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4 décembre

'सूँ साँ माणस गंध' : अनुभूति में ऋषभदेव शर्मा की रचनाएँ

 

प्रत्येक सोमवार को प्रकाशित
 
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teamanu@anubhuti-hindi.org

अभिव्यक्ति  १. १२. २००८

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'सूँ साँ माणस गंध'

 

सुनो दुश्मन!
मैं न तो
किसी फौज का जनरल हूँ,
न किसी देश का प्रधानमंत्री,
मैं दूरदर्शन का निदेशक भी नहीं हूँ
और खुफ़िया विभाग की नौकरी भी
कब का छोड़ चुका हूँ,
मैं कोई वाइस चांसलर भी नहीं हूँ,
न मैं किसी का अंग रक्षक हूँ
न मेरा कोई अंग रक्षक।

मैं तो एक यात्री हूँ
बस या ट्रेन की सीट पर ऊँघता हुआ,
दफ्तर, बाज़ार और
घर के तिकोन में भटकता हुआ,
और इसीलिए
तुम्हारी हिट-लिस्ट का
एक नाम-रूप-हीन निशाना हूँ।

हर दिशा में मेरा पीछा कर रही है
तुम्हारी आर डी एक्स की दैत्याकार आँख-
सूँघती हुई बारूदी नथुनों से
'सूँ साँ माणस गंध'

लगातार दौड़ रहा हूँ मैं
पर यह निगोड़ी 'माणस गंध'
छिपाए नहीं छिपती।

तो ठीक है
इस गंध को ही
हथियार बनाना पड़ेगा अब मुझे...

लो,
दौड़ना छोड़कर आ खड़ा हुआ हूँ
तुम्हारे सामने
निर्णायक युद्ध में,
क्योंकि अर्थहीन हो गए हैं।
वे सारे देवता
जिन्होंने लिया था भार भारत का,
लोकतंत्र के योगक्षेम का,

जय अथवा पराजय
अप्रासंगिक है
मेरे और तुम्हारे इस युद्ध में...
प्रासंगिक है तो केवल
तुम्हारा आसुरी उन्माद,
प्रभुओं की नपुंसकता
और मेरे अभिमन्युपन की
शाश्वत माणस गंध!!!

-ऋषभदेव शर्मा

अनुभूति में ऋषभदेव शर्मा की रचनाएँ-

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सूँ साँ माणस गंध

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रोटी दस तेवरिया
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11 octobre

'सूँ साँ माणस गंध'

100755121_9733e56abe610x.......
 
 'सूँ साँ माणस गंध'
 
 
 

सुनो दुश्मन! 
 
मैं न तो
किसी फौज का जनरल हूँ,
न किसी देश का प्रधानमंत्री ,
मैं दूरदर्शन का निदेशक भी नहीं हूँ
और खुफिया विभाग की नौकरी भी
कब का छोड़ चुका हूँ,
मैं कोई वाइस चांसलर भी नहीं हूँ,
न मैं किसी का अंग रक्षक हूँ
न मेरा कोई अंग रक्षक .
 
 
मैं तो एक यात्री हूँ
बस या ट्रेन की सीट पर ऊंघता हुआ,
दफ्तर, बाज़ार और
घर के तिकोन में भटकता हुआ ;
और इसीलिये
तुम्हारी हिट-लिस्ट का
एक नाम-रूप-हीन निशाना हूँ.
 
 
हर दिशा में मेरा पीछा कर रही है
तुम्हारी आर डी एक्स की दैत्याकार आँख -
सूंघती हुई बारूदी नथुनों से
'सूँ साँ माणस गंध'.......
 
 
लगातार दौड़ रहा हूँ मैं
पर यह निगोड़ी ' माणस गंध'.......
छिपाए नहीं छिपती.
 
 
तो ठीक है
इस गंध को ही
हथियार बनाना पड़ेगा अब मुझे..
 
 
 
लो ,
दौड़ना छोड़कर आ खड़ा हुआ हूँ
तुम्हारे सामने
निर्णायक युद्ध में,
क्योंकि अर्थहीन हो गए हैं.
वे सारे देवता
जिन्होंने लिया था भार भारत का ,
लोकतंत्र के योगक्षेम  का ,
 
जय अथवा पराजय
अप्रासंगिक है
मेरे और तुम्हारे इस युद्ध में.......
प्रासंगिक है तो केवल
तुम्हारा आसुरी उन्माद ,
प्रभुओं की नपुंसकता
और मेरे  अभिमन्युपन की
शाश्वत माणस गंध !!!
.....................................१२/५/१९९० ...................
 

