rishabha's profileऋषभ की कविताएँPhotosBlogListsMore ![]() | Help |
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November 22 पुरुष विमर्श1. ओ पिता! तुम्हारा धन्यवाद नन्हें हाथों में कलम धरी. भाई! तेरा भी धन्यवाद आगे आगे हर बाट करी. तुम साथ रहे हर संगर में मेरे प्रिय! तेरा धन्यवाद; बेटे! तेरा अति धन्यवाद हर शाम दिवस की थकन हरी. शिव बिना शक्ति कब पूरी है शिव का भी शक्ति सहारा है. मेरे भीतर की अमर आग को तुमने नित्य सँवारा है. अनजान सफ़र पर निकली थी विश्वास तुम्हीं से था पाया; मैं आज शिखर पर खड़ी हुई इसका कुछ श्रेय तुम्हारा है. 2. ओ पिता! तुम्हारा धन्यवाद सपनों पर पहरे बिठलाए | भाई! तेरा भी धन्यवाद तुम दूध छीन कर इठलाए || संदेहों की शरशय्या दी पतिदेव! आपका धन्यवाद ; बेटे! तुमको भी धन्यवाद आरोप-दोष चुन-चुन लाए || मैं आज शिखर पर खड़ी हुई इसका सब श्रेय तुम्हारा है! तुमसब के कद से बड़ी हुई इसका सब श्रेय तुम्हारा है! कलकल छलछल बहती सरिता जम गई अहल्या-शिला हुई; मन की कोमलता कड़ी हुई इसका सब श्रेय तुम्हारा है! मुझे मेरा पीहर लौटा दोकब से देख रही हूँ रास्ता माँ के घर से बुलावा आएगा मैं पीहर जाऊँगी सबसे मिलूँगी बचपन से अपनी पसंद के पकवान जी भर खाऊँगी निंगोल चाक्कौबा पर्व मनाऊँगी बरस भर से देख रही हूँ रास्ता याद आता है बचपन बड़ी बहन इसी दिन हर बरस आती थी दूर पहाड़ी की तलहटी में खिलखिलाते गाँव से घाटी के घर में, भाभी इसी दिन हर बरस जाती थी पर्वत शिखर से बतियाते अपने पीहर ससुराल की घाटी से कितनी बार कहा इमा से कितनी बार कहा इपा से कितनी बार कहा तामो से मैं इतनी दूर नहीं जाऊँगी इतनी दूर ब्याही गई तो जी नहीं पाऊँगी पर ब्याही गई इतनी ही दूर काले कोसों कहाँ घाटी में माँ का घर कहाँ नौ पहाड़ियों के पार मेरी ससुराल सबने यही कहा था निंगोल चाक्कौबा पर तो हर बरस आओगी ही [इस दिन मिट जाती हैं सब दूरियाँ घाटी और पहाड़ी की] सारी सुहागिनें इस दिन न्यौती जाती हैं माँ के घर प्रेम से भोजन कराएगी माँ अपने हाथ से उपहार देगा भाई हमारे मणिपुर में इसी तरह तो मनाते थे निंगोल चाक्कौबा पिछले बरस तक विवाहित लड़कियों [निंगोल] को घर बुलाते थे भोजन कराते थे [चाक्कौबा] घाटी और पहाड़ी का प्यार इस तरह बढ़ता जाता था हर बरस सारा समाज मनाता था मणिपुरी बहनापे का पर्व पर इस बार कोई बुलावा नहीं आया कोई न्यौता नहीं आया भाई भूल गया क्या? माँ तू कैसे भूल गई दूर पहाड़ी पार ब्याही बेटी को? मैं तड़प रही हूँ यहाँ तुम वहाँ नहीं तड़प रहीं क्या? माँ बेटी के बीच में भाई बहन के बीच में पर्वत घाटी के बीच में यह राजनीति कहाँ से आ गई अभागी??? क्यों अलगाते हो पर्वत को घाटी से भाई को बहन से माँ को बेटी से ??? मुझे मेरा पीहर लौटा दो मेरी माँ मुझे लौटा दो मेरा निंगोल चाक्कौबा लौटा दो !!! कब से देख रही हूँ रास्ता ........ यो मे प्रतिबलो लोके तुम तो त्रिलोक के स्वामी हो.
