मैं घर से निकल आई थी तुम्हें पाने को , मैंने धरम की दीवार गिराई थी तुम्हें पाने को, अपने पिता से आँख मिलाई थी - भाई से ज़बान लड़ाई थी - तुम्हें पाने को!
माँ अपनी कोख नाखूनों से नोंचती रह गई , पिता ने जीते जी मेरा श्राद्ध कर दिया; मैंने मुड़ कर नहीं देखा. मैं अपना इतिहास जलाकर आई थी - तुम्हें पाने को!
तुमने मुझे नया नाम दिया - मैंने स्वीकार किया , तुमने मुझे नया मज़हब दिया - मैंने अंगीकार किया. वैसे ये शब्द उतने ही निरर्थक थे जितना मेरा जला हुआ अतीत. मैंने प्रतिकार नहीं किया था . तुम जैसे भी थे,जो भी थे - बेशर्त मेरे प्रेमपात्र थे. मैं भागी चली आई थी तुम्हें पाने को ;
और सो गई थी थककर चकनाचूर.
आँख खुली तो तुम्हारी दाढ़ी उग आई थी , तुम हिजाब कहकर मेरे ऊपर कफ़न डाल रहे थे.
तुम्हारी आँखों में देखा मैंने झाँककर - ये तो मेरे पिता की आँखें हैं! मैं देखती ही रह गई ; तुमने मुझे ज़िंदा कब्र में गाड़ दिया!
एक बार फिर सब कुछ जलाना होगा - मुझे खुद को पाने को!!
प्रशस्तियाँ मैंने जब भी कुछ पाया
मर खप कर पाया
खट खट कर पाया
अग्नि की धार पर गुज़र कर पाया
पाने की खुशी
लेकिन कभी नहीं पाई
खुशी से पहले हर बार
सुनाई देती रहीं मेरी प्रशस्ति में
दुर्मुखों की फुसफुसाहटें
धोबियों की गालियाँ
और मन्थराओं की बोलियाँ
शिक्षा हो या व्यवसाय
प्रसिद्धि हो या पुरस्कार
हर बार उन्होंने यही कहा -
चर्म-मुद्रा चल गई!
[चर्म-चर्वण से परे वे कभी गए ही नहीं!]
मैंने हर दौड़ में उन्हें पीछे छोड़ा
हर मैदान में पछाड़ा,
उन्होंने मेरा पीछा नहीं छोड़ा
मैं कच्चे सूत पर चलकर भर लाई घड़ों पानी
वे किनारे पर ही ऊभ-चूभ हैं!! O
चिकनी पीली मिट्टी को
कुएँ के मीठे पानी में गूँथ कर
बनाया था माँ ने वह चूल्हा
और पूरे पंद्रह दिन तक
तपाया था जेठ की धूप में
दिन - दिन भर
उस दिन
आषाढ़ का पहला दौंगड़ा गिरा,
हमारे घर का बगड़
बूँदों में नहा कर महक उठा था,
रसोई भी महक उठी थी -
नए चूल्हे पर खाना जो बन रहा था.
गाय के गोबर में
गेहूँ का भुस गूँथ कर
उपले थापती थी माँ बड़े मनोयोग से
और आषाढ़ के पहले
बिटौड़े में सजाती थी उन्हें
बड़ी सावधानी से .
बूँदाबाँदी के बीच बिटौड़े में से
बिना भिगोए उपले लाने में
जो सुख मिलता था ,
आज लॉकर से गहने लाने में भी नहीं मिलता.
सूखे उपले
भक्क से पकड़ लेते थे आग
और
उँगलियों को लपटों से बचाती माँ
गही में सेंकती थी हमारे लिए रोटी
- फूले फूले फुलके.
गेहूँ की रोटी सिंकने की गंध
बैठक तक ही नहीं , गली तक जाती थी.
हम सब खिंचे चले आते थे
रसोई की ओर.
जब महकता था बारिश में बगड़
और महमहाती थी गेहूँ की गंध से रसोई -
माँ गुनगुना उठती थी
कोई लोकगीत - पीहर की याद का.
माँ के गीतों में प्यार बहुत था
पर पीड़ा और शिकायत भी थी.
बारिश में बना रही हूँ रोटियाँ,
भीगे झोंके भीतर घुसे आते हैं.
मेरे बीरा ! इन झोंकों को रोक दे न !
बड़े बदमाश हैं ये झोंके,
कभी आग को बढ़ा देते हैं
कभी बुझा देते हैं आग को.
आग बढ़ती है
तो रोटी जलने लगती है.
तेरे बहनोई को जली रोटी पसंद नहीं रे!
रोटी को बचाती हूँ तो उँगली जल जाती है.
माँ की उँगलियाँ छालों से भर जाती थीं
पर पिताजी की रोटी पर एक भी काला निशान कभी नहीं दिखा!
माँ के गीतों में प्यार बहुत था
पर पीड़ा और शिकायत भी थी.
बारिश में बना रही हूँ रोटियाँ,
भीगे झोंके भीतर घुसे आते हैं.
मेरे बीरा ! इन झोंकों को रोक दे न !
बड़े बदमाश हैं ये झोंके ,
कभी आग को बढ़ा देते हैं
कभी बुझा देते हैं आग को.
आग बुझती है
तो रोटी फूलती नहीं
तेरा भानजा अधफूली रोटी नहीं खाता रे!
बुझी आग जलाती हूँ तो आँखें धुएँ से भर जाती हैं.
माँ की आँखों में मोतियांबिंद उतर आया
पर मेरी थाली में कभी अधफूली रोटी नहीं आई!
माँ के गीतों में प्यार बहुत था
पर पीड़ा और शिकायत भी थी.
रोटी बनाना सीखती मेरी बेटी
जब तवे पर हाथ जला लेती है,
आँखें मसलती
रसोई से निकलती है.
तो लगता है
माँ आज भी गुनगुना रही है .
मेरे बीरा ! इन झोंकों को रोक दे न!
बड़े बदमाश हैं ये झोंके,
कभी आग को बढ़ा देते हैं
कभी बुझा देते हैं आग को.
माँ के गीतों में प्यार बहुत था
पर पीड़ा और शिकायत भी थी.
वे वीर हैं
मैं वसुंधरा.
उनके-मेरे बीच एक ही सम्बन्ध -
'वीर भोग्या वसुंधरा.'
वे सदा से मुझे जीतते आए हैं
भोगते आए हैं,
उनकी विजयलिप्सा अनादि है
अनंत है
विराट है.
जब वे मुझे नहीं जीत पाते
तो मेरी बेटियों पर निकालते हैं अपनी खीझ
दिखाते हैं अपनी वीरता.
युद्ध कहने को राजनीति है
पर सच में जघन्य अपराध !
अपराध - मेरी बेटियों के खिलाफ
औरतों के खिलाफ !
युद्धों में पहले भी औरतें चुराई जाती थीं
उनके वस्त्र उतारे जाते थे
बाल खींचे जाते थे
अंग काटे जाते थे
शील छीना जाता था ,
आज भी यही सब होता है.
पुरुष तब भी असभ्य था
आज भी असभ्य है,
तब भी राक्षस था
आज भी असुर है.
वह बदलता है हार को जीत में
औरतों पर अत्याचार करके.
सिपाही और फौजी
बन जाते हैं दुर्दांत दस्यु
और रौंद डालते हैं मेरी बेटियों की देह ,
निचोड़ लेते हैं प्राण देह से.
औरते या तो मर जाती हैं
[ लाखों मर रही हैं ]
या बन जाती हैं गूँगी गुलाम
..
वे विजय दर्प में ठहाके लगाते हैं !
वे रौंद रहे हैं रोज मेरी बेटियों को
मेरी आँखों के आगे.
पति की आँखों के आगे
पत्नी के गर्भ में घुसेड़ दी जाती हैं गर्म सलाखें.
माता-पिता की आँखों आगे
कुचल दिए जाते हैं अंकुर कन्याओं के.
एक एक औरत की जंघाओं पर से
फ्लैग मार्च करती गुज़रती है पूरी फौज,
माँ के विवर में ठूँस दिया जाता है बेटे का अंग !
औरतें औरतें हैं
न बेटियाँ हैं, न बहनें;
वे बस औरतें हैं
बेबस औरतें हैं.
दुश्मनों की औरतें !
फौजें जानती हैं
जनरल जानते हैं
सिपाही जानते हैं
औरतें औरतें नहीं होतीं
अस्मत होती हैं किसी जाति की.
औरतें हैं लज्जा
औरतें हैं शील
औरतें हैं अस्मिता
औरते हैं आज़ादी
औरतें गौरव हैं
औरतें स्वाभिमान.
औरतें औरतें नहीं
औरतें देश होती हैं.
औरत होती है जाति
औरत राष्ट्र होती है.
जानते हैं राजनीति के धुरंधर
जानते हैं रावण और दुर्योधन
जानते हैं शुम्भ और निशुम्भ
जानते हैं हिटलर और याहिया
कि औरतें औरतें नहीं हैं,
औरतें देश होती हैं.
औरत को रौंदो
तो देश रौंदा गया ,
औरत को भोगो
तो देश भोगा गया ,
औरत को नंगा किया
तो देश नंगा होगा,
औरत को काट डाला
तो देश कट गया.
जानते हैं वे
देश नहीं जीते जाते जीत कर भी,
जब तक स्वाभिमान बचा रहे!
इसीलिए
औरत के जननांग पर
फहरा दो विजय की पताका
देश हार जाएगा आप से आप!
