौवन को ..
    रहीं चूमती तुम अपना ही बिम्ब देख दर्पण में .
    शर की नोक लिए हाथों में ,मदन लगा सर्जन में.

    सीखने लगीं प्रेम व्यवहार
    चुभाता सूनापन अब खार ..[११]
    स्वप्न के कुशल चितेरे ने निशा के काले पट पर.
    अनोखे चित्र खींच डाले नयन में दो क्षण रुक कर..
    मिला पलकों की रेखा को अनोखा बांक पाना ,री !
    देह - आकर्षण दुगुना हुआ, हुई कटि क्षीण तुम्हारी ..
    मन ने देखे सपने घोडे वाले राज कुँवर के
    अंग अंग में मन-रंजन के , चुम्बन -आलिंगन के...

    तुम्हारा यौवन का संभार !
    पिता पर चिंता ,दुर्वह भार !![१२]
     
    बाप हो चला बूढा, तुम थीं युवा हो रही आतुर
    मिला चाँद का रूप तुम्हें औ' मधुर कोकिला के सुर ..
    जाने किस दिन हाथ सुता के हो पायेंगे पीले?
    इस चिंता में स्वयं पिता के अंग हो चले ढीले
    एक प्रश्न था बस दहेज़ का उस निर्धन के आगे
    पुत्री उसे मिली अनमाँगे , कौन पाप थे जागे !

    .
    सबसे कम माँगे दस हज़ार.*
    दिशाएं करतीं हाहाकार [१३]
    [*यह घटना १९७४ में कोडरमा,बिहार में घटित हुई थी.]


    निर्धन की एक मात्र पूंजी , हा ! बस तुम थीं, रूपसि !
    जिसकेलिए जिया था अबतक वह तुम ही थीं , रूपसि !
    कब तक घर में तुम्हें कुँवारी बैठाए रख पाता
    आंखों आगे कामदेव के तीरों से मरवाता
    पर पैसे के बिना विश्व में क्या कुछ हो पाता है?
    सब रिश्ते झूठे हैं जग में ,धन सच्चा नाता है!

    गरीबों पर बेटी का भार !
    विश्व में कौन करे उद्धार?[१४]

    विवश पिता ने जाना केवल, अपना एक सहारा .
    भीख माँगने हर चौखट पर उसने हाथ पसारा..
    यह कंगाली की सीमा थी , सौदा नव यौवन का.
    मौन देखता रहा विश्व यह नुच-लुटना तन-मन का..
    किंतु तुम्हारा मान किशोरी! आहत होकर जागा.
    खा न सका वह जगती को तो तुमको डसने भागा..

    हुई थी सचमुच गहरी मार .
    प्रकम्पित था मन का संसार..[१५]

    मान? मान के पीछे जग में हुआ नहीं है क्या-क्या?
    अति विचित्र इतिहास मान का ,सुना नहीं है क्या-क्या?
    अधरों तक आकर भी प्याला,लौट चले जब यों ही.
    स्वप्निल पलकें अविचुम्बित ही उठ जाएँ जब यों ही..
    उठी रहें अम्बर में बाहें, बिकें विकल आलिंगन.
    आशाएं हिम से आहत हों, उपालंभ दे कण-कण.

    क्षुब्ध करती मन का संसार.
    टूटते तारों की झंकार.. [१६]


    रोती रहीं रात भर तुम यों, अब क्या होने वाला?
    भर-भर करके रहीं रीतती, तुम आंखों का प्याला..
    आह! प्रेयसी! सूज गए वे आकर्षणमय लोचन.
    तरुणाई अभिशाप बन गई , ज़हर बन गया यौवन..
    सब सोए थे बेसुध होकर, तुम उठ चलीं अकेली.
    सूने पनघट पर पहुँचीं तुम, बहुत वेदना झेली..

    हुआ जलमग्न श्वास संसार
    गईं तुम जगती के उस पार..[१७]



    रोकर बापू तुम्हें ले चला पनघट से मरघट को .
    पर घट से क्या तुम्हें प्रयोजन ,पार किया अवघट को..
    घट बनकर तुम स्वयं पी चुकीं सारा ही पनघट तो.
    केवल रस्म मात्र को फूटा मरघट में वह घट तो..
    जली स्वर्ण सी देह चिता में अलकों का वह मधुवन.
    जला और जल गया अचानक मौन अकेला यौवन..

    चिता ही है जीवन का सार!
    देवि! नश्वर सारा संसार !![१८]