25 août

पूज पाया जो नहीं इंसान को!

 
पूजाcharity
 
पूज पाया जो नहीं इंसान को!
पूज पायेगा कहाँ भगवान् को??                   
 
 
 
 
दूसरों का हक़ दबाना चाहते
पूजते हैं लोग वे शैतान को!!
 
 
 
 
पूज्य हैं सबसे प्रथम माता-पिता,
सीखना यह चाहिए संतान को!!

 


देश में राजा भले पुजते रहें,
पूजती दुनिया मगर विद्वान् को!!o
 

23 août

प्रिये चारुशीले





श्रीकृष्ण जन्माष्टमी - २४/०८/२००८
22 août

भारत माता का जयगान

मेरा भारत
 विश्वजाल पर देश-भक्ति की कविताओं का संकलन

भारत माता का जयगान

दिशा-दिशा में गूँज रहा है, भारत माता का जयगान!
भारत का संदेश विश्व को, मानव-मानव एक समान!!

यहाँ सृष्टि के आदि काल में, समता का सूरज चमका,
करुणा की किरणों से खिलकर, धरती का मुखड़ा दमका!
सुनो! मनुजता को हमने ही, आत्म त्याग सिखलाया है,
लालच और लोभ को तजकर, पाठ पढ़ाया संयम का!!

जो जग के कण-कण में रहता, सब प्राणी उसकी संतान!
भारत का संदेश विश्व को, मानव-मानव एक समान!!

रहें कहीं हम लेकिन शीतल, मंद सुगंधें खींच रहीं
यह धरती अपनी बाहों में, परम प्रेम से भींच रही!
सारे धर्मों, सभी जातियों, सब रंगों, सब नस्लों को,
ब्रह्मपुत्र, कावेरी, गंगा, कृष्णा, झेलम सींच रहीं!!

ऊँच नीच का भेद नहीं कुछ, सद्गुण का होता सम्मान!
भारत का संदेश विश्व को, मानव-मानव एक समान!!

हमने सदा न्याय के हक़ में, ही आवाज़ उठाई है,
अपनी जान हथेली पर ले, अपनी बात निभाई है!
पुरजा-पुरजा कट मरने की, सदा रखी तैयारी भी,
वंचित-पीड़ित-दीन-हीन की, अस्मत सदा बचाई है!

जन-गण के कल्याण हेतु हम, सत्पथ पर होते बलिदान!
भारत का संदेश विश्व को, मानव-मानव एक समान!!

जिसके भी मन में स्वतंत्रता, अपनी जोत जगाती है,
जो भी चिड़िया कहीं सींखचों, से सिर को टकराती है!
वहाँ-वहाँ भारत रहता है, वहाँ-वहाँ भारत माता,
जहाँ कहीं भी संगीनों पर, कोई निर्भय छाती है!

आज़ादी के परवानों का, सदा सुना हमने आह्वान!
भारत का संदेश विश्व को, मानव-मानव एक समान!!

सब स्वतंत्र हैं, सब समान हैं, सब में भाईचारा है,
सब वसुधा अपना कुटुंब है, विश्व-नीड़ यह प्यारा है!
पंछी भरें उड़ान प्रेम से, दिग-दिगंत नभ को नापें,
कहीं शिकारी बचे न कोई, यह संकल्प हमारा है!

युद्ध और हिंसा मिट जाएँ, ऐसा चले शांति अभियान!
भारत का संदेश विश्व को, मानव-मानव एक समान!!

जल में, थल में और गगन में मूर्तिमान भारतमाता,
अधिकारों में, कर्तव्यों में, संविधान भारतमाता!
हिंसासुर के उन्मूलन में, सावधान भारतमाता,
'विजयी-विश्व तिरंगा प्यारा', प्रगतिमान भारतमाता!!

मनुष्यता की जय-यात्रा में, नित्य विजय, नूतन उत्थान!
भारत का संदेश विश्व को, मानव-मानव एक समान!!

दिशा-दिशा में गूँज रहा है, भारत माता का जयगान!
भारत का संदेश विश्व को, मानव-मानव एक समान!!

ऋषभदेव शर्मा
२१ जनवरी २००८

2 août

छुआ चांदनी ने


 [डायरी , ११ नवम्बर  १९८१ / खतौली ]
 
@ १ @

छुआ चांदनी ने जभी गात क्वांरा,
 नहाने लगी रूप में यामिनी.
कहीं जो अधर पर खिली रातरानी,
 मचलने लगी अभ्र में दामिनी..
चितवनों से निहारा ,सखी,वंक जो,
उषा सांझ पलकों की अनुगामिनी.
तुम गईं द्वार से घूंघटा खींचकर,
यों तपस्वी जपे कामिनी कामिनी ..
 
