सुनो दुश्मन! मैं न तो किसी फौज का जनरल हूँ, न किसी देश का प्रधानमंत्री, मैं दूरदर्शन का निदेशक भी नहीं हूँ और खुफ़िया विभाग की नौकरी भी कब का छोड़ चुका हूँ, मैं कोई वाइस चांसलर भी नहीं हूँ, न मैं किसी का अंग रक्षक हूँ न मेरा कोई अंग रक्षक।
मैं तो एक यात्री हूँ बस या ट्रेन की सीट पर ऊँघता हुआ, दफ्तर, बाज़ार और घर के तिकोन में भटकता हुआ, और इसीलिए तुम्हारी हिट-लिस्ट का एक नाम-रूप-हीन निशाना हूँ।
हर दिशा में मेरा पीछा कर रही है तुम्हारी आर डी एक्स की दैत्याकार आँख- सूँघती हुई बारूदी नथुनों से 'सूँ साँ माणस गंध'
लगातार दौड़ रहा हूँ मैं पर यह निगोड़ी 'माणस गंध' छिपाए नहीं छिपती।
तो ठीक है इस गंध को ही हथियार बनाना पड़ेगा अब मुझे...
लो, दौड़ना छोड़कर आ खड़ा हुआ हूँ तुम्हारे सामने निर्णायक युद्ध में, क्योंकि अर्थहीन हो गए हैं। वे सारे देवता जिन्होंने लिया था भार भारत का, लोकतंत्र के योगक्षेम का,
जय अथवा पराजय अप्रासंगिक है मेरे और तुम्हारे इस युद्ध में... प्रासंगिक है तो केवल तुम्हारा आसुरी उन्माद, प्रभुओं की नपुंसकता और मेरे अभिमन्युपन की शाश्वत माणस गंध!!!
मैं न तो किसी फौज का जनरल हूँ, न किसी देश का प्रधानमंत्री , मैं दूरदर्शन का निदेशक भी नहीं हूँ और खुफिया विभाग की नौकरी भी कब का छोड़ चुका हूँ, मैं कोई वाइस चांसलर भी नहीं हूँ, न मैं किसी का अंग रक्षक हूँ न मेरा कोई अंग रक्षक .
मैं तो एक यात्री हूँ बस या ट्रेन की सीट पर ऊंघता हुआ, दफ्तर, बाज़ार और घर के तिकोन में भटकता हुआ ; और इसीलिये तुम्हारी हिट-लिस्ट का एक नाम-रूप-हीन निशाना हूँ.
हर दिशा में मेरा पीछा कर रही है तुम्हारी आर डी एक्स की दैत्याकार आँख - सूंघती हुई बारूदी नथुनों से 'सूँ साँ माणस गंध'.......
लगातार दौड़ रहा हूँ मैं पर यह निगोड़ी ' माणस गंध'....... छिपाए नहीं छिपती.
तो ठीक है इस गंध को ही हथियार बनाना पड़ेगा अब मुझे..
लो , दौड़ना छोड़कर आ खड़ा हुआ हूँ
तुम्हारे सामने निर्णायक युद्ध में, क्योंकि अर्थहीन हो गए हैं. वे सारे देवता जिन्होंने लिया था भार भारत का , लोकतंत्र के योगक्षेम का ,
जय अथवा पराजय अप्रासंगिक है मेरे और तुम्हारे इस युद्ध में....... प्रासंगिक है तो केवल तुम्हारा आसुरी उन्माद , प्रभुओं की नपुंसकता और मेरे अभिमन्युपन की शाश्वत माणस गंध !!! .....................................१२/५/१९९० ...................
मेरा भारत विश्वजाल पर देश-भक्ति की कविताओं का संकलन
भारत माता का जयगान
दिशा-दिशा में गूँज रहा है, भारत माता का जयगान! भारत का संदेश विश्व को, मानव-मानव एक समान!!
यहाँ सृष्टि के आदि काल में, समता का सूरज चमका, करुणा की किरणों से खिलकर, धरती का मुखड़ा दमका! सुनो! मनुजता को हमने ही, आत्म त्याग सिखलाया है, लालच और लोभ को तजकर, पाठ पढ़ाया संयम का!!