इसी कूटनीति में
वीरगति पा रही हैं
मेरी लाखों लाख बेटियाँ
और आकाश में फहर रही हैं
कोटि कोटि विजय पताकाएँ!
इन पताकाओं की जड़ में
दफ़न हैं मासूम सिसकियाँ
बच्चियों की
उनकी माताओं की
उनकी दादियों-नानियों की.
उन सबको सजा मिली
औरत होने की
संस्कृति होने की
सभ्यता होने की.
औरतें औरतें नहीं हैं
औरतें हैं संस्कृति
औरतें हैं सभ्यता
औरतें मनुष्यता हैं
देवत्व की संभावनाएँ हैं औरतें!
औरत को जीतने का अर्थ है
संस्कृति को जीतना
सभ्यता को जीतना,
औरत को हराने का अर्थ है
मनुष्यता को हराना,
औरत को कुचलने का अर्थ है
कुचलना देवत्व की संभावनाओं को,
इसीलिए तो
उनके लिए
औरतें ज़मीनें हैं;
वे ज़मीन जीतने के लिए
औरतों को जीतते हैं!
पहले वे लंबे चोगों पर सफ़ेद गोल टोपी पहनकर आए थे और मेरे चेहरे पर तेजाब फेंककर मुझे बुरके में बाँधकर चले गए थे.
आज वे फिर आए हैं संस्कृति के रखवाले बनकर एक हाथ में लोहे की सलाखें और दूसरे हाथ में हंटर लेकर.
उन्हें शिकायत है मुझसे !
औरत होकर मैं प्यार कैसे कर सकती हूँ , सपने कैसे देख सकती हूँ , किसी को फूल कैसे दे सकती हूँ !
मैंने किसी को फूल दिया - उन्होंने मेरी फूल सी देह दाग दी. मैंने उड़ने के सपने देखे - उन्होंने मेरे सुनहरे पर तराश दिए. मैंने प्यार करने का दुस्साहस किया - उन्होंने मुझे वेश्या बना दिया.
वे यह सब करते रहे और मैं डरती रही, सहती रही, - अकेली हूँ न ?
कोई तो आए मेरे साथ , मैं इन हत्यारों को - तालिबों और मुजाहिदों को - शिव और राम के सैनिकों को - मुहब्बत के गुलाब देना चाहती हूँ. बताना चाहती हूँ इन्हें --
''न मैं अश्लील हूँ , न मेरी देह. मेरी नग्नता भी अश्लील नहीं -वही तो तुम्हें जनमती है! अश्लील है तुम्हारा पौरुष -औरत को सह नहीं पाता. अश्लील है तुम्हारी संस्कृति - पालती है तुम-सी विकृतियों को !
''अश्लील हैं वे सब रीतियाँ जो मनुष्य और मनुष्य के बीच भेद करती हैं. अश्लील हैं वे सब किताबें जो औरत को गुलाम बनाती हैं , -और मर्द को मालिक / नियंता . अश्लील है तुम्हारी यह दुनिया -इसमें प्यार वर्जित है और सपने निषिद्ध !
''धर्म अश्लील हैं -घृणा सिखाते हैं ! पवित्रता अश्लील है -हिंसा सिखाती है !''
वे फिर-फिर आते रहेंगे -पोशाकें बदलकर -हथियार बदलकर ; करते रहेंगे मुझपर ज्यादती.
पहले मुझे निर्वस्त्र करेंगे और फिर वस्त्रदान का पुण्य लूटेंगे.
वे युगों से यही करते आए हैं - फिर-फिर यही करेंगे जब भी मुझे अकेली पाएँगे !
नहीं ; मैं अकेली कहाँ हूँ .... मेरे साथ आ गई हैं दुनिया की तमाम औरतें .... --काश ! यह सपना कभी न टूटे !
- ऋषभ देव शर्मा
-- Posted By कविता वाचक्नवी to Beyond The Second Sex (स्त्रीविमर्श) at 2/17/2009 11:56:00 PM
बरस भर वह उगलता रहा मेरे मुँह पर दिन भर का तनाव हर शाम ! आज नए बरस की पहली भोर मैंने दे मारा पूरा भरा पीकदान उसके माथे पर !! कैसा लाल - लाल उजाला फ़ैल गया सब ओर !!!
सुनो दुश्मन! मैं न तो किसी फौज का जनरल हूँ, न किसी देश का प्रधानमंत्री, मैं दूरदर्शन का निदेशक भी नहीं हूँ और खुफ़िया विभाग की नौकरी भी कब का छोड़ चुका हूँ, मैं कोई वाइस चांसलर भी नहीं हूँ, न मैं किसी का अंग रक्षक हूँ न मेरा कोई अंग रक्षक।
मैं तो एक यात्री हूँ बस या ट्रेन की सीट पर ऊँघता हुआ, दफ्तर, बाज़ार और घर के तिकोन में भटकता हुआ, और इसीलिए तुम्हारी हिट-लिस्ट का एक नाम-रूप-हीन निशाना हूँ।
हर दिशा में मेरा पीछा कर रही है तुम्हारी आर डी एक्स की दैत्याकार आँख- सूँघती हुई बारूदी नथुनों से 'सूँ साँ माणस गंध'
लगातार दौड़ रहा हूँ मैं पर यह निगोड़ी 'माणस गंध' छिपाए नहीं छिपती।
तो ठीक है इस गंध को ही हथियार बनाना पड़ेगा अब मुझे...
लो, दौड़ना छोड़कर आ खड़ा हुआ हूँ तुम्हारे सामने निर्णायक युद्ध में, क्योंकि अर्थहीन हो गए हैं। वे सारे देवता जिन्होंने लिया था भार भारत का, लोकतंत्र के योगक्षेम का,
जय अथवा पराजय अप्रासंगिक है मेरे और तुम्हारे इस युद्ध में... प्रासंगिक है तो केवल तुम्हारा आसुरी उन्माद, प्रभुओं की नपुंसकता और मेरे अभिमन्युपन की शाश्वत माणस गंध!!!
कबीर ने आज फिर एक अचंभा देखा है आज फिर पानी में आग लगी है आज फिर चींटी पहाड़ चढ़ रही है नौ मन काजर लाय, हाथी मार बगल में देन्हें ऊँट लिए लटकाय!
नहीं समझे? अरे, देखते नहीं अकल के अंधो! औरतों की वकालत के लिए मर्द निकले हैं, कुरते-पाजामे-धोती-टोपी वाले मर्द! वे उन्हें उनके हक़ दिलवाकर ही रहेंगे .
राजनीति में सब कुछ सम्भव है. यहाँ घोड़े और घास में यारी हो सकती है . कुर्सी कुछ भी करा सकती है. -कुर्सी महा ठगिनी हम जानी!
कुर्सी का ही तो प्रताप है कि शेर हिरनियों की हिफाजत कर रहे हैं (मर्द औरतों की वकालत कर रहे हैं).
सुनो, सुनो, अवधूतो! सुनो, साधुओं! सुनो, इन चीखों को सुनो, इतिहास के खंडहरों को चीरकर आती हुई ये चीखें औरतों की हैं, मर्दों की सताई हुई औरतों की कलपती हुई आत्माएं नाचती हैं चुडैल बनकर, हाहाकार मचाती हैं, चीखती चिल्लाती हैं, दुनिया की तरफ़ दोनों हाथ फैलाकर बार बार बताती हैं :
हम चुडै़लें हैं, हम औरतें थीं; हमारी भी जात-बिरादरी थी, हममें भी ऊँच-नीच थी, हमारे भी धरम-ईमान थे, लकिन मर्दों ने जब जब हमें घरों से निकाला, हंटरों से पीटा ठोकरों से मारा, आग में झोंका, पहियों तले रौंदा, खेतों में फाड़ा, दफ्तरों में उघाड़ा, बिस्तर में भोगा, बाज़ार में बेचा, सडकों पर नंगे घुमाया, मगरमच्छों को खिलाया, तंदूर में पकाया, तब तब हमने जाना : हमारी कोई जात-बिरादरी न थी; हममें कोंई ऊँच-नीच न थी; हमारे कोई धरम-ईमान न थे; हम औरतें थीं, सिर्फ़ औरतें; मर्दों की खातिर औरतें!
रूप कुंवर, शाह बानो, लता, अमीना, भंवरी बाई, माया त्यागी, फूलन..........., श्रीमती अ, मैडम ब, या बेगम स.......... नाम कुछ भी हो, औरतें सिर्फ़ औरतें हैं मर्दों की दुनिया में. औरतें.....चुडै़लें......! चुडै़लें........औरतें......!
सुनो, सुनो, अवधूतो! सुनो, साधुओ! सुनो, इन नारों को सुनो, इन भाषणों को सुनो, संसद और विधान मंडलों को घेरकर उठती हुई इन आवाजों को सुनो, रुदालियों की पोशाक में मर्द स्यापा कर रहे हैं, छाती पीट रहे हैं, धरती कूट रहे हैं, आसमान फाड़ रहे हैं.
मानते हैं - औरतजात एक हैं सारी दुनिया में; पर कुर्सी की राजनीति को ऐसा एका बर्दाश्त नहीं, कुर्सी की खातिर उन्हें तोड़ना ही होगा जात - बिरादरी में, बिखेरना ही होगा धर्म और मजहब में !
और वे चीख रहे हैं:
औरतें एक नहीं हैं! औरतें एक नहीं हो सकतीं! कैसे हो सकती हैं औरतें एक, हमसे पूछे बिना?