 
@ २ @
 
खिला गुलमुहर जब कभी द्वार मेरे,
याद तेरी अचानक मुझे आ गई .
किसी वृक्ष पर जो दिखा नाम तेरा,
ज़िंदगी ने कहा ज़िंदगी पा गई ..
आईने ने कभी आँख मारी अगर,
आँख छवि में तुम्हारी ही भरमा गई.
चीर कर दुपहरी छांह ऐसे घिरी,
चूनरी ज्यों तुम्हारी लहर छा गई..
 
 
@ ३ @
 
नीम की ओट में जो कई खेल खेले,
चुभे पाँव में शूल बनकर बहुत दिन.
कामना के युवा पाहुने जो   कुंवारे ,
बसे प्राण में भूल बनकर बहुत दिन..
कंटकों के , तृणों के ,उगे चिह्न सारे,
खिले देह में फूल बनकर बहुत दिन.
स्वप्न वे सब सलोने कसम वायदे वे,
उडे राह में धूल बनकर बहुत दिन ..
 
 
 
>>>>  ऋषभ देव शर्मा 
28 juillet

मैत्री

मैत्री
 
यह क्या कि कलाई में पहना दी 
फ्रेंडशिप-बैंड
और समझ लिया, हो गई मैत्री पूरी?

मित्रता सबसे बड़ा धर्मं है.
छल भी उचित है
मित्रता की रक्षा के लिए.

राम ने वृक्ष की ओट से
बालि को मारा
-मित्र को बचाना था न!

कृष्ण ने कसम तोड़कर
भीष्म पर हथियार उठाया
-मित्र को बचाना था न!

मित्रता सचमुच
सबसे बड़ा धर्मं है।
http://balsabhaa.blogspot.com/2008/07/blog-post_28.html
 
- ऋषभ देव शर्मा
 
23 juillet

समय

समय


कहते हैं, कभी अर्जुन ने

कृष्ण का विराट रूप देखकर

पूछा था आश्चर्य से-

कौन हो तुम? तुम कौन हो?


कृष्ण ने मुस्करा कर कहा था-

मैं समय हूँ, पार्थ! मैं काल हूँ!


जो था, जो है, जो होगा

सब समय है, सब ईश्वर है।

वह साथ हो

तो अर्जुन जीत जाता है महाभारत।

वह साथ न हो तो

अर्जुन- वही अर्जुन-

हार जाता है साधारण भीलों से.


हे समय!

तू सचमुच बलवान है।

तुझे प्रणाम।

- ऋषभ देव शर्मा

16 juillet

देश

 

यह इतिहास मेरी पहचान है






देश
- ऋषभदेव शर्मा

 

 

 

 

जब कभी मैं आँख मींच कर

अपने आप से कहता हूँ - 'देश'
तो अंधेरे में अचानक जगमगाती है

इतिहास की विराटता,                             
कानों में गूंजने लगता है - 'वंदे मातरम
दिखाई पड़ते हैं
-महाराणा प्रताप
-शिवाजी
-झांसी की रानी
-तिलक और गांधी।



और फिर सुनाई पड़ता है
स्वतंत्र भारत का जयघोष.

यह इतिहास मेरी पहचान है!

हाँ, मेरा देश महान है!!

9 juillet

प्यार

प्यार
-ऋषभ देव शर्मा





उस दिन मैंने फूल को छुआ
सहलाया और सूँघा,
हर दिन की तरह
उसकी पंखुडियों को नहीं नोंचा.

उस दिन पहली बार मैंने सोचा
फूल को कैसा लगता होगा
जब हम नोंचते है
उसकी एक-एक पंखुड़ी.

तब मैंने फूल को
फिर छुआ
फिर सहलाया
फिर सूँघा...

और मुझे लगा

हवाएं महक उठीं
प्यार की खुशबू से.
5 juillet

धुआँ और गुलाल

धुआँ और गुलाल

~~ डॊ.ऋषभदेव शर्मा



सिर पर धरे धुएँ की गठरी
मुँह पर मले गुलाल
चले हम
धोने रंज मलाल !