तुमने देवों को जीता है. सब रत्न तुम्हारे चरणों में. सब पर अधिकार तुम्हारा है. तुमने ऐरावत छीन लिया बिगडे घोड़ों को साधा है. धरती पर्वत आकाश वायु पाताल सिंधु को बाँधा है. तुमने मुझको भी रत्न कहा . चाहा किरीट में जड़ लोगे. जीवित ज्वाला की लहरों को अपनी मुट्ठी में कर लोगे. मुझको यह प्रभुता रास नहीं. मैं रत्न नहीं! मैं दास नहीं! तेरा स्वभाव तो प्रभुता का . 'ना' सुनने का अभ्यास नहीं. तेरी लोलुपता आहत हो मेरे केशों की ओर बढ़ी. तू मुझे धरा पर खींचेगा, मेरी मर्यादा नोंचेगा; था ज्ञात मुझे तू इसी तरह वश में करने की सोचेगा. पर मेरे केश नहीं आते तेरे जैसों की मुट्ठी में. मैं तिरस्कार का कालकूट पी चुकी प्रथम ही घुट्टी में. मैं कोमल मधुमय दीपशिखा आशीष बरसने वाली हूँ. अपनी करुणा की किरणों से रसधार सरसने वाली हूँ. पर मैं ही ज्वालामुखी शिखर. मैं ही श्मसान का आर्तनाद. प्राणों में झंझावात लिए मैं प्रलय निशा का शंखनाद. तू मुझको जान नहीं पाया. कोई न अभी तक भी जाना. मैं वस्तु नहीं, जीवित प्राणी. पर तूने मुझे भोग्य माना. बस इसीलिए तो मुझको यह संग्राम जीतना ही होगा. जो सचमुच मेरा प्रतिबल हो वह प्रणय खोजना ही होगा! August 23 जाने कैसी स्त्री थी वह जाने कैसी स्त्री थी वह
जाने कैसी स्त्री थी वह , कितनी धीर , कितनी सबल ! कैसे कहा होगा उसने माता पिता से, पीहर और ससुराल से - - नहीं ,मुझे यह विवाह स्वीकार नहीं - न, मैं नहीं मानती बालपने की शादी को - गुडिया के खेल तक की समझ न थी मुझे विवाह की समझ कैसे होती - आपका दिया यह पति मेरा पति नहीं ! कैसे टटोला होगा अपने आप को जवाब दिया होगा दुनिया को - - बंधन है बिना प्रेम का विवाह और मुझे अस्वीकार - कोई पुरुष दीखा ही नहीं प्रेम के योग्य ; एक परमपुरुष के सिवा - वह आलोकसुंदर परमपुरुष ही मेरा प्रियतम है ! कैसे किया होगा सामना तन मन को बींधती ज़हरबुझी नज़रों का , नकारा होगा अध्यात्म का भी आकर्षण तोड़कर शृंखला की कड़ियाँ सारी भारी - - स्त्री पुरुष में जो भेद करे वह धर्म मेरा नहीं - स्त्री जाति से जो भयभीत हो वह गुरु मेरा नहीं ! कैसे बाँटा होगा उसने अपने अस्तित्व को अपने स्वयं रचे परिवार में - किसी विधवा नौकरानी को किसी सेवक को किसी जिज्ञासु को किसी गाय, किसी गिलहरी , किसी मोरनी को ! उसने जीते जी मुक्ति अर्जित की विराटता सिरजी - कभी बदली कभी दीप कभी कीर बनकर. उसी ने दिखाया मुक्ति का मार्ग मेरी स्त्री को संपूर्ण आत्मदान के बहाने न्यस्त करके स्वयं को सर्वजन की आराधना में . वह सच ही महादेवी थी !! हे अग्नि!हे अग्नि!
हे अग्नि!