जो जग के कण-कण में रहता, सब प्राणी उसकी संतान! भारत का संदेश विश्व को, मानव-मानव एक समान!!
रहें कहीं हम लेकिन शीतल, मंद सुगंधें खींच रहीं यह धरती अपनी बाहों में, परम प्रेम से भींच रही! सारे धर्मों, सभी जातियों, सब रंगों, सब नस्लों को, ब्रह्मपुत्र, कावेरी, गंगा, कृष्णा, झेलम सींच रहीं!!
ऊँच नीच का भेद नहीं कुछ, सद्गुण का होता सम्मान! भारत का संदेश विश्व को, मानव-मानव एक समान!!
हमने सदा न्याय के हक़ में, ही आवाज़ उठाई है, अपनी जान हथेली पर ले, अपनी बात निभाई है! पुरजा-पुरजा कट मरने की, सदा रखी तैयारी भी, वंचित-पीड़ित-दीन-हीन की, अस्मत सदा बचाई है!
जन-गण के कल्याण हेतु हम, सत्पथ पर होते बलिदान! भारत का संदेश विश्व को, मानव-मानव एक समान!!
जिसके भी मन में स्वतंत्रता, अपनी जोत जगाती है, जो भी चिड़िया कहीं सींखचों, से सिर को टकराती है! वहाँ-वहाँ भारत रहता है, वहाँ-वहाँ भारत माता, जहाँ कहीं भी संगीनों पर, कोई निर्भय छाती है!
आज़ादी के परवानों का, सदा सुना हमने आह्वान! भारत का संदेश विश्व को, मानव-मानव एक समान!!
सब स्वतंत्र हैं, सब समान हैं, सब में भाईचारा है, सब वसुधा अपना कुटुंब है, विश्व-नीड़ यह प्यारा है! पंछी भरें उड़ान प्रेम से, दिग-दिगंत नभ को नापें, कहीं शिकारी बचे न कोई, यह संकल्प हमारा है!
युद्ध और हिंसा मिट जाएँ, ऐसा चले शांति अभियान! भारत का संदेश विश्व को, मानव-मानव एक समान!!
जल में, थल में और गगन में मूर्तिमान भारतमाता, अधिकारों में, कर्तव्यों में, संविधान भारतमाता! हिंसासुर के उन्मूलन में, सावधान भारतमाता, 'विजयी-विश्व तिरंगा प्यारा', प्रगतिमान भारतमाता!!
मनुष्यता की जय-यात्रा में, नित्य विजय, नूतन उत्थान! भारत का संदेश विश्व को, मानव-मानव एक समान!!
दिशा-दिशा में गूँज रहा है, भारत माता का जयगान! भारत का संदेश विश्व को, मानव-मानव एक समान!!
सिर पर धरे धुएँ की गठरी मुँह पर मले गुलाल चले हम धोने रंज मलाल !
होली है पर्याय खुशी का खुलें और खिल जाएँ हम; होली है पर्याय नशे का - पिएँ और भर जाएँ हम; होली है पर्याय रंग का - रँगें और रंग जाएँ हम; होली है पर्याय प्रेम का - मिलें और खो जाएँ हम; होली है पर्याय क्षमा का - घुलें और धुल जाएँ गम !
मन के घाव सभी भर जाएँ, मिटें द्वेष जंजाल; चले हम धोने रंज मलाल !
होली है उल्लास हास से भरी ठिठोली, होली ही है रास और है वंशी होली होली स्वयम् मिठास प्रेम की गाली है, पके चने के खेत गेहुँ की बाली है सरसों के पीले सर में लहरी हरियाली है, यह रात पूर्णिमा वाली पगली मतवाली है।
मादकता में सब डूबें नाचें गलबहियाँ डालें; तुम रहो न राजा राजा मैं आज नहीं कंगाल; चले हम धोने रंज मलाल !
गाली दे तुम हँसो और मैं तुमको गले लगाऊँ, अभी कृष्ण मैं बनूँ और फिर राधा भी बन जाऊँ; पल में शिव-शंकर बन जाएँ पल में भूत मंडली हो।
वे रसोई में अडी़ हैं, अडी़ रहें. वे बिस्तर में पड़ी हैं, पड़ी रहें. यानी वे संसद के बाहर खड़ी हैं, खड़ी रहें?