होली है पर्याय खुशी का
खुलें
और
खिल जाएँ हम;
होली है पर्याय नशे का -
पिएँ
और
भर जाएँ हम;
होली है पर्याय रंग का -
रँगें
और
रंग जाएँ हम;
होली है पर्याय प्रेम का -
मिलें
और
खो जाएँ हम;
होली है पर्याय क्षमा का -
घुलें
और
धुल जाएँ गम !

मन के घाव
सभी भर जाएँ,
मिटें द्वेष जंजाल;
चले हम
धोने रंज मलाल !




होली है उल्लास
हास से भरी ठिठोली,
होली ही है रास
और है वंशी होली
होली स्वयम् मिठास
प्रेम की गाली है,
पके चने के खेत
गेहुँ की बाली है
सरसों के पीले सर में
लहरी हरियाली है,
यह रात पूर्णिमा वाली
पगली
मतवाली है।

मादकता में सब डूबें
नाचें
गलबहियाँ डालें;
तुम रहो न राजा
राजा
मैं आज नहीं कंगाल;
चले हम
धोने रंज मलाल !




गाली दे तुम हँसो
और मैं तुमको गले लगाऊँ,
अभी कृष्ण मैं बनूँ
और फिर राधा भी बन जाऊँ;
पल में शिव-शंकर बन जाएँ
पल में भूत मंडली हो।


ढोल बजें,
थिरकें नट-नागर,
जनगण करें धमाल;
चले हम
धोने रंज मलाल !

******************************
23 juin

मेरी वेणी में सवेरे सवेरे

 

 

बेटी
(ऋषभ देव शर्मा )

 





 


जब तुम पास नहीं होती

तब मैं अकेली होती हूँ।

इसे तुम जानती हो, माँ

इसीलिए तो अपने आशीष

रोज गूँथ देती हो

मेरी वेणी में सवेरे- सवेरे..
अपना सारा लाड़

आँज देती हो मेरी आंखों में

घर से निकलते समय.
तुम दुनिया भर में

सबसे अच्छी माँ हो,

-मेरी माँ .

18 juin

प्रकृति



प्रकृति
- ऋषभ देव शर्मा



प्रकृति हमारा पालन करती करती सचमुच पोषण
पर हम अंधे होकर करते उसका दोहन-शोषण
 

पेड़ कट गए, चिडियाँ गायब नहीं कबूतर मिलते
अब तो सिंथेटिक पौधों पर गुलाब नकली खिलते

 चलो प्रकृति की ओर चलें अब सब नदियों को जोडें
पेड़ लगाएं, फूल खिलायें राम सेतु ना तोडें

सुन्दरता

सुन्दरता
ऋषभ देव शर्मा

http://balsabhaa.blogspot.com/2008/06/blog-post.html


मैंने फूलों को देखा खिलते हुए,

मैंने चिडियों को देखा चहकते हुए,


मैंने लहरों को देखा मचलते हुए,

मैंने बादल को देखा बरसते हुए,



मैंने किसान को देखा पसीना बहाते हुए,

मैंने लुहार को देखा लोहे सा तपते हुए


मैंने चाँद को देखा घटते-बढ़ते हुए,

मैंने सूरज को देखा चमकते हुए,



हर बार मुझे लगा,

यह दुनिया कितनी सुंदर है।


लोग इसे कुरूप क्यों बनाते हैं?
यह तो सचमुच सुंदर है!!!

9 mai

आधी आबादी

          -ऋषभ देव शर्मा
 
वे रसोई में अडी़ हैं,
अडी़ रहें.
वे बिस्तर में पड़ी हैं,
पड़ी रहें.
यानी वे
संसद के बाहर खड़ी हैं,
             खड़ी रहें?
 
 
' गलतफहमी है आपको .
सिर्फ़ आधी आबादी नहीं हैं वे.
बाकी आधी दुनिया भी
छिपी है उनके गर्भ में,
वे घुस पड़ीं अगर संसद के भीतर
तो बदल जाएगा
तमाम अंकगणित आपका. '
           उन्हें रोकना बेहद ज़रूरी है,
           कुछ ऐसा करो कि वे जिस तरह
      संसद के बाहर खड़ी हैं,
                          खड़ी रहें!
 
 
उन्हें बाहर खड़े रहना ही होगा
कम से कम तब तक
जब तक
हम ईजाद न कर लें
राजनीति में उनके इस्तेमाल का
कोई नया
सर्वग्राही
सर्वग्रासी
         फार्मूला.
 
 
शी.........................  
कोई सुन न ले...............
चुप्प ...............!
 