तुम्हें प्रणाम करते हैं हम।
बहुत क्षमता है तुममें
बड़ा ताप है -
बड़ी जीवंतता।
तुम जल में भी सुलगती हो
और वायु में भी,
भूगर्भ में भी तुम्हीं विराजमान हो
और व्यापती हो आकाश में भी तुम।
हमारे अस्तित्व में अवस्थित हो तुम
प्राण बनकर।
परमपावनी!
तुममें अनंत संभावनाएँ हैं
तुम्हीं से पवित्रता है इस जगत में।
फूँकती हो तुम सारे कलुष को,
शोधती हो फिर-फिर
हिरण्यगर्भ ज्ञान की शिखा को।
तुम ही तो जगती हो
हमारे अग्निहोत्र में
और आवाहन करते हैं तुम्हारा ही तो
संध्या के दीप की लौ में हम।
जगो, आज फिर,
खांडवप्रस्थ फैला है दूर-दूर
डँसता है प्रकाश की किरणों को,
फैलाता है अँधेरे का जाल
उगलता है भ्रम की छायाओं को।
उठो, तुम्हें करना है
छायाओं में छिपे सत्य का शोध।
तुम चिर शोधक हो, हे अग्नि!
तुम्हें प्रणाम करते हैं हम।
July 30 राधा क्या चाहेराधा क्या चाहे ''राधिके!'' ''हूँ?'' ''भला क्या तो है तेरे कान्हा में?'' ''पता नहीं.'' ''पौरुष?'' ''होगा. बहुतों में होता है.'' ''सौंदर्य?'' ''होगा. पर वह भी बहुतों में है.'' ''प्रभुता?'' ''होने दो. बहुतों में रही है.'' ''फिर क्यों खिंची जाती है तू बस उसी की ओर?'' ''उसे मेरी परवाह है न!'' http://streevimarsh.blogspot.com/2009/07/blog-post_17.html July 15 अम्मा, ग़रज़ पड़ै चली आओ चूल्हे की भटियारी !
दो बेटे हैं मेरे. गबरू जवान निकले दोनों ही. वक़्त बदल गया. ज़मीन के लिए लड़े दोनों बलजोर ने बरजोरी लगवा लिया अँगूठा दोनों ने दरवाजे बंद कर लिए, जीवन भर रोटी थेपती आई. June 16 गाड़िया लुहारिन का प्रेम गीतपिता ने संडासी जैसे दृढ़ हाथों से माँ धौंक रही भट्टी तप रही. मैं और तुम पिता ने भरी हुंकारी. तुम्हारी आँखें मेरी आँखों में, एक गोले में घिरे हम. घन बिजली की तरह चले. ढल गया लोहा. चिहुँक उठा सारा कबीला. पंचों ने हमारी शादी तय कर दी है! लोहा एक बार फिर सच में तू मेरी जोट का है ! http://streevimarsh.blogspot.com/2009/06/blog-post_14.htmlJune 03 इतिहास हंता मैं![]() इतिहास हंता मैं तुम्हें पाने को , मैंने धरम की दीवार गिराई थी तुम्हें पाने को, अपने पिता से आँख मिलाई थी - भाई से ज़बान लड़ाई थी - तुम्हें पाने को! माँ अपनी कोख नाखूनों से नोंचती रह गई , पिता ने जीते जी मेरा श्राद्ध कर दिया; मैंने मुड़ कर नहीं देखा. मैं अपना इतिहास जलाकर आई थी - तुम्हें पाने को! तुमने मुझे नया नाम दिया - मैंने स्वीकार किया , तुमने मुझे नया मज़हब दिया - मैंने अंगीकार किया. वैसे ये शब्द उतने ही निरर्थक थे जितना मेरा जला हुआ अतीत. मैंने प्रतिकार नहीं किया था . तुम जैसे भी थे,जो भी थे - बेशर्त मेरे प्रेमपात्र थे. मैं भागी चली आई थी तुम्हें पाने को ; और सो गई थी थककर चकनाचूर. आँख खुली तो तुम्हारी दाढ़ी उग आई थी , तुम हिजाब कहकर मेरे ऊपर कफ़न डाल रहे थे. तुम्हारी आँखों में देखा मैंने झाँककर - ये तो मेरे पिता की आँखें हैं! मैं देखती ही रह गई ; तुमने मुझे ज़िंदा कब्र में गाड़ दिया! एक बार फिर सब कुछ जलाना होगा - मुझे खुद को पाने को!! May 19 प्रशस्तियाँApril 16 गर्भभारगर्भभार
-ऋषभ देव शर्मा Posted to Beyond The Second Sex (स्त्रीविमर्श) March 17 बनाया था माँ ने वह चूल्हा
March 06 औरतें औरतें नहीं हैं !
