Profil de rishabhaऋषभ की कविताएँPhotosBlogListesPlus ![]() | Aide |
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22 août भारत माता का जयगान
2 août छुआ चांदनी ने
28 juillet मैत्रीमैत्री
यह क्या कि कलाई में पहना दी
फ्रेंडशिप-बैंड
और समझ लिया, हो गई मैत्री पूरी?
मित्रता सबसे बड़ा धर्मं है. छल भी उचित है मित्रता की रक्षा के लिए. राम ने वृक्ष की ओट से बालि को मारा -मित्र को बचाना था न!
कृष्ण ने कसम तोड़कर भीष्म पर हथियार उठाया -मित्र को बचाना था न! मित्रता सचमुच सबसे बड़ा धर्मं है। - ऋषभ देव शर्मा
23 juillet समयसमयकृष्ण का विराट रूप देखकर पूछा था आश्चर्य से- कौन हो तुम? तुम कौन हो?
मैं समय हूँ, पार्थ! मैं काल हूँ!
सब समय है, सब ईश्वर है। वह साथ हो तो अर्जुन जीत जाता है महाभारत। वह साथ न हो तो अर्जुन- वही अर्जुन- हार जाता है साधारण भीलों से.
तू सचमुच बलवान है। तुझे प्रणाम। - ऋषभ देव शर्मा 16 juillet देशयह इतिहास मेरी पहचान है
- ऋषभदेव शर्मा
जब कभी मैं आँख मींच कर
अपने आप से कहता हूँ - 'देश' इतिहास की विराटता,
कानों में गूंजने लगता है - 'वंदे मातरम दिखाई पड़ते हैं
-महाराणा प्रताप
-शिवाजी
-झांसी की रानी
-तिलक और गांधी।
और फिर सुनाई पड़ता है स्वतंत्र भारत का जयघोष. यह इतिहास मेरी पहचान है! हाँ, मेरा देश महान है!! 9 juillet प्यारप्यार
-ऋषभ देव शर्मा उस दिन मैंने फूल को छुआ सहलाया और सूँघा, हर दिन की तरह उसकी पंखुडियों को नहीं नोंचा. उस दिन पहली बार मैंने सोचा फूल को कैसा लगता होगा जब हम नोंचते है उसकी एक-एक पंखुड़ी. तब मैंने फूल को फिर छुआ फिर सहलाया फिर सूँघा... और मुझे लगा हवाएं महक उठीं प्यार की खुशबू से. 5 juillet धुआँ और गुलालधुआँ और गुलाल ~~ डॊ.ऋषभदेव शर्मा सिर पर धरे धुएँ की गठरी मुँह पर मले गुलाल चले हम धोने रंज मलाल ! होली है पर्याय खुशी का खुलें और खिल जाएँ हम; होली है पर्याय नशे का - पिएँ और भर जाएँ हम; होली है पर्याय रंग का - रँगें और रंग जाएँ हम; होली है पर्याय प्रेम का - मिलें और खो जाएँ हम; होली है पर्याय क्षमा का - घुलें और धुल जाएँ गम ! मन के घाव सभी भर जाएँ, मिटें द्वेष जंजाल; चले हम धोने रंज मलाल ! होली है उल्लास हास से भरी ठिठोली, होली ही है रास और है वंशी होली होली स्वयम् मिठास प्रेम की गाली है, पके चने के खेत गेहुँ की बाली है सरसों के पीले सर में लहरी हरियाली है, यह रात पूर्णिमा वाली पगली मतवाली है। मादकता में सब डूबें नाचें गलबहियाँ डालें; तुम रहो न राजा राजा मैं आज नहीं कंगाल; चले हम धोने रंज मलाल ! गाली दे तुम हँसो और मैं तुमको गले लगाऊँ, अभी कृष्ण मैं बनूँ और फिर राधा भी बन जाऊँ; पल में शिव-शंकर बन जाएँ पल में भूत मंडली हो। ढोल बजें, थिरकें नट-नागर, जनगण करें धमाल; चले हम धोने रंज मलाल ! ****************************** 23 juin मेरी वेणी में सवेरे सवेरेबेटी