 
चुप रहो,
हमारे थिंक टैंक विचारमग्न हैं;
                     सोचने दो.
चुप रहो,
हमारे सुपर कंप्यूटर
जोड़-तोड़ में लगे हैं;
         दौड़ने दो.
चुप रहो,
हमारे विष्णु, हमारे इन्द्र-
वृंदा और अहिल्या के
किलों की दीवारों में
सेंध लगा रहे हैं;
              फोड़ने दो.
तब तक
कुछ ऐसा करो कि वे जिस तरह
संसद के बाहर खड़ी हैं,
                     खड़ी रहें!
 
 
कुछ ऐसा करो
कि वे चीखे, चिल्लाएं,
आपस में भिड़ जाएं
और फिर
सुलह के लिए
        हमारे पास आएं.
 
 
हमने किसानों का एका तोड़ा,
हमने मजदूरों को एक नहीं होने दिया,
हमने बुद्धिजीवियों का विवेक तोड़ा,
हमने पूंजीपतियों के स्वार्थ को भिड़ा दिया
और तो और.............हमने तो
पूरे देश को
           अपने-आप से लड़ा दिया.
 
 
अगडे़-पिछड़े के नाम पर
ऊँच-नीच के नाम पर
ब्राह्मण-भंगी के नाम पर
हिंदू-मुस्लिम के नाम पर
काले-गोरे के नाम पर
दाएँ-बाएँ के नाम पर
हिन्दी-तमिल के नाम पर
सधवा-विधवा के नाम पर
अपूती-निपूती के नाम पर
कुंआरी और ब्याहता के नाम पर
                             के नाम पर.....
                             के नाम पर....
                             के नाम पर.....
अलग अलग झंडियाँ
अलग अलग पोशाकें
बनवाकर बाँट दी जाएं
आरक्षण के ब्राह्म मुहर्त में
इकट्ठा  हुईं इन औरतों के बीच!
 
 
फिर देखना :
वे भीतर आकर भी
संसद के बाहर ही खड़ी रहेंगी;
पहले की तरह
रसोई और बिस्तर में
अडी़ रहेंगी,
        पड़ी रहेंगी!
~*~
 
 
                     
(स्रोत : ताकि सनद रहे_२००२_तेवरी प्रकाशन)
2 mars

अवाक्

 
अवाक्
 
 
आओ तनिक यहाँ बैठो तुम
तुमसे कुछ बातें करनी हैं .
शोर सुना तुमने लोगों का
मेरा मौन ज़रा सुन देखो
.
पहली बार देखकर कोई
ताजमहल जैसे भौंचक हो
जलेपंख वाला संपाति
बादल-बादल तैर रहा हो,
वैसे ही मैं
हर्ष और विस्मय का सागर
डूब -डूब कर तिरने लगता-
शब्दों की रेखाओं से तुम
जब भी कोई चित्र बनाते
नया-नया सा,
ताजा,टटका !

मैं अवाक् हो
सिर्फ़ ताकता रह जाता हूँ
कभी तुम्हें तो कभी चित्र को.
कभी चित्र में तुम दिखते हो,
कभी चित्र तुममें दिखता है.

आज अभी तो ऐसा दीखा,
जबरन ओढी केंचुल कोई
तुमने स्वयं नोंच डाली है,
सारी कोमलता को अपनी
खुली हवा में खोल दिया है ,
भला हवाओं से क्या डरना
झंझाओं से शक्ति मिलेगी -
दीपक का विश्वास नया यह
शब्द-शब्द में दीपित दीखा .
बहुत दिनों के बाद
किसी
काल कोठरी के कैदी को
जैसे दीखे धूप गुनगुनी
और नयन मीलित हों ख़ुद ही,
तुम क्या जानो
कुछ -कुछ वैसा मुझ पर बीता
जब देखा वह
शब्द- चित्र अपना मन- चीता.

आओ तनिक पास तो बैठो
तुमसे कुछ बातें करनी हैं .
बातें सदा अधूरी हैं जो ,
बातें सदा अनसुनी हैं जो,
बातें जो मैंने कह तो दीं- .

पर सुनने वाला कोई है ?

तुम तो पीठ फेर बैठे हो -
सदा-सदा की तरह
आज भी !!

__ ऋषभ देव शर्मा 
२८.१०.२००७.
 

 

श्राद्ध

 
श्राद्ध

हे पितः !

आपके चरणों में नत है
आपका यह आत्मज _
सदा का अकर्मण्य
बामन का बैल .

किस अधिकार से करूं
मैं तर्पण-अर्पण ?
कहाँ चुका सका आपका ऋण ?
कभी चुका भी न सकूंगा .