सुनो, सुनो, अवधूतो ! सुनो, साधुओ ! सुनो, इतिहास के खँडहर में नाच रही हैं चुडै़लें हँसती हुईं, रोती हुईं , गाती हुईं :
दुनिया भर की औरतों , एक हो ! तुम्हारे पास कुछ भी नहीं है खोने को - सिवा मर्दों की गुलामी के !!
भारतीय जीवनमूल्यों के लिए समर्पित साहित्यिक,सामाजिक,सांस्कृतिक संस्था "विश्वम्भरा"का वार्षिकोत्सव 12 नव. 2008 बुधवार को सायं (ठीक 5 बजे) गगन विहार, नामपल्ली स्थित आ.प्र. हिन्दी अकादमी के सभाकक्ष में संपन्न होगा।
इस अवसर पर संस्था के मानद मुख्य संरक्षकडॊ. सी. नारायण रेड्डी ( ज्ञानपीठ सम्मान गृहीता,पद्मभूषण) उपस्थित रहेंगे तथा सीफ़ेल (अंग्रेजी एवं विदेशी भाषा विश्वविद्यालय ) के रूसी विभाग के आचार्य डॊ. जगदीश प्रसाद डिमरी"संस्कृत और संस्कृति" विषय पर"विश्वम्भरा-स्थापनादिवस व्याख्यान" देंगे। समारोह की अध्यक्षता "स्वतन्त्र वार्ता" के सम्पादक डॊ. राधेश्याम शुक्ल करेंगे। मुख्य अतिथि के रूप में आ.प्र. हिन्दी अकादमी के अध्यक्ष पद्मश्री डॊ. यार्लगड्डा लक्ष्मीप्रसाद तथा विशेष अतिथि के रूप में प्रसिद्ध चित्रकार एवं कलासंग्राहक पद्मश्री जगदीश मित्तल आसन ग्रहण करेंगे। इस अवसर पर विशेष रूप भाग लेने के लिए जबलपुर से नगर पधार रहे कवि समीक्षक आनन्द कृष्ण भी संस्था का आतिथ्य ग्रहण करेंगे।
विश्वम्भरा की संस्थापक महासचिव डॊ. कविता वाचक्नवी ने सभी साहित्य व संस्कृतिप्रेमियों को इस अवसर पर आमन्त्रण व उपस्थित रहने का अनुरोध किया है ।
अरी कुमारी, सखी, वेदने, ओ दर्दों की बेटी ! असमय परिचित हुई मृत्यु से, और चिता में लेटी .
चिता ही है जीवन का सार. देवि! नश्वर सारा संसार..[ १ ]
प्रसव क्षणों की महावेदना से जब मुक्ति जुटा कर. जिस दिन पहले-पहल सखी! तुम रोईं जग में आकर . सोच रहा था नन्हा मन, यह जीवन का वरदान मिला. इसीलिए तो रोकर के भी, नादानी में फूल खिला. किंतु तुम्हें क्या ज्ञात, उसी क्षण क्या जननी पर बीता. रोया उन्मन निर्धन बापू, देख देख घर रीता.
ज्ञात था उन्हें विश्व का सार . बिना धन जीवन है निस्सार. [२]
खेलीं छोटे से आँगन में ,जब तुम किलक किलक कर . भरा अंक में जब जननी ने तुमको पुलक पुलक कर. मुस्कानों से नन्हीं बाला ! तुमने फूल खिलाए . औ' ललाट पर निज बापू के स्नेहिल चुम्बन पाए . रहीं खेलती और किलकती , पुलक रहीं मन ही मन. तुम क्या जानी गृह स्वामी का कैसे सुलगा जीवन ?
निरीहों पर फणि की फुंकार. निर्धनों पर विधि की हुंकार..[३]
यदा कदा चलता ही रहता अन्न अभाव उपवास. कई दिनों तक जीते रहते पीकर बस वातास. किंतु तुम्हें तो सखी! सदा ही दूध खरीद पिलाया. शुष्क छातियों से पिलवाती क्या निर्धन की जाया ? रहीं अपरिचित कैसे घर में हर प्राणी जीता है. केवल दर्द भरा है सबमें शेष सभी रीता है.
मिला उनको शून्य उपहार. हँसा उनपर अपना संसार .. [४]
गली मुहल्ले में जाकर भी , सखी , बहुत तुम खेली. निर्धनता किसको कहते हैं ? समझ न सकीं , सहेली! बचपन में जितनी लीलाएं की होंगी सीता ने. जितना स्नेह दिया गोपों को प्रिय बाला राधा ने. रंकसुते ! तुमने भी उतनी लीला करनी चाहीं. मन का सारा स्नेह उडेला ,सखियों की गलबाहीं .
साम्य का बचपन में विस्तार . मुग्ध जिस पर कवि का संसार .. [५]
याद नहीं या वह दिन तुमको? मरघट की सुकुमारी ! जिस दिन नभ में रंग उड़ा था, गलियों में पिचकारी..
देख रही थीं तुम क्रीडा को, निज प्यासा मन मारे . स्नेहमयी माता शैया पर पड़ी रोग तन धारे. बदन तप्त था ,बस गृहस्वामी खड़ा हुआ सिरहाने . मन ही मन था देव मनाता , बुरा किया विधना ने !
फागुन पर बिजली का प्रहार. सूना फाग , निर्धन घर-बार ..[६]
फ़िर दीवाली भी तो आई , जगमग जगमग करती . धनिकों के ऊंचे महलों में दीप शिखाएं धरती अंधकार में रही उपेक्षित किंतु तुम्हारी कुटिया . जला न चूल्हा तक पर वैभव जला रहा फुल झडियाँ .. .. पहली बार बताया माँ ने ''बेटी , हम गरीब हैं. रो मत मांग न खील खिलौने , बेटी , हम गरीब हैं.''
गरीबी का पहला उपहार भावना का निर्मम संहार .. [७]
अब तक तो सब ही मानव थे सखी तुम्हारे लेखे किंतु वर्ग दो उस दिन तुमने अपनी आंखों देखे. टुकडे कर डाले मानस के नर ने धन के पीछे मानव स्वयं समाज मध्य ही सीमा रेखा खींचे प्रश्न उठा था उस दिन मन में ,किसने करी व्यवस्था ? समझ न सकी पहेली लेकिन , रही अबोध अवस्था
बने सपने झंझा अवतार रुदन ही निर्धन का आधार [८]
धीरे धीरे सखी खो रहीं थीं तुम अपना बचपन .इठलाना इतराना यों ही सीख रहा था जीवन. तभी तुम्हारी एक सहेली , विदा हुई ससुराल लाखों की संपत्ति गई थी यह धनिकों की चाल . बिखर रहे थे जब डोली पर खन खन खोटे सिक्के . लूट रही थीं तुम भी उनको, खाकर धक्के मुक्के
वधू ने किए सभी श्रृंगार देख मचला मन का संसार . [९]
एक कल्पना मन में बैठी ,है मुझको भी सजना हाथों में रचनी है मेहदी , चरण महावर रचना स्वर्ण भूषणों से लद करके मुझको भी जाना है. और स्वर्ण से कीर्तिमान निज साजन को पाना है. पति-इच्छा ने तुमको क्रमश: यौवन दिया कुमारी होठों पर मीठी मुस्कानें ,आँखें ज़हर कटारी
. रूपरेखा मनसिज की मार बिंधा फूलों से ही संसार .. [१०]
कठिन हैं कठिन,किशोरी , सत्य , पुष्प-धन्वा के तीर . कठिन है कठिन कुंवारी आयु , कठिन रीता पण पीर .. बांधता काम देव का पाश , स्वयं चंचल मन उन्को. प्रकृति को सदा पुरूष के साथ ,यौवन से यौवन को .. रहीं चूमती तुम अपना ही बिम्ब देख दर्पण में . शर की नोक लिए हाथों में ,मदन लगा सर्जन में.
सीखने लगीं प्रेम व्यवहार चुभाता सूनापन अब खार ..[११]
स्वप्न के कुशल चितेरे ने निशा के काले पट पर. अनोखे चित्र खींच डाले नयन में दो क्षण रुक कर.. मिला पलकों की रेखा को अनोखा बांक पाना ,री !
देह - आकर्षण दुगुना हुआ, हुई कटि क्षीण तुम्हारी .. मन ने देखे सपने घोडे वाले राज कुँवर के अंग अंग में मन-रंजन के , चुम्बन -आलिंगन के...
तुम्हारा यौवन का संभार ! पिता पर चिंता ,दुर्वह भार !![१२]
बाप हो चला बूढा, तुम थीं युवा हो रही आतुर मिला चाँद का रूप तुम्हें औ' मधुर कोकिला के सुर .. जाने किस दिन हाथ सुता के हो पायेंगे पीले? इस चिंता में स्वयं पिता के अंग हो चले ढीले एक प्रश्न था बस दहेज़ का उस निर्धन के आगे पुत्री उसे मिली अनमाँगे , कौन पाप थे जागे !
. सबसे कम माँगे दस हज़ार.* दिशाएं करतीं हाहाकार [१३] [*यह घटना १९७४ में कोडरमा,बिहार में घटित हुई थी.]
निर्धन की एक मात्र पूंजी , हा ! बस तुम थीं, रूपसि ! जिसकेलिए जिया था अबतक वह तुम ही थीं , रूपसि ! कब तक घर में तुम्हें कुँवारी बैठाए रख पाता आंखों आगे कामदेव के तीरों से मरवाता पर पैसे के बिना विश्व में क्या कुछ हो पाता है? सब रिश्ते झूठे हैं जग में ,धन सच्चा नाता है!