जब तुम पास नहीं होती
तब मैं अकेली होती हूँ। इसे तुम जानती हो, माँ इसीलिए तो अपने आशीष रोज गूँथ देती हो मेरी वेणी में सवेरे- सवेरे.. आँज देती हो मेरी आंखों में घर से निकलते समय. सबसे अच्छी माँ हो, -मेरी माँ . 18 juin प्रकृतिप्रकृति
- ऋषभ देव शर्मा
प्रकृति हमारा पालन करती करती सचमुच पोषण
पर हम अंधे होकर करते उसका दोहन-शोषण
पेड़ कट गए, चिडियाँ गायब नहीं कबूतर मिलते अब तो सिंथेटिक पौधों पर गुलाब नकली खिलते
चलो प्रकृति की ओर चलें अब सब नदियों को जोडें पेड़ लगाएं, फूल खिलायें राम सेतु ना तोडें सुन्दरतासुन्दरता
ऋषभ देव शर्मा http://balsabhaa.blogspot.com/2008/06/blog-post.html मैंने फूलों को देखा खिलते हुए, मैंने चिडियों को देखा चहकते हुए,
मैंने लहरों को देखा मचलते हुए,
मैंने बादल को देखा बरसते हुए,
मैंने लुहार को देखा लोहे सा तपते हुए
मैंने चाँद को देखा घटते-बढ़ते हुए,
मैंने सूरज को देखा चमकते हुए,
यह दुनिया कितनी सुंदर है।
लोग इसे कुरूप क्यों बनाते हैं? यह तो सचमुच सुंदर है!!! 9 mai आधी आबादी -ऋषभ देव शर्मा
वे रसोई में अडी़ हैं,
अडी़ रहें. वे बिस्तर में पड़ी हैं, पड़ी रहें. यानी वे संसद के बाहर खड़ी हैं, खड़ी रहें? ' गलतफहमी है आपको .
सिर्फ़ आधी आबादी नहीं हैं वे. बाकी आधी दुनिया भी छिपी है उनके गर्भ में, वे घुस पड़ीं अगर संसद के भीतर तो बदल जाएगा तमाम अंकगणित आपका. ' उन्हें रोकना बेहद ज़रूरी है, कुछ ऐसा करो कि वे जिस तरह संसद के बाहर खड़ी हैं, खड़ी रहें! उन्हें बाहर खड़े रहना ही होगा
कम से कम तब तक जब तक हम ईजाद न कर लें राजनीति में उनके इस्तेमाल का कोई नया सर्वग्राही सर्वग्रासी फार्मूला. शी.........................
कोई सुन न ले............... चुप्प ...............! चुप रहो,
हमारे थिंक टैंक विचारमग्न हैं; सोचने दो. चुप रहो,
हमारे सुपर कंप्यूटर जोड़-तोड़ में लगे हैं; दौड़ने दो. चुप रहो,
हमारे विष्णु, हमारे इन्द्र- वृंदा और अहिल्या के किलों की दीवारों में सेंध लगा रहे हैं; फोड़ने दो. तब तक कुछ ऐसा करो कि वे जिस तरह संसद के बाहर खड़ी हैं, खड़ी रहें! कुछ ऐसा करो
कि वे चीखे, चिल्लाएं, आपस में भिड़ जाएं और फिर सुलह के लिए हमारे पास आएं. हमने किसानों का एका तोड़ा,
हमने मजदूरों को एक नहीं होने दिया, हमने बुद्धिजीवियों का विवेक तोड़ा, हमने पूंजीपतियों के स्वार्थ को भिड़ा दिया और तो और.............हमने तो पूरे देश को अपने-आप से लड़ा दिया. अगडे़-पिछड़े के नाम पर