सभी कुछ तो कर दिया नष्ट मैंने ,
जो आपने सौंपा था.
कहाँ सँभाल सका
आपके तेज को ,तप को,
आपका यह क्षुद्र छोटा बेटा ?

आप थे त्याग और दान की प्रतिमूर्ति,
और मैं बन बैठा भिखारी !
कामनाओं की वैतरणी में बिलबिलाता
नारकीय कीट बन गया मैं तो ;
आपके स्वर्ग से विमुख हो गया न !

खो दिया मैंने सम्मान
जो अर्जित किया था आपने .
लांछित किया आपके यश को
और व्यर्थ, विद्या को.


मेरे पिता!
मेरे गुरू भी थे आप
और ईश्वर भी .
आपकी अवज्ञा की मैंने:
आप मन के शासक थे ,
मैं देह का दास बन गया !

अब तो
इतना भी साहस नहीं बचा -
छू सकूं आपके पावन चरण ,
मांग सकूं क्षमा .

~*~

पर आप तो पिता हैं -
गुरू हैं -
मेरे भगवान् हैं -
आशीष रची अपनी हथेलियों से
छू सकते हैं मेरा माथा,
जला सकते हैं मेरा कलुष .

~*~

हाँ , मेरे कानों में गूँज रहा है
आपका स्वस्ति-वाचन .
बजने लगे हैं मेरे रोमांच में
वे सारे स्तोत्र
जो गद्गद कर देते थे आपको-
आपके कंठ को.

अपनी सुनहरी भुजाओं में
भर लिया है आपने मुझे !


मेरे ये आंसू स्वीकार करो; पितः !!

०००० ऋषभ देव शर्मा ...........

 

 

)

27 janvier

आतंक : दस कविताए¡

 
आतंक : दस कविताए¡

युद्धजीवी प्रभु के नाम

ओ नृषंस प्रभु!

क्यों किया तूने ऐसा

कि अपनी ही संतान को

बलिपषु बना डाला

अपनी अधिकार-लिप्सा के हेतु ?

क्यों अपना शासन बनाए रखने को

क्षमा कर दिया तूने

सहोदर के हत्यारे काइन को ?

क्यों दिया तूने

पाप को संरक्षण

अपनी महत्ता को स्थिर रखने हेतु ?

क्यों की तूने गंधक

और आग की वषाZ

हरे भरे सदोम और अमोरा नगरों पर

अपना अस्तित्व मनवाने को ?

क्यों लड़ा दिया तूने

आदमी की एक नस्ल को

आदमी की दूसरी नस्ल से

इस तरह कि

एक नस्ल मनाती रही

फसह का पर्व - निरपेक्ष रहकर

और दूसरी नस्ल के

सब जेठे बेटे और जानवर भी मार डाले तूने

व्यक्तिगत प्रतिषोध में ?

क्यों विवष किया मूसा को तूने

कि वह समुद्र जल में डुबो दे

उस देष को

जो तेरे समक्ष नहीं झुका

और जिसने नहीं किया तेरा स्तुति गान ?

मनुष्यता के विरुद्ध

इतने अपराधों के स्रष्टा ओ नृषंस!

बड़ा नकली लगता है जब पर्वत षिखर पर से

तू देता है पे्रम का संदेष

अपने किसी पुत्र के मु¡ह से।।ž


प्रतिषोध

खिलौनों में बम हैं

ट्रांजिस्टर, कार और साइकिल

सभी में बम हैं

अंधा प्रतिषोध

लेता है मनुष्य

मनुष्य ही से

और बो देता है बीज

कुछ और नए

मनुष्य बमों के।।ž


अवषेष

रिष्ते सब टूट गए

खून के,

दूध के

और परस्पर झूठे पानी के।


ठेके ही बाकी हैं

कुर्सी के,

धर्म के,

माफिया गिरोहों के।।ž

सपना


मेरे पिता ने

देखा था

एक सपना

कि हवाए¡ आज़ाद होंगी ....

और वे हो गई (


फिर मैंने

देखा एक सपना

कि

महक बसेगी

मेरी सा¡सों में ....