गरीबों पर बेटी का भार ! विश्व में कौन करे उद्धार?[१४]
विवश पिता ने जाना केवल, अपना एक सहारा . भीख माँगने हर चौखट पर उसने हाथ पसारा.. यह कंगाली की सीमा थी , सौदा नव यौवन का. मौन देखता रहा विश्व यह नुच-लुटना तन-मन का.. किंतु तुम्हारा मान किशोरी! आहत होकर जागा. खा न सका वह जगती को तो तुमको डसने भागा..
हुई थी सचमुच गहरी मार . प्रकम्पित था मन का संसार..[१५]
मान? मान के पीछे जग में हुआ नहीं है क्या-क्या? अति विचित्र इतिहास मान का ,सुना नहीं है क्या-क्या? अधरों तक आकर भी प्याला,लौट चले जब यों ही. स्वप्निल पलकें अविचुम्बित ही उठ जाएँ जब यों ही.. उठी रहें अम्बर में बाहें, बिकें विकल आलिंगन. आशाएं हिम से आहत हों, उपालंभ दे कण-कण.
क्षुब्ध करती मन का संसार. टूटते तारों की झंकार.. [१६]
रोती रहीं रात भर तुम यों, अब क्या होने वाला? भर-भर करके रहीं रीतती, तुम आंखों का प्याला.. आह! प्रेयसी! सूज गए वे आकर्षणमय लोचन. तरुणाई अभिशाप बन गई , ज़हर बन गया यौवन.. सब सोए थे बेसुध होकर, तुम उठ चलीं अकेली. सूने पनघट पर पहुँचीं तुम, बहुत वेदना झेली..
हुआ जलमग्न श्वास संसार गईं तुम जगती के उस पार..[१७]
रोकर बापू तुम्हें ले चला पनघट से मरघट को . पर घट से क्या तुम्हें प्रयोजन ,पार किया अवघट को.. घट बनकर तुम स्वयं पी चुकीं सारा ही पनघट तो. केवल रस्म मात्र को फूटा मरघट में वह घट तो.. जली स्वर्ण सी देह चिता में अलकों का वह मधुवन. जला और जल गया अचानक मौन अकेला यौवन..
मैं न तो किसी फौज का जनरल हूँ, न किसी देश का प्रधानमंत्री , मैं दूरदर्शन का निदेशक भी नहीं हूँ और खुफिया विभाग की नौकरी भी कब का छोड़ चुका हूँ, मैं कोई वाइस चांसलर भी नहीं हूँ, न मैं किसी का अंग रक्षक हूँ न मेरा कोई अंग रक्षक .
मैं तो एक यात्री हूँ बस या ट्रेन की सीट पर ऊंघता हुआ, दफ्तर, बाज़ार और घर के तिकोन में भटकता हुआ ; और इसीलिये तुम्हारी हिट-लिस्ट का एक नाम-रूप-हीन निशाना हूँ.
हर दिशा में मेरा पीछा कर रही है तुम्हारी आर डी एक्स की दैत्याकार आँख - सूंघती हुई बारूदी नथुनों से 'सूँ साँ माणस गंध'.......
लगातार दौड़ रहा हूँ मैं पर यह निगोड़ी ' माणस गंध'....... छिपाए नहीं छिपती.
तो ठीक है इस गंध को ही हथियार बनाना पड़ेगा अब मुझे..
लो , दौड़ना छोड़कर आ खड़ा हुआ हूँ
तुम्हारे सामने निर्णायक युद्ध में, क्योंकि अर्थहीन हो गए हैं. वे सारे देवता जिन्होंने लिया था भार भारत का , लोकतंत्र के योगक्षेम का ,
जय अथवा पराजय अप्रासंगिक है मेरे और तुम्हारे इस युद्ध में....... प्रासंगिक है तो केवल तुम्हारा आसुरी उन्माद , प्रभुओं की नपुंसकता और मेरे अभिमन्युपन की शाश्वत माणस गंध !!! .....................................१२/५/१९९० ...................
अब बात करें कविता संग्रह ’ताकि सनद रहे’ (ऋषभ : २००२) की।
सामयिक घटनाओं को पैनी अभिव्यंजना में बाँधकर एक दस्तावेजी संदर्भ देने की कोशिश है ’ताकि सनद रहे’। तात्कालिकता की क्षणभंगुरता के खतरे से इन कविताओं को साफ़ बचाते हुए कवि ऋषभ देव शर्मा ने इनमें भविष्य के अनगिन सपने भर दिए हैं।
चुनौती, साहस, संघर्ष और चेतावनी के भावों में पिरोया इस संग्रह का हर मनका अपने में अनूठा है, आबदार है जिसे पैदा करने के लिए भाषा और शिल्प के मँजाव की जिस प्रक्रिया को अपनाया गया है वह कवि के सच्चे और साझे अनुभव की तस्वीर है।
कविताओं में मिथकीय धरातल भी यहाँ खूब उभरे हैं। कृष्ण-अर्जुन, दुष्यंत-शकुंतला, नल-दमयंती, कामधेनु, कल्पतरु, प्रह्लाद-होलिका, रावण और नचिकेता एक संसार रचते हैं यहाँ। दंगे, नारी राजनीति और कारगिल जैसे बहुलिखित विषय भी इस संग्रह की कविताओं में वस्तु/काव्य बोध की दृष्टि से टटके लगते हैं।
भाषा का तो अचरजकारी प्रयोग है। हिंदी भाषा की बहुस्रोतीय संभावनाओं को कवि ने खन डाला है – फिर बोए हैं अपनी अनुभूतियों के बीज और पोस-पोस कर उगाई हैं कविताएँ। शैली-शिल्प अध्ययन के लिए, मैं समझता हूँ, सभी कविताओं में अकूत संभावनाएँ हैं।
सही मायनों में ये कविताएँ हैं क्योंकि न तो ये झंडाबरदारी करती हैं और न ही विद्रोह, क्रांति या कुंठा का छद्मे ओढ़ कर किसी ख़ास पाँत में बैठने को आतुर दीखती हैं।
सही, सजग और सन्नद्ध कविता का माकूल ख़ाका है – ’ताकि सनद रहे’।
सामाजिक सत्य से भरेपूरे इस काव्य संग्रह को पढ़कर आपको ज़रूर लगेगा कि केवल विचारधारा या ’इमोशंस’ ही कविता को कविता नहीं बनाते; कविता बनती है – भाषा, शैली और पद के ठेठपन से, ठोस अनुभवों से।
आधुनिकताबोध की सरमायेदार बनी ज़्यादातर हिंदी कविताओं में आज लोक और संस्कृति से जुड़ाव कम हो गया है। कड़वाहट और आक्रोश ने कविता के ऊपरी स्वर को तो तीखा बनाया है, लेकिन कविता बनने का सुख इनसे छिन गया है। यही वजह कविता के जनमानस से दूर होते जाने की भी है। जब हम कवि-रूप में अपने को आम आदमी से ऊपर उठा हुआ मानकर गर्वीले दर्प के साथ और भाषा के ऐसे छलावे भरे रूप में बात करेंगे जिससे जमीनी रिश्ता ही नहीं हो, तो ऐसी कोई भी कृति आस्वाद और टीस दोनों पैदा नहीं कर सकती।
इस लिहाज से ’ताकि सनद रहे’ की कविताओं में संभावना दिखाई देती है। एक तो कवि ने आज के माहौल की सारी विसंगतियों को परखा है और इसके संदर्भों को भारतीय पुराणैतिहासिक कथाओं से संबद्ध करने का अच्छा प्रयास किया है। ऐसा करने से काव्यार्थ की दिशाएँ भी फैली हैं और पाठक के लिए उनकी पकड़ भी आसान हुई है।
दूसरी बात यह कि इन कविताओं े विषय सीधे हमारे आसपास की घटनाओं से लिए गए हैं या हमारी बहुत जानी-बूझी समस्याओं से उठाए गए हैं। इनकी ज्वलंतता में कोई संदेह नहीं है, लेकिन इन्हें अनदेखा करने, इनके प्रति उदासीन रहने की प्रवृत्ति पर चोट करने के कारण भी इन कविताओं का महत्व बढ़ जाता है।
तीसरी बात यह कि किसी भी रचना के लिए पठनीयता का होना, और सिर्फ़ पठनीयता का ही नहीं, संप्रेषण और प्रवाह की निरंतरता का होना बहुत ज़रूरी है जिसके लिए भाषा के सधाव और शैलीय वृत्तियों के कलात्मक उपयोग से कवि को दो चार होना पड़ता है। इन कविताओं में हिन्दी भाषा की व्यापक अभिव्यक्ति क्षमता को कुशलता के साथ इस्तेमाल करने का भाव दिखाई देता है जो और भी मँजकर अधिक अच्छे परिणाम दे सकता है।
ऋषभ देव शर्मा की ये कविताएँ छंदमुक्त होते हुए भी लय की निरंतरता से बँधी हुई हैं। गति के साथ भावों-प्रतिभावों का उन्नयन प्रभावशाली बन पड़ा है। कविता और गद्यभाषा के बीच का संतुलन भी अपेक्षित अनुभूतियों को संप्रेषित करनें में कई जगहों पर सहायक बना है।