February 18 अश्लील है तुम्हारा पौरुष
February 03 मुझे पंख दोगे ?
January 17 मुझे तो न्याय चाहिए *गन्धर्वों के देश आया था एक राजकुमार भरतवंशी. छलछलाता हुआ पौरुष. मूर्तिमान काम देव. उछलती हुई मछलियाँ। उफनता हुआ यौवन आँखों में लहरा उठा समुद्र पहली ही दृष्टि में। बँध गए हम दोनों बाहुबंधन में. पिघल - पिघल गया मेरा रूप. जान पाई मैं पहली बार स्त्री होने का सुख। मैं बाँस का वन थी - वह संगीत था. मैं पर्वत थी - वह गूँजती आवाज़. देह की साधना थी, आत्मा का आनंद था. उसे पाकर मैं धन्य थी, मुझे पाकर वह पूर्ण था. 'सुरत कलारी भई मतवारी मदवा पी गई बिन तोले'। खुमार उतरा तो वह जा चुका था वापस अपने देसों! काले कोसों ! मैं अकेली रह गई। मैं मेघदूत की यक्षिणी नहीं थी, नहीं थी मैं नैषध की दमयंती. मैं शकुन्तला भी नहीं थी, राधा बनना भी मुझे स्वीकार न था. मैं चल पड़ी - बियाबान लाँघती, शिखर - शिखर फलाँगती. रास्ता रोका समन्दरों ने, ज्वालामुखियों ने, शेर बघेरों ने, साँपों ने, सँपेरों ने। मन तो घायल था ही, तन भी तार - तार कर दिया दुनिया ने। मैं नहीं रुकी मैं नहीं झुकी मैं नहीं थमी मैं नहीं डरी........ आ पहुँची आग का दरिया तैर कर काले कोसों ! उसके देसों !! कितनी खुश थी मैं ! उससे मिलना जो था !! पर खुशी पर गिरी बिजली तड़प कर . वह तो दूसरी दुनिया बसाए बैठा है !! लौट जाऊँ मैं ? उसे नई दुनिया में खुश देखकर खुश होती रहूँ ? रोती रहूँ ?? उसकी खुशी में खुश रहूँ ??? - सोचा था मैंने एक बार को नहीं, मैं रोई नहीं. मैंने थाम लिया उसका गरेबान ; और घसीट ले आई चौराहे पर. नहीं, अब मुझे उसकी ज़रूरत नहीं. मुझे तो न्याय चाहिए ! न्याय चाहिए उस नई दुनिया को भी जो उसने बसाई है - मेरा घर उजाड़ कर !! ० - ऋषभ देव शर्मा *सन्दर्भ Posted By कविता वाचक्नवी to Beyond The Second Sex (स्त्रीविमर्श) at 1/17/2009 05:20:00 AM January 01 पहली भोरएकालाप -१४
पहली भोर
बरस भर वह उगलता रहा मेरे मुँह पर दिन भर का तनाव हर शाम ! आज नए बरस की पहली भोर मैंने दे मारा पूरा भरा पीकदान उसके माथे पर !! कैसा लाल - लाल उजाला फ़ैल गया सब ओर !!! - ऋषभ देव शर्मा December 16 'न' कहने की सज़ा
December 04 हर औरत काँपती है