और मेरे नथुने

भिड़ गए आपस में

मुझे ही कुरुक्षेत्र बनाकर


अब मेरा बेटा

देख रहा है एक सपना

कि हज़ार गुलाब फिर चटखेंगे

पर उसे क्या मालूम कि

अब की बार

गुलाबों में

महक नहीं होगी ! ž

छिपकली


चिपक गई है

मेरे दिमाग में

एक प्रागैतिहासिक छिपकली


निरंतर फड़फड़ा रही है

अपने लंबे मैले पंख


और प्रदूषित होती जा रही है

पीयूष रस से भरी मेरी डल झील

गोता खोर तलाषेंगे

कुछ दिन बाद

इसके तल में

आक्सीजनवाही मछलियों के

जीवाष्म ! ž


स्नो फॉल


लटकती रहती हैं

फि़रन की खाली बा¡हें

हाथ सटाए रखते हैं

का¡गड़ी को पेट से

राख में दबे अंगारे

झुलसा देते हैं

नर्म गुलाबी जि़ल्द को

सख्त काली होने तक


और फुहिया बर्फ

कुछ और सफेद हो जाती है

स्याह और सुर्ख पर गिरकर ! ž

अनुपस्थित


शहतूत की पत्ती पर

रेषम के कीड़े हैं

भारत के स्विट्ज़रलैंड में

बकरी हैं, भेड़ें हैं

गूजर हैं, बकरवाल हैं

पंडित हैं, शेख हैं

सेव और बादाम हैं

पष्मीना है और केसर भी

चष्मों का जल आज भी

पहले सा ठंडा और मीठा है


पर एक चीज है

जो सिरे से गायब है -

एक उन्मुक्त संगीत

जो दम तोड़ रहा है

`पाकिस्तान जि़ंदाबाद` के

बोझ तले ! ž


बदबू


केसर की क्यारी में

कितने बरस से

लगातार बढ़ती ही जाती है

लाषों की बदबू

घटती नहीं


बर्फ का षिवलिंग

हर बरस आप से आप बढ़ता है

और घट भी जाता है

आप से आप।ž


धर्मयुद्ध जारी है


शहर पगला गया है

खुद को काट रहा है खुद ही,

जिस बस में बैठा है उसी को फू¡क रहा है,

अपनी पिस्तौल

अपनी ही छाती पर तान रहा है,

पैट्रोल और माचिस लेकर

दौड़ रहा है एक बच्चे के पीछे,


बच्चे को शरण नहीं मिलती

मंदिर-मिस्जद-गुरुद्वारे में,

न पुलिस मुख्यालय में,

न संसद-सचिवालय में,


विवष बच्चा एक बार फिर सड़क पर है,


दिषाहीन दौड़ता है लाचार

पीछे-पीछे आता है शहर पैट्रोल और माचिस लिए,

आगे खड़ा है कफ्र्यू हाथों में स्टेनगन थामे

फ्लैगमार्च करता हुआ,


चूहा-बिल्ली का खेल जारी है

कुंभ नहान चल रहा है

प्रकाष पर्व का जुलूस बढ़ा चला आ रहा है

अजान ग¡ूज रही है

गिरजे की घंटिया¡

उत्पन्न कर रही हैं फायर ब्रिरोड का भ्रम,


बच्चा बीच राह में मूछिZत पड़ा है

त्रिषूल और तलवार लेकर

उसकी छाती के पवित्र कुरुक्षेत्र में

शहर धर्मयुद्ध कर रहा है

अपने आप से कि

बच्चे को बचाना है विधर्मियों के स्पषZ से,


बच्चा दम तोड़ रहा है और

धर्मयुद्ध जारी है

पाखंड के समूचे तामझाम के साथ।।ž


ओ मेरे महाप्रभुओ


ओ मेरे महाप्रभुओ!

बहुत हो चुकी लीला,

अब तो अपना जाल समेटो।

बीच आ¡गन में

कांटेदार तारों की बाड़ लगवा दी तुमने,

मेरे जौ-मटर के खेत रौंदकर

बंदूकों के पेड़ उगवा दिए तुमने,

मेरे पिता के अस्थिकलष को

गीदड़ों के हवाले कर दिया,

मेरी मा¡ के शव को

भेडियों से नुचवा दिया,

फा¡सी पर लटका चुके हो

चुन-चुन कर मेरे एक-एक साथी को, मेरी पत्नी समेत,

गुडि़या में बारूद भरकर

परखचे उड़ा दिए तुमने मेरी बेटी के(

और

वह बालक जिसका खून

अभी तक चीख रहा है तुम्हारे

पैरों के समीप वाली बलिवेदी पर,

वह मेरा इकलौता बेटा था,


अब कोई नहीं बचा

सिवा मेरे!