इन कविताओं की भावनापरक ऊर्जा कथनों में लिपटकर भी प्रकट हुई है और शाब्दिक छवियों के संश्लिष्ट रचाव से भी। जहाँ एक भाव टूटकर स्थिर होना चाहता है, वहाँ ये दोनों ही प्रक्रियाएँ रंजक तत्व का काम करती हैं। कथनों में मुहावरों का आलोक भी छिपकर झाँकता है जिनमें हिंदी-उर्दू दोनों की साझा विरासत को सम्हाले रखा गया है। कफ़न धारण किए हैं, मूल्य जिनकी उँगलियों पर नाचते हैं, साजिशों में कैद है, कील हम जड़ने चले हैं, बो रहा है आग वह, चीख के होठों पड़ा ताला, सत्य ने खतरा उठाया, मौत से पंजा भिड़ादें, कयामत टूट पड़े तुम्हारे ऊपर, डुबकी लगा गए तुम तो, चोर नज़रों से तुम्हारी ओर देखा – जैसे कथन काव्यसंदर्भ या पूरी कविता की बुनावट में अर्थ भर देते हैं।
इसी तरह इन कविताओं में कई ऐसी शाब्दिक छवियाँ भी उभरी हैं जहाँ दो नितांत भिन्न जातियों के शब्दों का संयोजन विस्तृत भावभूमि को प्रकाशित कर देता है। ऐसे प्रयोग अर्थ की छवियों को भी नया आयाम दे देते हैं। भावबद्धता का यह क्रम काव्यशिल्प को भी प्रखर बनाता है जिसे कवि का भाषाकौशल मानना चाहिए। लाल जबड़े कड़कड़ाती, कुर्सी के कंठ हकलाए हुए हैं, लोभ के पंजे पसारे, चले हम धोने रंज मलाल, कुर्सियों के कान में कलरव पड़ा, मैंने किताबें पहन रखीं थीं, झूठ की चादर लपेटे जल रही होली, वह कामधेनु भी हुई परती-से जो शब्दछवियाँ बनती हैं, वे चित्रात्मक होने के साथ ही भाव के उद्रेक को भी द्विगुणित कर देती हैं। अच्छी बात यह है कि इस तरह के काव्यभाषिक ढलाव में कवि ने भाषा के लोकपक्ष की भी सुध ली है। ऐसा करने से भाव प्रखर हुए हैं और वह कहा जा सका है जो आभिजात्य भाषा उतनी प्रभावी बनकर न कह पाती। क्यों बवाल उठाते हो, जनगण करें धमाल, भींज कर पाँखें, जब शून्य ताके, दूधों नहाई, पौध धान की, नाव काठ की, देह का बाना, जलाकर धर दिया, अपना नाम गोदने के लिए, बैर मत रोपो, बौरा उठे आम्रवन – यह बताते हैं कि लोक भाषा का सही जगह पर एक कोने में किया गया प्रयोग भी पूरे संदर्भ को प्रकाशित कर देता है।
कविताओं के भाव सामयिक हैं और हार्दिक उद्वेग के साथ प्रकट हुए हैं। इसीलिए भावोद्वेलन में सिमटे लघु भाव पुनरावृत्ति से प्रकट करने की जैसी दक्षता कवि ने दिखलाई है, वह इस बात का भी संकेत है कि एक बड़े भाव को किस तरह अभिव्यक्ति के टुकड़ों में बाँटकर फिर से उन्हें संश्लिष्ट करके ’महाभाव’ में परिणत किया जाता है। इस प्रकार की कुछ पंक्तियाँ उद्धृत करना चाहूँगा :
यह बिंदु है बदलाव का
यह बिंदु है भटकाव का
यह बिंदु है बहकाव का
*****
और हमारा धर्म?
हमारा धर्म क्या है??
क्या ह हमारा धर्म????
***
छ्त गिरा दो
छीन लो छतरी,
मटियामेट कर दो झोंपड़ी भी,
छप्परों को
उड़ा ले जाओ भले।
***
पहली बार छुआ-
महकती हुई धरती ने,
गमकती हुई हवा ने,
लहराते हुए पानी ने,
सहलाती हुई आग ने
और गाते हुए आकाश ने।
इन कविताओं में व्यंग्य, प्रहार, आक्रोश, तल्खी, क्रोध, जुगुप्सा के भाव अंतर्निहित हैं, लेकिन एक अंतर्धारा की तरह। सामाजिक सच्चाइयाँ हैं जिनमें परिस्थितियों ने विसंगतियाँ भरी हैं, लेकिन इनके ऊपर भी ऐसा बहुत कुछ है जिससे बँधकर कलुष को पार किया जा सकता है। ऐसे ही बदलाव की तलाश है ये कविताएँ, जो नारों में समाधान नहीं ढूँढतीं। ये मुड़ती हैं जड़ों की ओर। ये परखती हैं अपने आदर्शों और मूल्यों को; और चेताती हैं भटकाव के उन रास्तों के प्रति जिनका अस्तित्व ही खोखला है। इस पृष्ठभूमि में ’ताकि सनद रहे’ की कुछ पंक्तियाँ देकर अपनी बात कहूँगा :
आदमी तो
भूमि का बेटा,
भूमि पर वह लोटता,
धूलि में सनता,
निखरता धूप में है।
देह से झरता पसीना,
गंध बहती रोम कूपों से उमड़कर।
ये पंक्तियाँ मनुष्य के श्रम और उस श्रम से निर्मित पहचान को उकेरती हैं जहाँ श्रम का संतोष ही आदमी को माथा उठाकर जीने की टेक देता है। व्यंग्य की दो पंक्तियाँ यह जताती हैं कि राजा निर्दोष और प्रजा को दोषी माननेवाली रीति का भीतरी सच क्या है, इस सच की परख कवि ने प्रह्लाद के जरिये की है :
मुकुट तो गलती नहीं करता
केवल प्रजा दोषी रही है।
जो श्रम के भागी नहीं हैं और जो समस्त दोषों से भी मुक्त हैं, उन्हें भी कवि ने चेतावनी दी है कि वे ज़मीन पर उतरें, सबके साथ चलें :
जो चढ़े सिंहासनों पर
भूमि पर उतरें अभी,
हल धरें कांधे,
जो धरा जोते ’जनक’ वह,
वही शासक धरा का
वह धराधिप हो!
कहीं कहीं कविताओं में सामयिक संदर्भ भी प्रमुख बने हैं लेकिन यहाँ भी स्पष्टता और परंपरा से जुड़ाव ने नई काव्यभंगिमा प्रस्तुत कर दी है।
’आपरेशन विजय’ के दो संदर्भ हैं :
युद्ध है अभिशाप
लेकिन
भूमिजा की लाज का जब
हो रहा अब
अतिक्रमण है;
- युद्ध तो अनिवार्य है।
***
साधुवेशी रावणों ने
हरण सीता का किया है,
जाल फैलाया हिरण का,
वध जटयू का किया है।
ये कविताएँ सपनों और आदर्शों का भी अलग धरातल ढूँढती हैं जहाँ एक ओर सामाजिक बोध की स्वीकृति है :
तुम समझने लगे थे अब
माँ और गुड़िया के फ़र्क को।
चाभी के खिलौने और
बाप का अंतर.......
तो दूसरी ओर भविष्य को कुछ दे जाने का संकल्प:
आज यह संकल्प लेकर
रोपता हूँ बीज तुममें,
कल्पतरु अब तुम उगाओ।
कहीं यहाँ ’नीम’ के बहाने पिता की याद है और कहीं ’रंग’ के साथ सकल सृष्टि के सपनों की बात है।
यह देखकर अच्छा लगता है कि ये कविताएँ बिना किसी लागलपेट के खुद बोलती हैं और बहुत साफ बोलती हैं। यह सफाई कुछ कविताओं की संबोध्यता से भी आँकी जा सकती है। कभी पंक्तियाँ सीधे पाठक को संबोधित हैं :
हाथ में रथचक्र लेकर
व्यूह से लड़ने चले हो!
***
तुम न दुहराना कहीं
गाथा वही,
हो न जाए फिर कहीं
अहसास की हत्या!
इंद्र पर भी पाप यह भारी पड़ा।
***
सावधान! होशियार!
कोई अपने घर से बाहर न निकले,
कोई खिड़कियों से झाँकने की
ज़ुर्रत न करे!
***
गलतफहमी है आपको।
सिर्फ़ आधी आबादी नहीं हैं वे।
बाकी आधी दुनिया भी
छिपी है उनके गर्भ में।
वे घुस पड़ीं अगर संसद के भीतर
तो बदल जाएगा
तमाम अंकगणित आपका।
***
कुछ ऐसा करो
कि वे चीखें, चिल्लाएँ,
आपस में भिड़ जाएँ
और फिर
सुलह के लिए
हमारे पास आएँ।
कहीं कविता में अवस्थित पात्र को :
ओ छली दुष्यंत
तुमको तापसी का शाप।
***
घेरकर अभिमन्यु को
तुम मार सकते हो,
किंतु
अर्जुन के
’विजय अभियान’ का
बस एक प्रण है-
अब विजय है – या मरण है;
- युद्ध अब अनिवार्य है!
***
जूझ रहा था जिस समय पूरा देश
समूचे पौरुष के साथ
हर रात
हर दिन
नए नए मोर्चों पर;
बताओ तो सही
तब तुम कहाँ थे, दोस्त?
कहाँ थे?