' गलतफहमी है आपको . सिर्फ़ आधी आबादी नहीं हैं वे. बाकी आधी दुनिया भी छिपी है उनके गर्भ में, वे घुस पड़ीं अगर संसद के भीतर तो बदल जाएगा तमाम अंकगणित आपका. ' उन्हें रोकना बेहद ज़रूरी है, कुछ ऐसा करो कि वे जिस तरह संसद के बाहर खड़ी हैं, खड़ी रहें!
उन्हें बाहर खड़े रहना ही होगा कम से कम तब तक जब तक हम ईजाद न कर लें राजनीति में उनके इस्तेमाल का कोई नया सर्वग्राही सर्वग्रासी फार्मूला.
शी......................... कोई सुन न ले............... चुप्प ...............!
चुप रहो, हमारे विष्णु, हमारे इन्द्र- वृंदा और अहिल्या के किलों की दीवारों में सेंध लगा रहे हैं; फोड़ने दो. तब तक कुछ ऐसा करो कि वे जिस तरह संसद के बाहर खड़ी हैं, खड़ी रहें!
कुछ ऐसा करो कि वे चीखे, चिल्लाएं, आपस में भिड़ जाएं और फिर सुलह के लिए हमारे पास आएं.
हमने किसानों का एका तोड़ा, हमने मजदूरों को एक नहीं होने दिया, हमने बुद्धिजीवियों का विवेक तोड़ा, हमने पूंजीपतियों के स्वार्थ को भिड़ा दिया और तो और.............हमने तो पूरे देश को अपने-आप से लड़ा दिया.
अगडे़-पिछड़े के नाम पर ऊँच-नीच के नाम पर ब्राह्मण-भंगी के नाम पर हिंदू-मुस्लिम के नाम पर काले-गोरे के नाम पर दाएँ-बाएँ के नाम पर हिन्दी-तमिल के नाम पर सधवा-विधवा के नाम पर अपूती-निपूती के नाम पर कुंआरी और ब्याहता के नाम पर के नाम पर..... के नाम पर.... के नाम पर.....
अलग अलग झंडियाँ अलग अलग पोशाकें बनवाकर बाँट दी जाएं आरक्षण के ब्राह्म मुहर्त में इकट्ठा हुईं इन औरतों के बीच!
फिर देखना : वे भीतर आकर भी संसद के बाहर ही खड़ी रहेंगी; पहले की तरह रसोई और बिस्तर में अडी़ रहेंगी, पड़ी रहेंगी! ~*~
आओ तनिक यहाँ बैठो तुम तुमसे कुछ बातें करनी हैं . शोर सुना तुमने लोगों का मेरा मौन ज़रा सुन देखो . पहली बार देखकर कोई ताजमहल जैसे भौंचक हो जलेपंख वाला संपाति बादल-बादल तैर रहा हो, वैसे ही मैं हर्ष और विस्मय का सागर डूब -डूब कर तिरने लगता- शब्दों की रेखाओं से तुम जब भी कोई चित्र बनाते नया-नया सा, ताजा,टटका !
मैं अवाक् हो सिर्फ़ ताकता रह जाता हूँ कभी तुम्हें तो कभी चित्र को. कभी चित्र में तुम दिखते हो, कभी चित्र तुममें दिखता है.
आज अभी तो ऐसा दीखा, जबरन ओढी केंचुल कोई तुमने स्वयं नोंच डाली है, सारी कोमलता को अपनी खुली हवा में खोल दिया है , भला हवाओं से क्या डरना झंझाओं से शक्ति मिलेगी - दीपक का विश्वास नया यह शब्द-शब्द में दीपित दीखा . बहुत दिनों के बाद किसी काल कोठरी के कैदी को जैसे दीखे धूप गुनगुनी और नयन मीलित हों ख़ुद ही, तुम क्या जानो कुछ -कुछ वैसा मुझ पर बीता जब देखा वह शब्द- चित्र अपना मन- चीता.
आओ तनिक पास तो बैठो तुमसे कुछ बातें करनी हैं . बातें सदा अधूरी हैं जो , बातें सदा अनसुनी हैं जो, बातें जो मैंने कह तो दीं- .