rishabha's profileऋषभ की कविताएँPhotosBlogListsMore ![]() | Help |
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September 14 ज्वालामय विस्फोट ज्वालामय विस्फोट
पग पग घर घर हर शहर , ज्वालामय विस्फोट
कुर्सी की शतरंज में , हत्यारी हर गोट आग लगी इस झील में , लहरें करतीं चोट
ध्वस्त न हो जाएँ कहीं , सारे हाउस बोट कुरता कल्लू का फटा , चिरा पुराना कोट
पहलवान बाज़ार में , घुमा रहा लंगोट सीने को वे सी रहे , तलवारों से होंठ
गला किंतु गणतंत्र का , नहीं सकेंगे घोट जिनका पेशा खून है , जिनका ईश्वर नोट
उन सबको नंगा करो , जिनके मन में खोट o ऋषभ देव शर्मा September 10 ऋषभदेव शर्मा का कवि-कर्म : धूप ने कविता लिखी है गुनगुनाने के लिए(2)
ऋषभदेव शर्मा का कवि-कर्म : धूप ने कविता लिखी है गुनगुनाने के लिए(2)अब बात करें कविता संग्रह ’ताकि सनद रहे’ (ऋषभ : २००२) की।
आधुनिकताबोध की सरमायेदार बनी ज़्यादातर हिंदी कविताओं में आज लोक और संस्कृति से जुड़ाव कम हो गया है। कड़वाहट और आक्रोश ने कविता के ऊपरी स्वर को तो तीखा बनाया है, लेकिन कविता बनने का सुख इनसे छिन गया है। यही वजह कविता के जनमानस से दूर होते जाने की भी है। जब हम कवि-रूप में अपने को आम आदमी से ऊपर उठा हुआ मानकर गर्वीले दर्प के साथ और भाषा के ऐसे छलावे भरे रूप में बात करेंगे जिससे जमीनी रिश्ता ही नहीं हो, तो ऐसी कोई भी कृति आस्वाद और टीस दोनों पैदा नहीं कर सकती। इस लिहाज से ’ताकि सनद रहे’ की कविताओं में संभावना दिखाई देती है। एक तो कवि ने आज के माहौल की सारी विसंगतियों को परखा है और इसके संदर्भों को भारतीय पुराणैतिहासिक कथाओं से संबद्ध करने का अच्छा प्रयास किया है। ऐसा करने से काव्यार्थ की दिशाएँ भी फैली हैं और पाठक के लिए उनकी पकड़ भी आसान हुई है। दूसरी बात यह कि इन कविताओं े विषय सीधे हमारे आसपास की घटनाओं से लिए गए हैं या हमारी बहुत जानी-बूझी समस्याओं से उठाए गए हैं। इनकी ज्वलंतता में कोई संदेह नहीं है, लेकिन इन्हें अनदेखा करने, इनके प्रति उदासीन रहने की प्रवृत्ति पर चोट करने के कारण भी इन कविताओं का महत्व बढ़ जाता है। तीसरी बात यह कि किसी भी रचना के लिए पठनीयता का होना, और सिर्फ़ पठनीयता का ही नहीं, संप्रेषण और प्रवाह की निरंतरता का होना बहुत ज़रूरी है जिसके लिए भाषा के सधाव और शैलीय वृत्तियों के कलात्मक उपयोग से कवि को दो चार होना पड़ता है। इन कविताओं में हिन्दी भाषा की व्यापक अभिव्यक्ति क्षमता को कुशलता के साथ इस्तेमाल करने का भाव दिखाई देता है जो और भी मँजकर अधिक अच्छे परिणाम दे सकता है। ऋषभ देव शर्मा की ये कविताएँ छंदमुक्त होते हुए भी लय की निरंतरता से बँधी हुई हैं। गति के साथ भावों-प्रतिभावों का उन्नयन प्रभावशाली बन पड़ा है। कविता और गद्यभाषा के बीच का संतुलन भी अपेक्षित अनुभूतियों को संप्रेषित करनें में कई जगहों पर सहायक बना है। इन कविताओं की भावनापरक ऊर्जा कथनों में लिपटकर भी प्रकट हुई है और शाब्दिक छवियों के संश्लिष्ट रचाव से भी। जहाँ एक भाव टूटकर स्थिर होना चाहता है, वहाँ ये दोनों ही प्रक्रियाएँ रंजक तत्व का काम करती हैं। कथनों में मुहावरों का आलोक भी छिपकर झाँकता है जिनमें हिंदी-उर्दू दोनों की साझा विरासत को सम्हाले रखा गया है। कफ़न धारण किए हैं, मूल्य जिनकी उँगलियों पर नाचते हैं, साजिशों में कैद है, कील हम जड़ने चले हैं, बो रहा है आग वह, चीख के होठों पड़ा ताला, सत्य ने खतरा उठाया, मौत से पंजा भिड़ादें, कयामत टूट पड़े तुम्हारे ऊपर, डुबकी लगा गए तुम तो, चोर नज़रों से तुम्हारी ओर देखा – जैसे कथन काव्यसंदर्भ या