***
पिता,
जबसे तुम गए हो
बहुत याद आता है
गाँव वाले अपने घर का
वह नीम
जो तुम्हारी उमर का था।
’ताकि सनद रहे’ कविता में पूरे मनुष्य को देखने वाला संग्रह है। पूर्ण पुरुष की संभावना कहाँ होती है, लेकिन कमियों से लड़-जूझ कर ही नई दिशाएँ खुलती हैं – ऋषभ की इन सभी कविताओं में मानवीयता का यह पक्ष सर्वोपरि है; और जो साहित्य मानव और मानवता की धुरी से ही छिटका हुआ हो उसे कविता मानने का मैं तो कोई कारण नहीं देखता।
कवि में एक पाठक की तरह मुझे कई स्तरों पर भावप्रवणता दिखाई दी है। मैं आशा करता हूँ कि भविष्य में यह कवि अपने इस भावबोध को सच्चे भारतीय बोध की नसैनी पर चढ़ाने का प्रयत्न करेगा; और यह भी कि इस पठनीय और रस बोध से युक्त काव्य का हिंदी का साहित्यप्रेमी समाज स्वागत करेगा।
ऋषभदेव शर्मा का कवि-कर्म : धूप ने कविता लिखी है गुनगुनाने के लिए प्रो. दिलीप सिंह कुलसचिव, उच्च शिक्षा और शोध संस्थान दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, मद्रास
’ऋषभदेव जी’ इसी तरह मैं उन्हें पुकारता हूँ। मान और स्नेह, दोनों भाव इस संबोधन में निहित हैं। ’डॉक्टर शर्मा’ कहूँ तो मामला अति औपचारिक हो जाए और ’ऋषभ’ बुलाऊँ तो बदसलूकी लगेगी। वे मुझे ’डॉक्टर साहब’ या ’सर’ ही कहते हैं और आदर बड़े भाई जैसा देते हैं। पहली भेंट उनसे मद्रास में बरसों पहले हुई थी। एक बैठक थी। अटैची लिए सभा (दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा)प्रांगण में घुसा ही था कि प्रो. भीमसेन ’निर्मल’ दिख गये। अटैची वहीं धर के हम दोनों डाकख़ाने वाले चबूतरे पर बैठ गए। बातें होने लगीं कि एक स्वस्थ-सुदर्शन-सा नवयुवक नमस्कार-नमस्कार करते हुए सामने आया। निर्मल जी ने परिचय कराया। मैं चलने को हुआ कि बिना किसी संकोच के युवक ने मेरी अटैची उठा ली और अतिथि-गृह के कमरे तकपहुँचा दिया। उनकी इस सरलता ने मन मोह लिया। फिर वे हैदराबाद आ गए, मेरे साथ काम करने। और मेरे साथ आत्मीयता का इतिहास रचा।
छोटे कद, भारी शरीर और गौरवर्ण के ऋषभ जी ’देखनउक’ लगते हैं। फ़िट-फ़ाट रहते हैं – हर धजा उन पर फबती भी खूब है। हमारी तरफ़ देसी मेलों में मिट्टी का ’बबुआ’ मिलता है – बैठा हुआ, सुदर्शन, गोल-मटोल; ऋषभ जी को देखकर अजाने ही उसकी याद आती है। यह बबुआ बड़ा लोकप्रिय है। सभी उसे लेते हैं, अपने घर में सजाते हैं। उसे प्यार करते हैं। हैदराबाद के हिंदी जगत् में ऋषभदेव जी अत्यंत लोकप्रिय हैं। सब उनका साथ चाहते हैं, और वे भी किसी को निराश नहीं करते।
शुरू शुरू में हैदराबाद आए तो कुछ अलग-अलग से रहे। सन् 1997 ई. में मैंने हैदराबाद में प्रो. रवींद्रनाथ श्रीवास्तव की स्मृति में एक संगोष्ठी आयोजित की। बड़ी संगोष्ठी थी, बड़े-बड़े लोग आए थे। तीन दिन की थका देने वाली गतिविधियाँ थीं। उसमें पीछे छिपकर चुपके-चुपके सब काम करते रहे। मैं भी गुपचुप उन्हें ’ऑबज़र्व’ करता रहा। फिर ’पूर्णकुंभ’ (दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा – आंध्र की मासिक पत्रिका। का रवींद्रनाथ श्रीवास्तव स्मृति अंक निकालने की योजना बनी। उनसे जम कर काम लिया और कहा कि आपका नाम सहायक संपादक के रूप में जाएगा। अभिभूत हो गए। फिर संयोग कि ’पूर्णकुंभ’ का संपादन मेरे जिम्मे आ गया। पाँच-छह साल हम दोनों ने मिलकर उसके लिए काम किया। कितने ही विशेषांक निकाले। हर अंक को जानदार बनाया। सच कहूँ, मैं तो निमित्त मात्र था। सारी मेहनत उनकी होती थी। यहाँ तक कि ’संपादकीय’ लिखने के लिए भी वे मेरे पीछे पठान की तरह पड़े रहते थे। कभी-कभी तो मुझे खाली देखते ही कागज़-क़लम लेकर हाज़िर हो जाते कि सर, लिखा दीजिए, प्रेस में जाना है। इसी तरह पीछे पड़-पड़ के उन्होंने मुझसे बहुत कुछ लिखवा लिया है। इस मामले में कई बार वे मेरे ’गणेश’ भी बने हैं। इसके लिए मेरा रोम-रम उन्हें असीसता है।
हम दोनों ने कई अकादमिक कार्य साथ-साथ किए हैं। अनुवाद संगोष्ठी का आयोजन और उससे संबंधित तीन क़िताबों की तैयारी। श्री मुनींद्र जी के अभिनंदन-ग्रंथ का संपादन। अपने संस्थान और नगरद्वय की अनेक गोष्ठियों – कार्यशालाओं की योजना और उनमें धमाकेदार शिरक़त। तथा संस्थान के पत्रकारिता डिप्लोमा पाठ्यक्रम को बनाने से लेकर चलाने - सँवारने तक का काम। जानता हूँ कि मेरे हैदराबाद से धारवाड़ जाने का जितना क्लेश उन्हें हुआ, शायद ही किसी को हुआ हो।
ऋषभदेव जी का मेरे साथ सांसारिक संबंध ही नहीं है, वे मेरी अकादमिक-आत्मा का भी एक हिस्सा हैं; और जीवन के अंत तक रहेंगे। लिखते अच्छा हैं, बोलते उससे भी अच्छा हैं। उनकी आवाज़ में आवेश-जनित खनक होती है। मंच-संचालन भी वे बड़ी तन्यता के साथ करते हैं। कहा जाए, ढीली-ढाली सभा में भी उनका संयोजन जान डाल देता है। हम सब उनकी इस ताक़त को भकुआए ताकते रह जाते हैं। वे अध्यापक, कवि और समीक्षक एक साथ हैं। अध्यापक वे कैसे हैं, यह तो उनके छात्रों से पूछिए। कवि वे संस्कारी हैं। और समीक्षक गंभीर। इन तीनों ही रूपों में उनकी धाक है। पर उनका सबसे उज्ज्वल गुण मुझे लगता है – नया सीखने और नया करने की उनकी अदम्य इच्छा। नया लिखने, नए विषयों पर शोध कराने का जब भी कोई काम उन्हें सौंपा, उन्होंने करके दिखाया, और अच्छा करके दिखाया। निरर्थक गप्पें मारने तो वे कभी घर पर भी नहीं आए। जब आए, कुछ सीखने, कुछ करने, कुछ पढ़ने-लिखने। लगन के साथ काम करने की दीवानगी ने ही शायद हम दोनों के बीच ’ट्यूेनिंग’ बना दी थी। मेरे हैदरबाद से धारवाड़ जाने पर उनकी कमी मुझे बेतरह खलती रही – जैसे दाहिना हाथ कट गया हो। उनके और अपने रिश्तों पर कितना लिखूँ, क्या क्या लिखूँ – कहि न जाय का कहिए।
उनकी कविताएँ मंच से कई बार सुनी हैं। तड़प कर सुनाते हैं। एक-एक शब्द स्पष्ट। उनका उच्चारण बहुत साफ़ है। बोलते समय ध्वनि-लोप भी नहीं होता। औपचारिकता की हद तक वे भाषा को परिष्कृत कर देते हैं। यहाँ तक कि बातचीत भी वे बातचीत के लहज़े में नहीं कर पाते, भाषा का साहित्यिक रूप वहाँ भी सिर चढ़ा रहता है। उनकी यह ’अदा’ मुझे थोड़ी अटपटी भी लगती है पर – जासे जो सध जाय। ’पूर्णकुंभ’ में ’ताकि सनद रहे’’ शीर्षक के अंतर्गत हर माह वे अपनी एक कविता देते थे। उन्हें संगृहीत कर ’ताकि सनद रहे’ (2002) शीर्षक से ही पुस्तकाकार प्रकाशित किया गया है। पूरी पांडुलिपि मैंने देखी थी। प्रसन्नतापूर्वक ’भूमिका’ भी लिखकर दी थी।