ऊँच-नीच के नाम पर ब्राह्मण-भंगी के नाम पर हिंदू-मुस्लिम के नाम पर काले-गोरे के नाम पर दाएँ-बाएँ के नाम पर हिन्दी-तमिल के नाम पर सधवा-विधवा के नाम पर अपूती-निपूती के नाम पर कुंआरी और ब्याहता के नाम पर के नाम पर..... के नाम पर.... के नाम पर..... अलग अलग झंडियाँ
अलग अलग पोशाकें बनवाकर बाँट दी जाएं आरक्षण के ब्राह्म मुहर्त में इकट्ठा हुईं इन औरतों के बीच! फिर देखना :
वे भीतर आकर भी संसद के बाहर ही खड़ी रहेंगी; पहले की तरह रसोई और बिस्तर में अडी़ रहेंगी, पड़ी रहेंगी! ~*~ (स्रोत : ताकि सनद रहे_२००२_तेवरी प्रकाशन) 2 mars अवाक्अवाक्
आओ तनिक यहाँ बैठो तुम
तुमसे कुछ बातें करनी हैं . शोर सुना तुमने लोगों का मेरा मौन ज़रा सुन देखो . पहली बार देखकर कोई ताजमहल जैसे भौंचक हो जलेपंख वाला संपाति बादल-बादल तैर रहा हो, वैसे ही मैं हर्ष और विस्मय का सागर डूब -डूब कर तिरने लगता- शब्दों की रेखाओं से तुम जब भी कोई चित्र बनाते नया-नया सा, ताजा,टटका ! मैं अवाक् हो सिर्फ़ ताकता रह जाता हूँ कभी तुम्हें तो कभी चित्र को. कभी चित्र में तुम दिखते हो, कभी चित्र तुममें दिखता है. आज अभी तो ऐसा दीखा, जबरन ओढी केंचुल कोई तुमने स्वयं नोंच डाली है, सारी कोमलता को अपनी खुली हवा में खोल दिया है , भला हवाओं से क्या डरना झंझाओं से शक्ति मिलेगी - दीपक का विश्वास नया यह शब्द-शब्द में दीपित दीखा . बहुत दिनों के बाद किसी काल कोठरी के कैदी को जैसे दीखे धूप गुनगुनी और नयन मीलित हों ख़ुद ही, तुम क्या जानो कुछ -कुछ वैसा मुझ पर बीता जब देखा वह शब्द- चित्र अपना मन- चीता. आओ तनिक पास तो बैठो तुमसे कुछ बातें करनी हैं . बातें सदा अधूरी हैं जो , बातें सदा अनसुनी हैं जो, बातें जो मैंने कह तो दीं- . पर सुनने वाला कोई है ? तुम तो पीठ फेर बैठे हो - सदा-सदा की तरह आज भी !! __ ऋषभ देव शर्मा २८.१०.२००७.
श्राद्धश्राद्ध हे पितः ! आपके चरणों में नत है किस अधिकार से करूं
आप थे त्याग और दान की प्रतिमूर्ति, खो दिया मैंने सम्मान
अब तो ~*~ पर आप तो पिता हैं - ~*~ हाँ , मेरे कानों में गूँज रहा है अपनी सुनहरी भुजाओं में
०००० ऋषभ देव शर्मा ........... 27 janvier आतंक : दस कविताए¡
निवेदन
शुभ छब्बीस जनवरीछब्बीस जनवरी
लोकतंत्र का पर्व शुभंकर
मंगलमय हो ! तानाशाही मिटे ,
उपनिवेशी सोच हटे , सम्प्रदाय औ' जातिवाद की धुंध कटे , अंधियार छंटे ! गति को वरें -
प्रगति को चुन लें - दलबंदी के दलदल में जो संविधान के पाँव फँसे हैं ! धनबल,भुजबल की कीचड में जन गण जो आकंठ धँसे हैं , प्राणों की पुकार को सुन लें !
अब तक का इतिहास यही है :
प्रभुता पाकर सब जनता के खसम बन गए ! ऐसा ही होता आया है !