November 18 औरतेंऔरतें -ऋषभ देव शर्मा सुनो, सुनो, अवधूतो! सुनो, कबीर ने आज फिरसाधुओं! सुनो, एक अचंभा देखा है आज फिर पानी में आग लगी है आज फिर चींटी पहाड़ चढ़ रही है नौ मन काजर लाय, हाथी मार बगल में देन्हें ऊँट लिए लटकाय! नहीं समझे? अरे, देखते नहीं अकल के अंधो! औरतों की वकालत के लिए मर्द निकले हैं, कुरते-पाजामे-धोती-टोपी वाले मर्द! वे उन्हें उनके हक़ दिलवाकर ही रहेंगे . राजनीति में सब कुछ सम्भव है. यहाँ घोड़े और घास में यारी हो सकती है . कुर्सी कुछ भी करा सकती है. -कुर्सी महा ठगिनी हम जानी! कुर्सी का ही तो प्रताप है कि शेर हिरनियों की हिफाजत कर रहे हैं (मर्द औरतों की वकालत कर रहे हैं). सुनो, सुनो, अवधूतो! सुनो, साधुओं! सुनो, इन चीखों को सुनो, इतिहास के खंडहरों को चीरकर आती हुई ये चीखें औरतों की हैं, मर्दों की सताई हुई औरतों की कलपती हुई आत्माएं नाचती हैं चुडैल बनकर, हाहाकार मचाती हैं, चीखती चिल्लाती हैं, दुनिया की तरफ़ दोनों हाथ फैलाकर बार बार बताती हैं : हम चुडै़लें हैं, हम औरतें थीं; हमारी भी जात-बिरादरी थी, हममें भी ऊँच-नीच थी, हमारे भी धरम-ईमान थे, लकिन मर्दों ने जब जब हमें घरों से निकाला, हंटरों से पीटा ठोकरों से मारा, आग में झोंका, पहियों तले रौंदा, खेतों में फाड़ा, दफ्तरों में उघाड़ा, बिस्तर में भोगा, बाज़ार में बेचा, सडकों पर नंगे घुमाया, मगरमच्छों को खिलाया, तंदूर में पकाया, तब तब हमने जाना : हमारी कोई जात-बिरादरी न थी; हममें कोंई ऊँच-नीच न थी; हमारे कोई धरम-ईमान न थे; हम औरतें थीं, सिर्फ़ औरतें; मर्दों की खातिर औरतें! रूप कुंवर, शाह बानो, लता, अमीना, भंवरी बाई, माया त्यागी, फूलन..........., श्रीमती अ, मैडम ब, या बेगम स.......... नाम कुछ भी हो, औरतें सिर्फ़ औरतें हैं मर्दों की दुनिया में. औरतें.....चुडै़लें......! चुडै़लें........औरतें......! सुनो, सुनो, अवधूतो! सुनो, साधुओ! सुनो, इन नारों को सुनो, इन भाषणों को सुनो, संसद और विधान मंडलों को घेरकर उठती हुई इन आवाजों को सुनो, रुदालियों की पोशाक में मर्द स्यापा कर रहे हैं, छाती पीट रहे हैं, धरती कूट रहे हैं, आसमान फाड़ रहे हैं. मानते हैं - औरतजात एक हैं सारी दुनिया में; पर कुर्सी की राजनीति को ऐसा एका बर्दाश्त नहीं, कुर्सी की खातिर उन्हें तोड़ना ही होगा जात - बिरादरी में, बिखेरना ही होगा धर्म और मजहब में ! और वे चीख रहे हैं: औरतें एक नहीं हैं! औरतें एक नहीं हो सकतीं! कैसे हो सकती हैं औरतें एक, हमसे पूछे बिना? सुनो, सुनो, अवधूतो ! सुनो, साधुओ ! सुनो, इतिहास के खँडहर में नाच रही हैं चुडै़लें हँसती हुईं, रोती हुईं , गाती हुईं : दुनिया भर की औरतों , एक हो ! तुम्हारे पास कुछ भी नहीं है खोने को - सिवा मर्दों की गुलामी के !! (स्रोत : ताकि सनद रहे , २००२, पृष्ठ : ९८-१०२) -- Posted By कविता वाचक्नवी to Beyond The Second Sex (स्त्रीविमर्श) at 11/17/2008 04:17:00 PM |
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