यहाँ पर तेवरी(देवराज : ऋषभ : 1982 ई.) और ’तरकश’(ऋषभ : 1996 ई.) में छपी उनकी तेवरियों पर बात करूँगा। तेवरी की घोषणा में तेवर वाली कविताओं की जो विशेषताएँ गिनाई गई हैं उन्हें मैं कथ्य और भाषा दो स्तरों पर पाठकों की सुविधा के लिए बाँट देता हूँ। कथ्य के स्तर पर यह कहा गया है कि अंसतोषजन्य आक्रोश इसका मुख्य भाव है, रचनात्मक क्रांति इसका लक्ष्य है, व्यवस्था के प्रति आक्रोश इसकी भावभूमि है, दुरभिसंधियों का पर्दाफ़ाश करना इसकी मंशा है और जागृति प्राप्तव्य है। भाषा के स्तर पर इस घोषणा में शैली और शिल्प दोनों पर विचार हैं कि – संप्रेषणीयता इसका मूल धर्म है, ऐसी भाषा जो पाठक की स्मृति में स्थापित हो सके, जो अभिजात प्रवृत्ति से मुक्त हो, जो आम आदमी के मनोभावों से जुड़े, अभिव्यक्ति ’अक्खड़’ हो अर्थात् साफ़-साफ़ बेलाग बात कही जाए, भाषा ग़ैर-सांप्रदायिक, सार्वजनीन और समर्थ हो जो समाज के प्रत्येक स्तर पर संवाद स्थापित कर सके, भाषा के उस रूप को विकसित करना जो सामान्य संपर्क की भाषा होगी। इस भाषा को पाने का तरीक़ा होगा भीड़ के बीच से शब्द उठाना और अभिप्रेत होगा; (श्रोता/पाठक के) मस्तिष्क में उसे बो देना।
इस घोषणा में कथ्य और रूप को समान महत्व देने वाली बात मार्के की है। और इससे भी ज़्यादा समझदारी की बात है इन दोनों को पाठक से सीधे जोड़े रखने की चाहत। अन्यथ इन दोनों को अलग-अलग देखने और बहसने वालों की कमी कभी नहीं रही है। रामचंद्र शुक्ल का यह कथन इस प्रकार की अलगाववादी मनोवृत्ति वालों पर ज़ोरदार टिप्पणी है – “वे समझते हैं कि विचारों का कर्ता एक पुरुष हो सकता है और वाणी या भाषा का दूसरा। ... सो ’विचार’ और ’शब्द’ किसी-किसी की समझ में दो पृथक वस्तुएँ हैं। भाषा के लोकसिद्ध, बेलाग और संवादी होने वाली बात भी कम महत्वपूर्ण नहीं है क्योंकि व्यापकता की दृष्टि से बोलचाल की भाषा में कविता लिखना विशेष उपयोगी है। (मैथिलीशरण गुप्त)।“ ऋषभदेव जी की इन तेवरियों की भाषा नपी-तुली है। उनके विचार भी पारदर्शी हैं और भाषा भी। हिंदी की कविताओं में अक्सर यह दीखता है कि विचारों में धुँधलापन व्याप्त होता है जिसकी छाया भाषा में भी दिखाई देने लगती है और कविता आम पाठक की समझ से बाहर हो जाती है। ॠषभदेव जी संप्रेषणीयता को अगर कविता का मूल धर्म मानते हैं तो अपने लेखन में इसका निर्वाह भी करते हैं – इसे निबाहने में कई जगह सपाटता भी आ गई है या बेतरह बात का बतंगड़ बनाने की प्रवृत्ति भी। पर अधिकतर उनकी ये रचनाएँ समय के अनुरूप हैं और उनके शब्द भावों के अनुरूप। यही गुण उनके काव्य-संसार को निराला की त्रि-आयामी कसौटी पर खरा सिद्ध करता है : (आदर्श कविता वह है) जिसमें कविता का स्वाभाविक प्रवाह, कल्पना की उन्मुक्त गति और स्वतः स्फूर्त भाव गुंथे हुए हों।
’घोषणा’ के अनुसार ही इस पाठ की समीक्षा की जाए तो ऋषभ जी के लिखने की तर्ज़ (स्टाइल), भाषा-प्रयोग में उनकी स्वच्छंदता तथा उनकी कल्पनाशक्ति (इमेजिनेशन) की परख की जा सकती है। और उनकी वैचारिकता भी जाँची जा सकती है जिसमें टुच्ची राननीति, धर्मांधता, सांप्रदायिकता और अपसंस्कृति; अर्थात् क्रूर व्यवस्था के विरुद्ध गुस्सा भी है और भविष्य के लिए उम्मीद भी। प्रतिरोध, इन तेवरियों के मूल में है। और हमारा समय इनमें मुहरबंद है – जब भाषा, धर्म, जाति, क्षेत्र को लेकर घोर संकीर्णतावाद और सनक उभार पर है। हिंसा का वर्चस्व है। सब ओर हत्याएँ हैं।... खाते-पीते संसार में असहमति अपराध है (परमानंद श्रीवास्तव)। अपने विचारों को स्वर देने में ऋषभ की कविताएँ यह सुखद एहसास कराती हैं कि यहाँ लिखी भाषा और बोली जाने वाली भाषा का अंतर कम से कम है। तभी तो संप्रेषणीयता के मूल धर्म का निर्वाह वे कर पाते हैं।
संप्रेषण, भाषा का मूल दायित्व है। ऋषभ ने आम आदमी से संप्रेषण-सूत्र बनाने की ठानी है। हिरनी की आँखों में प्रतिशोधी ज्वाला है, आदमी की बौनसाई पीढ़ियों को/रोज़ गमलों में उगाया जा रहा है, हो गया पत्थर निवाला देख लो, मैं पंक्ति में पीछे खड़ा विराम की तरह, बोझ कितने ही गधों का ढो गया मेरा शहर, एक दूसरे की तरफ़ भौंक रहे हैं लोग, मिमियाना छोड़ो तुम शेर हो गुर्राओ, जैसी पंक्तियाँ स्वतः संप्रेषणीय हैं – इनका टोन (तेवर) आम आदमी की सोच से संबद्ध है। सबसे ख़ास बात है शब्दों का संयोजन – एक तरह का शरारतपूर्ण सहसंयोजन (लक्ष्मीकांत वर्मा) भी, जिसके पीछे से व्यंग्य भी झाँकता है। ऋषभ के इस पूरे पाठ में वाग्वैदग्ध्य (विट), वक्रोक्ति (आयरनी) और व्यंग्य (सटायर) का फिंटा भाषारूप बनता-रचता रहता है। उनके शरारतपूर्ण सहसंयोजन में मात्र आक्रामकता नहीं है, उन्होंने अपने व्यंग्य को नया सामाजिक आशय भी दिया है इसीलिए वह गंभीर है और उसमें जीवित भाषा की गरमाई (परमानंद श्रीवास्तव) भी है। इस व्यापक संप्रेषणीयता की सिद्धि की पहली शर्त है कि (काव्य-कथन) पाठक की स्मृति में स्थापित हो और कविता अपनी ज़मीन से जुड़ी हुई हो। ऐसा तभी संभव है जब पाठ का ढाँचा सादगी में पगा हो और उसकी जड़ें यथार्थ में हों। काँख में खाते दबाये आ गया मौसम, आग लगाकर हाथ सेंकने लड़वाने में माहिर हूँ, तेरी क़लम क़लम नहीं युग की ज़बान है, यह क़लम है खुरपी नहीं/छीलना घास बंद करो, आँखों में आँज दिया कुर्सी ने धुँआ-धुँआ, राजनीति के धनुष से संप्रदाय के तीर, कुर्सी की शतरंज में हत्यारी गोट – जैसी पंक्तियाँ ज़बान पर चढ़ जाती हैं – काँख में दबाना, हाथ सेंकना, समय की ज़बान होना, घास छीलना, आँज देना, राजनीति का धनुष, संप्रदाय के तीर, कुर्सी की शतरंज, हत्यारी गोट जैसी अभिव्यक्तिया ज़मीनी हैं। कविता को सीधे जनता के बीच ले जाने के लिए लोक संवेदना की पहचान और उस पर गहरी पकड़ ज़रूरी है। ये दोनों क्षमताएँ ऋषभ में हैं। (उन्होंने) जनभाषा और साहित्यिक भाषा का भेद मिटा दिया है (परमानंद श्रीवास्तव)। तेवरी की भाषा अभिजात प्रवृत्ति से मुक्त हो और आम आदमी के मनोभावों से जुड़े, ये दोनों शर्तें लोकानुभूति और जन-साधारण से जुड़ाव के माध्यम से ही पूरी हो सकती हैं – जाति पूछ कर बँट रही लोकतंत्र की खीर, क्या पता था खेल ऐसे खेलने होंगे/रक्त-आँसू गूँथ पापड़ बेलने होंगे, बाज़ों के मुँह ख़ून लगा है/ रोज़ कबूतर ये मारेंगे, जूझने का जुल्म से संकल्प दे/आज ऐसी पाठशाला लाइए, उन सबको नंगा करो जिनके मन में खोट, आ गई हाँका लगाने की घड़ी/क्यों अभी तक तू खड़ा खामोश है। ये पंक्तियाँ अपने समय के रू-ब-रू हैं। यह जान लें कि रचना एक समय-यात्रा भी है, पर संवेदन-स्तर पर (प्रेमशंकर)। ऋषभ जी के पाठ में संवेदन का यह स्तर लोक-संवेदना (मिथ) से भी लबरेज है। ये मिथक घोषणा के अन्य पक्षों को भी पूरा करते हैं – अभिजात से मुक्त, आम आदमी के मनोभाव और अपनी ज़मीन से जुड़ी संवेदना मिथकीय संरचना में ढलकर सम्प्रेषणीयता और स्मरणीयता वाले लक्ष्य को भी बख़ूबी साधती है – एक ओर ऋषभ के पाठ में पौराणिक मिथक हैं जो आज लोगों की रग-रग में बसे हैं – कई प्रह्लाद लेंगे आग हाथों पर, रावणों की वाटिका में भूमिजा सीता, राहू चला गुलेल, रावण की नगरी बना आज राम का देश, अश्वमेध वालों से कह दो/अबकी तो लगकुश आये हैं, देव तक्षकों के रक्षक हैं, जनमेजय ने एक बार फिर नागयज्ञ की ठानी है, चीर दी फिर किस जनक ने भूमि की छाती, वोटों का भस्मासुर पीछे पड़ा हुआ है, भीष्म-द्रोणाचार्य सारे रोटियों पर बिक रहे/अर्जुनों का मोह टूटे एक ऐसा युद्ध हो। दूसरे कुछ मिथक लोककथा के रास्ते से भी आए हैं, ये लोक कथाएँ जो दादी-नानी की कहानी के रूप में लोक को घुट्टी में मिलती चली आ रही हैं – क्रूर भेड़िए छिपकर बैठे नानी की पोशाकों में, न्याय को बंधक बनाकर बंदरों का/ वे मिटायेंगे लड़ाई बिल्लियों की। कुछ मिथक इतिहास और साहित्य से भी संबद्ध हैं – मत जयचंदों को दोरंगा होने दो/मेरा शहर गया होरी/खुरपी ले आए धनिया/जग जाएँ गोबर – झुनियाँ/’खुसरो’ कैसे घर जाएगा रैन हुई चहुँ देश।