ऐसा ही होने वाला है !! कब तक
लोक शक्ति मुहताज रहेगी त्रिशंकुओं के तंत्र मंत्र की ? लोकतंत्र में जो निर्णय हो
नीर - क्षीर सबके समक्ष हो ! कुर्सीवालों के समक्ष अब एक समांतर लोकपक्ष हो !! जो हो ,
जनता की इच्छा से तय हो ! लोकतंत्र का पर्व शुभंकर मंगलमय हो !! o 23 janvier गोल महल The round-about Palaceगोल महल
गोल महल में
भारी बदबू, सीलन औ' अवसाद; धुप से टूट गया संवाद . कुर्सीजीवी कीट
बोझ से धरती दबा रहे हैं; मोटी एक किताब,
उसी के पन्ने चबा रहे हैं; दरवाज़े हैं बंद
झरोखों तक मलबे की ढेरी; दिवा रात्रि का आवर्तन है
चमगादड़ की फेरी; इसको दफ़न करें मिटटी में
बन जाने दें - खाद ! o The round-about Palace
uncontrolable stench,grimmace and uncouth
In the round -about palace
No dialogue with the sun .
parasites on seats and chairs
suck the mould.
And chew
the pages of a heavy book.
doors,windows shut ,closed
No outside air fresh or free reach
mud filled upto the actic.
there is a cycle of day and night
the bats come and go Let it decay and die
the very compost for fertility!
(translated by Dr. Gopal Sharma) घर बसे हैं Homes - live घर बसे हैं
तोड़ने की साजिशें हैं
हर तरफ़, है बहुत अचरज कि फिर भी घर बसे हैं, घर बचे हैं ! भींत, ओटे
जो खड़े करते रहे पीढियों से हम; तानते तंबू रहे औ' सुरक्षा के लिए चिक डालते; एक अपनापन छतों सा- छतरियों सा- शीश पर धारे युगों से चल रहे; झोंपड़ी में-
छप्परों में- जिन दियों की टिमटिमाती रोशनी में जन्म से सपने हमारे पल रहे; लाख झंझा- सौ झकोरे- आँधियाँ तूफान कितने टूटते हैं रोज उन पर पश्चिमी नभ से से उमड़कर ! दानवों के दंश कितने तृणावर्तों में हँसे हैं, है बहुत अचरज कि फिर भी घर बसे हैं, घर बचे हैं ! घर नहीं दीवार, ओटे,
घर नहीं तंबू, घर नहीं घूंघट; घर नहीं छत, घर न छतरी; झोंपड़ी भी घर नहीं है, घर नहीं छप्पर . तोड़ दो दीवार, ओटे,
फाड़ दो तंबू, जला दो घूंघटों को, छत गिरा दो, छीन लो छतरी, मटियामेट कर दो झोंपड़ी भी, छप्परों को उड़ा ले जाओ भले. घोंसले उजडें भले ही,
घर नहीं ऐसे उजड़ते. अक्षयवटों जैसे हमारे घर
हमारे अस्तित्व में गहरे धँसे हैं, है नहीं अचरज कि अब भी घर बसे हैं, घर बचे हैं ! घर अडिग विश्वास,
निश्छल स्नेह है घर. दादियों औ' नानियों की आँख में तैरते सपने हमारे घर. घर पिता का है पसीना, घर बहन की राखियाँ हैं, भाइयों की बाँह पर ये घर खड़े हैं; पत्नियों की माँग में ये घर जड़े हैं. आपसी सद्भाव, माँ की
मुठियों में घर कसे हैं, क्यों भला अचरज कि अब तक घर बसे हैं- घर बचे हैं. o Homes - live
Though conspire they a lot
everywhere everytime
Yet ,wonder! homes stay
Homes live.
We have been placing
walls,enclosures and shades
From ages.
And tents we put
and draw curtains for
Safety.
There is something
you may call it
togetherness
like roof on the head-protection
like umbrella- shelter
from ages- go on.