पूरी कविता की बुनावट में अर्थ भर देते हैं। इसी तरह इन कविताओं में कई ऐसी शाब्दिक छवियाँ भी उभरी हैं जहाँ दो नितांत भिन्न जातियों के शब्दों का संयोजन विस्तृत भावभूमि को प्रकाशित कर देता है। ऐसे प्रयोग अर्थ की छवियों को भी नया आयाम दे देते हैं। भावबद्धता का यह क्रम काव्यशिल्प को भी प्रखर बनाता है जिसे कवि का भाषाकौशल मानना चाहिए। लाल जबड़े कड़कड़ाती, कुर्सी के कंठ हकलाए हुए हैं, लोभ के पंजे पसारे, चले हम धोने रंज मलाल, कुर्सियों के कान में कलरव पड़ा, मैंने किताबें पहन रखीं थीं, झूठ की चादर लपेटे जल रही होली, वह कामधेनु भी हुई परती-से जो शब्दछवियाँ बनती हैं, वे चित्रात्मक होने के साथ ही भाव के उद्रेक को भी द्विगुणित कर देती हैं। अच्छी बात यह है कि इस तरह के काव्यभाषिक ढलाव में कवि ने भाषा के लोकपक्ष की भी सुध ली है। ऐसा करने से भाव प्रखर हुए हैं और वह कहा जा सका है जो आभिजात्य भाषा उतनी प्रभावी बनकर न कह पाती। क्यों बवाल उठाते हो, जनगण करें धमाल, भींज कर पाँखें, जब शून्य ताके, दूधों नहाई, पौध धान की, नाव काठ की, देह का बाना, जलाकर धर दिया, अपना नाम गोदने के लिए, बैर मत रोपो, बौरा उठे आम्रवन – यह बताते हैं कि लोक भाषा का सही जगह पर एक कोने में किया गया प्रयोग भी पूरे संदर्भ को प्रकाशित कर देता है। कविताओं के भाव सामयिक हैं और हार्दिक उद्वेग के साथ प्रकट हुए हैं। इसीलिए भावोद्वेलन में सिमटे लघु भाव पुनरावृत्ति से प्रकट करने की जैसी दक्षता कवि ने दिखलाई है, वह इस बात का भी संकेत है कि एक बड़े भाव को किस तरह अभिव्यक्ति के टुकड़ों में बाँटकर फिर से उन्हें संश्लिष्ट करके ’महाभाव’ में परिणत किया जाता है। इस प्रकार की कुछ पंक्तियाँ उद्धृत करना चाहूँगा :
यह बिंदु है बदलाव का यह बिंदु है भटकाव का यह बिंदु है बहकाव का ***** और हमारा धर्म? हमारा धर्म क्या है?? क्या ह हमारा धर्म???? *** छ्त गिरा दो छीन लो छतरी, मटियामेट कर दो झोंपड़ी भी, छप्परों को उड़ा ले जाओ भले। *** पहली बार छुआ- महकती हुई धरती ने, गमकती हुई हवा ने, लहराते हुए पानी ने, सहलाती हुई आग ने और गाते हुए आकाश ने।
इन कविताओं में व्यंग्य, प्रहार, आक्रोश, तल्खी, क्रोध, जुगुप्सा के भाव अंतर्निहित हैं, लेकिन एक अंतर्धारा की तरह। सामाजिक सच्चाइयाँ हैं जिनमें परिस्थितियों ने विसंगतियाँ भरी हैं, लेकिन इनके ऊपर भी ऐसा बहुत कुछ है जिससे बँधकर कलुष को पार किया जा सकता है। ऐसे ही बदलाव की तलाश है ये कविताएँ, जो नारों में समाधान नहीं ढूँढतीं। ये मुड़ती हैं जड़ों की ओर। ये परखती हैं अपने आदर्शों और मूल्यों को; और चेताती हैं भटकाव के उन रास्तों के प्रति जिनका अस्तित्व ही खोखला है। इस पृष्ठभूमि में ’ताकि सनद रहे’ की कुछ पंक्तियाँ देकर अपनी बात कहूँगा :
आदमी तो भूमि का बेटा, भूमि पर वह लोटता, धूलि में सनता, निखरता धूप में है। देह से झरता पसीना, गंध बहती रोम कूपों से उमड़कर।
ये पंक्तियाँ मनुष्य के श्रम और उस श्रम से निर्मित पहचान को उकेरती हैं जहाँ श्रम का संतोष ही आदमी को माथा उठाकर जीने की टेक देता है। व्यंग्य की दो पंक्तियाँ यह जताती हैं कि राजा निर्दोष और प्रजा को दोषी माननेवाली रीति का भीतरी सच क्या है, इस सच की परख कवि ने प्रह्लाद के जरिये की है :
मुकुट तो गलती नहीं करता केवल प्रजा दोषी रही है।
जो श्रम के भागी नहीं हैं और जो समस्त दोषों से भी मुक्त हैं, उन्हें भी कवि ने चेतावनी दी है कि वे ज़मीन पर उतरें, सबके साथ चलें :
जो चढ़े सिंहासनों पर भूमि पर उतरें अभी, हल धरें कांधे, जो धरा जोते ’जनक’ वह, वही शासक धरा का वह धराधिप हो!