अक्खड़ अभिव्यक्ति या बेलाग कहने और कथा-संवाद स्थापित करने वाली भाषा के अनेक उपरूप (सब फ़ार्म्स) इस पाठ में मिलते हैं। यहाँ भावों की भिड़ंत (मैथिलीशरण गुप्त) भी दर्शनीय है और सीधा-सादा दृढ़ बयान (परमानंद श्रीवास्तव) भी, दोनों मिलकर ऋषभ की रचनाशीलता को घनीभूत करते हैं। भावों की टकराहट और बयानों की सुदृढ़ता की वजह से ही कई भावों, अनुभूतियों और विचारों का ही नहीं, बिंबों-प्रतीकों का भी दुहराव है इस पाठ में। अक्खड़ता और साफ़-साफ़ बेलाग बात कहने के संदर्भ में इस दुहराव को देखें –
1)बौनी जनता, उँची कुर्सी; एक ऊँचा तख़्त जिस पर भेड़िया आसीन है।
2)देव तक्षकों के रक्षक हैं; मत तक्षक को ऐसे उन्मुक्त विचरने दो।
3)केंचुओं की भीड़ आँगन में बढ़ी/आदमी अब रीढ़ वाला लाइए;मैंने कहा कि हे प्रभो! मैं केंचुआ बनूँ/बदले में सीधी रीढ़ की मुझको सज़ा मिली।
4)श्वेत टोपियाँ पहनकर उगल रहे है रोग;/टोपियों के हर महल के द्वार छोटे हैं;/टोपीवाले नटवर नागर! मेरे तुम्हें प्रणाम;/टोपी वाले बाँट रहे हैं मंदिर मस्जिद गुरुद्वारे;/कुर्ते का टोपी का कोई विश्वास नहीं।
5)सूर्य की किरणें चलीं लावा बहाने के लिए;जम गया है मोम सारी देह में/गर्म फौलादी निवाला लाइए; जब नसों में पीढ़ियों की हिम समाता है/शब्द ऐसे ही समय तो काम आता है, सूर्य उगा है अब पिघलेगा शहर तुम्हारा।
यही दुहराव संवाद स्थापित करने में भी प्रकट है पर एक अलग तरह से। श्रोता/पाठक को अपने सामने खड़ा करके, उन्हें सम्मिलित करके ऋषभ ने इस पाठ को गुफ़्तगू बनाया है। आइए साहब, मित्रवर, भैया, भैया जी जैसे संबोधन पाठक के लिए हैं और ये पंक्तियाँ –
मित्र! श्वेत टोपी वालों की स्याही में डूबा मन है, टोपियों का चूर कर दें राजमद, बुझे हुए चूल्हों की तुमको फिर से आँच जलानी होगी, फिर क़यामत आज बनकर छाइए साहब, रोटी के हक़ की ख़ातिर तलवार उठाओ रे, तलघरों की क़ैद को तोड़ें चलो, जो फसल में ज़हर भरती उस हवा को चीर डालो।
यहाँ पाठ-विमर्श की दृष्टि से कुछ बातें ख़ास हैं। एक तो यह कि इन तेवरियों की विषयवस्तु राजनैतिक छल, सांप्रदायिकता और सामाजिक-सांस्कृतिक विघटन से उपजी छटपटाहट है। और इन सबके पीछे यह यथार्थ कि राजनीति लुच्चे-लफंगों का अंतिम आश्रय बन गई है (प्रेमशंकर)। दूसरे यह कि ये विचार इस पाठ में ख़ून की तरह दौड़ते हैं। तीसरे यह कि इनका प्राप्तव्य है जागृति – बस समाज पर एक भयानक चुप्पी छाई है (रघुवीर सहाय) की हालत में कुछ सार्थक बचा लेने की कोशिश (परमानंद श्रीवास्तव) है यह पाठ, जिसमें कविता का ताप भी है गहन मानवीय संवेदना भी। निश्चित ही इस चुप्पी को तोड़ने, जागने-जगाने, कुछ सार्थक बचा पाने के लिए ज़रूरी है ऐसी भाषा का चयन जिसके शब्द भीड़ के बीच से उठाए गए हों और जिनका गहरा प्रभाव जनमानस पर पड़े (मस्तिष्क में उसे बो देना)। ’जागृति’ के आद्य-प्रारूप (आर्कीटाइप) के रूप में ऋषभ ने सूर्य, किरण, धूप, दोपहरी, प्रकाश, रोशनी, रोशनदान को चुना है और इनके माध्यम से अनेक अर्थच्छटाएँ बिखेरी हैं जिनका संबंध सत्य की प्रतिष्ठा, मानव-जीवन और सामाजिक विद्रूपताओं से है – अँधियारे युद्धों में किरणों का मर खपना, रोज़ धूप का क़त्ल हो रहा, दोपहरी इनकी रखेल है/अपने तो साथी साये हैं, रोशनी का इक दुशाला लाइए, बालियों पर अब उगेंगे धूप के अक्षर/सूर्य का अंकुर धरा में कुलबुलाता है, खिल जाय धूप गाँव में हो जाय सवेरा, उग रहा सूरज अँधेरा चीर कर फिर से, मैं सूरज को खोज रहा था संविधान की पुस्तक में/ मेरा बेटा बोला-पापा, रोशनदान ज़रूरी है।
यहाँ ताप भी है, ललकार भी और क्षीण ही सही, आशा की एक किरण भी। ऋषभ का पाठ कहीं-कहीं बड़बोला भी लग सकता है पर यह घुमावदार नहीं है। वह बोलना चाहता है, दुरभिसंधियों का पर्दाफ़ाश करना चाहता है और अ-व्यवस्था के प्रति अपना आक्रोश दर्ज़ करना चाहता है – मैं बोलना चाहता हूँ/वो मेरी ज़बान पकड़ लेताहै : इस तरह मत बोलो/ मैं उँगली दिखाता हूँ कि उधर देखो/उधर ग़लत हो रहा है/वह रोकता है कि उँगली मत दिखाओ/यह ख़तरनाक है (राजेश जोशी : मैं बोलना चाहता हूँ)। ऋषभ अपनी तरह से बोलते हैं, लोकभाषा का सहारा लेकर; लोकभाषा की यह ठसक और स्पष्टोक्ति उनकी पंक्ति-पंक्ति में प्रवाहित है – शीश अपने आग धरती (धरना-रखना – क्रिया एकाधिक जगहों पर प्रयुक्त है), मेह बरसो रे, साँझ परती, छाँह बरगदी, भोर से अंटा चढ़ा कर सो गया मेरा शहर, बहुत मरखनी हो गयी डालो इसे नकेल, उनके पास न कानी कौड़ी फूटा नहीं छदाम, हर कोई बावन गज़ का, पानी उतर चुका सबका, भूख में होता भजन यारो नहीं, कब्र में पाँव लटके हैं कंठ में प्राण हैं अटके, क्या उत्ती के पाथोगे, ऐसी होली खेलियो खींच मुखौटे यार, घर में आग लगाय जमालो, गाल बजाये जाते हैं – जैसी ख़ास देसी रहेटरिक्स, मुहावरों और लोकोक्तियों से बिंधी ये अभिव्यक्तियाँ घोषणा के एकाधिक बिंदुओं के सफल निर्वाह का स्वतः साक्ष्य हैं।
ऋषभ अपनी बात चाहे जैसे कहें सोचते जनहित की हैं – अबकी अगर घर लौटा तो/हताहत नहीं/सबके हिताहित को सोचता/पूर्णतर लौटूँगा (कुंवर नारायण)। ऋषभ का कविता-पाठ सामाजिक अनुभव के प्रति हमें सचेत करता है। उनकी बातों में सार है। उनकी अभिव्यंजना कई स्थलों पर हृदय को हिला देती है। उनका पाठ केवल प्रचार, घोषणा और वक्तव्य नहीं है, वे खुद भी इसमें गहरे रमे हैं – तभी उनका स्वर अलग-सा है – तल्ख़, व्यंग्यभरा, सीधा और तीक्ष्ण। ऋषभ जी की कविता के लिए डॉ. प्रेमशंकर के शब्द उधार ले रहा हूँ जो उन्होंने नागार्जुन की कविता पर विचार करते हुए लिखे हैं, ऋषभ के पाठ के संदर्भ में भी ये सोलह आने सही उतरते हैं :
वे एक निश्छल मन की सहज भावुक अभिव्यक्तियाँ हैं जिन्हें बिना किसी लागलपेट के रख दिया गया है। वहाँ आक्रोश प्रधान है। ... उसका मुख्य आशय अपनी बात जनता तक पहुँचाना है, कबीरी ढंग से।