In the huts
In the tents
In the enclosures
solitary lamps twinkle
the dreams of generations .
A thousand clouds
millions of tempests
numberless storms
Fresh from the windy west
try to uproot them.
The poisonous laughter
of the demons surpass
Wonder! Homes stay
Homes live.
Home is neither shade nor walls
Nor tent nor hut
Nor veil nor umbrella
Nor roof nor anything
Home is not the name of shade .
nor what we have over our head.
dismantle every wall
hut , roof ,umbrella,shade or anything
to protect.
You can do it
But this is the way to destroy nests
or the place we live
And what you call house.
Home You can not uproot
Homes cannot be
they are deep-rooted Akshayavat.
Home is unstintited faith
Home is selflessness
placed in the eyes of our
mothers and grannies like dreams .
Home is the sweat of father and the
love -knot of sisters
On the arms of brothers.
Home is deeply knitted in the hair-partings
Of a homely wife.
Togetherness ,oneness,the unbreakable bond
is firmly placed in the tender fist of the mother.
that is home .
Do You still wonder?
Why homes stay ,homes live .
*Translated by
Dr. Gopal Sharma मारणास्त्र CATASTROPHICमारणास्त्र
मैं तैयार बैठा हूँ मारणास्त्र को अभिमंत्रित किए हुए, किसी भी क्षण तुम पर चला सकता हूँ. तुम भी तैयार बैठे हो मारणास्त्र को अभिमंत्रित किए हुए किसी भी क्षण मुझ पर चलाने के लिए. मेरा निशाना ठीक बैठ गया तो तुम मारे जाओगे. तुम्हारा निशाना ठीक बैठ गया तो मैं मारा जाऊँगा. यह भी हो सकता है: इस महाभारत में हम दोनों ही मारे जाएँ. या फिर यह भी हो सकता है कि हम दोनों ही बच जाएँ और हमारे मारणास्त्र नष्ट हो जाएँ परस्पर टकराकर बीच आकाश में. इन तमाम अनिश्चित संभावनाओं के बीच एक बात निश्चित है: घृणा के विकिरण जो निकलेंगे इन मारणास्त्रों के प्रयोग से.... उनसे काँप-काँप जाएगी हमारे घर की हवा... उनसे जहर बन जाएगा हमारे बच्चों का पीने का पानी... उनसे दहकती बारूद में बदल जाएगी हमारे पुरखों के लहू से जुती यह ज़मीन ... उनसे कसैले नीले हरे धुएँ में तब्दील हो जाएगी हमारे अग्निहोत्र की पवित्र ज्वाला.... और उनसे जीवनभक्षी ब्लैकहोल लपलपाने लगेंगे अपनी खुरदरी जीभ हमारे सपनों के नीले आकाश में...... क्या हम अपनी आत्मा पर ले लें इतने सारे पाप पंचतत्वों के विरुद्ध- (केवल टकराते हुए अपने-अपने अहं के लिए)? o Catastrophic I am here ready to aim with the weapon of mass-destruction any moment it will strike you. You Too are there ready to aim with the weapon any moment to strike. If i could aim right You will be nowhere in sight and if you could i shall be no more. It is also possible that in this war of nerves:The Mahabharat Both of us perish. Or both of us escape unhurt. and the weapons that aimed at each one strike in the mid -sky and Fall like a withered tree. Out of all these uncertainties One thing is certain the hatred being born out of this conflict and the radiation thus spread will poison the environment and the water our children might drink will be just the sip of death. the homely air shudder at the very thought of it. My native land-the land of of our forefathers they tilled it with their blood and sweat will trasform into flaming metal. and the green trite smoke will come out of our pious agnihotra. The life-sucker blackholes will be visible in the blue sky of our rainbow dreams . Should we take all these sins on our souls against all the firmament ? ( Only for the sake of our unquenched egos). tranlated by Dr. Gopal Sharma Prof. Dept. of english, Univ. of Bengazi Libya |
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