और मैं बलि देने नहीं

बलि लेने आया हू¡।


लो, तोड़ दिए मैंने

सब वर्ग तुम्हारे बनाए हुए,

लो, तिलांजलि देता हू¡,

संप्रदायों को तुम्हारे रचे हुए,

यह लो, उतारता हू¡ यज्ञोपवीत,

यह कड़ा और कंघी भी फेंकता हू¡,

छोड़ता हू¡ पा¡चों वक़्त की नमाज़,

क्रॉस को झोंकता हू¡ चूल्हे में,

मिटा रहा हू¡ ब्राह्मण भंगी का भेद

खंडित करता हू¡ रोटी बेटी के प्रतिबंध

और

लो, उतरता हू¡ अखाड़े में

निहत्था

तुम्हारे साथ जूझने को

निर्णायक द्वंद्वयुद्ध में।


सुनो महाप्रभुओ !

मुझे नहीं अब तुम्हारी ज़रूरत

मैं हू¡ स्वयं संप्रभु

और खड़ा हू¡

तुम्हारी समस्त आज्ञाओं के विरुद्ध

यह घोषणापत्र लेकर कि


सभी महाप्रभु खाली कर दें मेरी धरती

मुझे उगाना है एक जातिहीन मनुष्य

धमोंZ से परे ! ž

- ऋषभदेव शर्मा

निवेदन

निवेदन

http://www.sahityakunj.net/ThisIssue/Ankkavita/Ankkavitani_main19.htm

जीवन
बहुत-बहुत छोटा है,
लम्बी है तकरार!
और न खींचो रार!!

यूँ भी हम तुम
मिले देर से
जन्मों के फेरे में,
मिलकर भी अनछुए रह गए
देहों के घेरे में.

जग के घेरे ही क्या कम थे
अपने भी घेरे
रच डाले,
लोकलाज के पट क्या कम थे
डाल दिए
शंका के ताले?

कभी
काँपती पंखुडियों पर
तृण ने जो चुम्बन आँके,
सौ-सौ प्रलयों
झंझाओं में
जीवित है झंकार!
वह अनहद उपहार!!

केवल कुछ पल
मिले हमें यों
एक धार बहने के,
काल कोठरी
मरण प्रतीक्षा
साथ-साथ रहने के.

सूली ऊपर सेज सजाई
दीवानी मीराँ ने,
शीश काट धर दिया
पिया की
चौखट पर
कबिरा ने.

मिलन महोत्सव
दिव्य आरती
रोम-रोम ने गाई,
गगन-थाल में सूरज चन्दा
चौमुख दियना बार!
गूंजे मंगलचार!!

भोर हुए
हम शंख बन गए,
सांझ घिरे मुरली,
लहरों-लहरों बिखर बिखर कर
रेत-रेत हो सुध ली.

स्वाति-बूँद तुम बने
कभी, मैं
चातक-तृषा अधूरी,
सोनचम्पई गंध
बने तुम,
मैं हिरना कस्तूरी .

आज
प्राण जाने-जाने को,
अब तो मान तजो,
मानो,
नयन कोर से झरते टप-टप
तपते हरसिंगार!
मुखर मौन मनुहार!!


-ऋषभ देव शर्मा


स्रोत: ताकि सनद रहे(कविता संग्रह) -२००२

शुभ छब्बीस जनवरी

छब्बीस जनवरी
 
 
 
लोकतंत्र का पर्व शुभंकर
मंगलमय हो !
 
 
तानाशाही मिटे ,
उपनिवेशी सोच हटे ,
सम्प्रदाय औ'  जातिवाद की
 धुंध कटे , अंधियार छंटे !
 
 
गति को वरें -
प्रगति को चुन लें -
दलबंदी के दलदल में जो
संविधान के पाँव फँसे हैं !

धनबल,भुजबल की कीचड में
जन गण जो  आकंठ धँसे हैं , 
प्राणों की पुकार को
 सुन लें !
 
 
अब तक का इतिहास यही है :
प्रभुता पाकर
सब
जनता के खसम बन गए !
 
 
ऐसा ही होता आया है !
ऐसा ही होने वाला है !!
 
 
कब तक
लोक शक्ति मुहताज रहेगी
त्रिशंकुओं के तंत्र मंत्र की ?
 
 
लोकतंत्र में जो निर्णय हो
नीर - क्षीर सबके समक्ष हो !
कुर्सीवालों के समक्ष अब
एक समांतर लोकपक्ष हो !!
 
 
जो हो ,
जनता की इच्छा से तय हो !
 
 
लोकतंत्र का पर्व शुभंकर
मंगलमय हो !! o