कहीं कहीं कविताओं में सामयिक संदर्भ भी प्रमुख बने हैं लेकिन यहाँ भी स्पष्टता और परंपरा से जुड़ाव ने नई काव्यभंगिमा प्रस्तुत कर दी है। ’आपरेशन विजय’ के दो संदर्भ हैं :
युद्ध है अभिशाप लेकिन भूमिजा की लाज का जब हो रहा अब अतिक्रमण है; - युद्ध तो अनिवार्य है। *** साधुवेशी रावणों ने हरण सीता का किया है, जाल फैलाया हिरण का, वध जटयू का किया है। ये कविताएँ सपनों और आदर्शों का भी अलग धरातल ढूँढती हैं जहाँ एक ओर सामाजिक बोध की स्वीकृति है :
तुम समझने लगे थे अब माँ और गुड़िया के फ़र्क को। चाभी के खिलौने और बाप का अंतर....... तो दूसरी ओर भविष्य को कुछ दे जाने का संकल्प: आज यह संकल्प लेकर रोपता हूँ बीज तुममें, कल्पतरु अब तुम उगाओ। कहीं यहाँ ’नीम’ के बहाने पिता की याद है और कहीं ’रंग’ के साथ सकल सृष्टि के सपनों की बात है। यह देखकर अच्छा लगता है कि ये कविताएँ बिना किसी लागलपेट के खुद बोलती हैं और बहुत साफ बोलती हैं। यह सफाई कुछ कविताओं की संबोध्यता से भी आँकी जा सकती है। कभी पंक्तियाँ सीधे पाठक को संबोधित हैं : हाथ में रथचक्र लेकर व्यूह से लड़ने चले हो! *** तुम न दुहराना कहीं गाथा वही, हो न जाए फिर कहीं अहसास की हत्या! इंद्र पर भी पाप यह भारी पड़ा। *** सावधान! होशियार! कोई अपने घर से बाहर न निकले, कोई खिड़कियों से झाँकने की ज़ुर्रत न करे! *** गलतफहमी है आपको। सिर्फ़ आधी आबादी नहीं हैं वे। बाकी आधी दुनिया भी छिपी है उनके गर्भ में। वे घुस पड़ीं अगर संसद के भीतर तो बदल जाएगा तमाम अंकगणित आपका। *** कुछ ऐसा करो कि वे चीखें, चिल्लाएँ, आपस में भिड़ जाएँ और फिर सुलह के लिए हमारे पास आएँ। कहीं कविता में अवस्थित पात्र को : ओ छली दुष्यंत तुमको तापसी का शाप। *** घेरकर अभिमन्यु को तुम मार सकते हो, किंतु अर्जुन के ’विजय अभियान’ का बस एक प्रण है- अब विजय है – या मरण है; - युद्ध अब अनिवार्य है! *** जूझ रहा था जिस समय पूरा देश समूचे पौरुष के साथ हर रात हर दिन नए नए मोर्चों पर; बताओ तो सही तब तुम कहाँ थे, दोस्त? कहाँ थे? *** पिता, जबसे तुम गए हो बहुत याद आता है गाँव वाले अपने घर का वह नीम जो तुम्हारी उमर का था। ’ताकि सनद रहे’ कविता में पूरे मनुष्य को देखने वाला संग्रह है। पूर्ण पुरुष की संभावना कहाँ होती है, लेकिन कमियों से लड़-जूझ कर ही नई दिशाएँ खुलती हैं – ऋषभ की इन सभी कविताओं में मानवीयता का यह पक्ष सर्वोपरि है; और जो साहित्य मानव और मानवता की धुरी से ही छिटका हुआ हो उसे कविता मानने का मैं तो कोई कारण नहीं देखता। कवि में एक पाठक की तरह मुझे कई स्तरों पर भावप्रवणता दिखाई दी है। मैं आशा करता हूँ कि भविष्य में यह कवि अपने इस भावबोध को सच्चे भारतीय बोध की नसैनी पर चढ़ाने का प्रयत्न करेगा; और यह भी कि इस पठनीय और रस बोध से युक्त काव्य का हिंदी का साहित्यप्रेमी समाज स्वागत करेगा।
September 09 ऋषभदेव शर्मा का कवि-कर्म :धूप ने कविता लिखी है गुनगुनाने के लिए (1)
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