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    July 28

    मैत्री

    मैत्री
     
    यह क्या कि कलाई में पहना दी 
    फ्रेंडशिप-बैंड
    और समझ लिया, हो गई मैत्री पूरी?

    मित्रता सबसे बड़ा धर्मं है.
    छल भी उचित है
    मित्रता की रक्षा के लिए.

    राम ने वृक्ष की ओट से
    बालि को मारा
    -मित्र को बचाना था न!

    कृष्ण ने कसम तोड़कर
    भीष्म पर हथियार उठाया
    -मित्र को बचाना था न!

    मित्रता सचमुच
    सबसे बड़ा धर्मं है।
    http://balsabhaa.blogspot.com/2008/07/blog-post_28.html
     
    - ऋषभ देव शर्मा
     
    July 23

    समय

    समय


    कहते हैं, कभी अर्जुन ने

    कृष्ण का विराट रूप देखकर

    पूछा था आश्चर्य से-

    कौन हो तुम? तुम कौन हो?


    कृष्ण ने मुस्करा कर कहा था-

    मैं समय हूँ, पार्थ! मैं काल हूँ!


    जो था, जो है, जो होगा

    सब समय है, सब ईश्वर है।

    वह साथ हो

    तो अर्जुन जीत जाता है महाभारत।

    वह साथ न हो तो

    अर्जुन- वही अर्जुन-

    हार जाता है साधारण भीलों से.


    हे समय!

    तू सचमुच बलवान है।

    तुझे प्रणाम।

    - ऋषभ देव शर्मा

    July 16

    देश

     

    यह इतिहास मेरी पहचान है






    देश
    - ऋषभदेव शर्मा

     

     

     

     

    जब कभी मैं आँख मींच कर

    अपने आप से कहता हूँ - 'देश'
    तो अंधेरे में अचानक जगमगाती है

    इतिहास की विराटता,                             
    कानों में गूंजने लगता है - 'वंदे मातरम
    दिखाई पड़ते हैं
    -महाराणा प्रताप
    -शिवाजी
    -झांसी की रानी
    -तिलक और गांधी।



    और फिर सुनाई पड़ता है
    स्वतंत्र भारत का जयघोष.

    यह इतिहास मेरी पहचान है!

    हाँ, मेरा देश महान है!!

    July 09

    प्यार

    प्यार
    -ऋषभ देव शर्मा





    उस दिन मैंने फूल को छुआ
    सहलाया और सूँघा,
    हर दिन की तरह
    उसकी पंखुडियों को नहीं नोंचा.

    उस दिन पहली बार मैंने सोचा
    फूल को कैसा लगता होगा
    जब हम नोंचते है
    उसकी एक-एक पंखुड़ी.

    तब मैंने फूल को
    फिर छुआ
    फिर सहलाया
    फिर सूँघा...

    और मुझे लगा

    हवाएं महक उठीं
    प्यार की खुशबू से.
    July 05

    धुआँ और गुलाल

    धुआँ और गुलाल

    ~~ डॊ.ऋषभदेव शर्मा



    सिर पर धरे धुएँ की गठरी
    मुँह पर मले गुलाल
    चले हम
    धोने रंज मलाल !



    होली है पर्याय खुशी का
    खुलें
    और
    खिल जाएँ हम;
    होली है पर्याय नशे का -
    पिएँ
    और
    भर जाएँ हम;
    होली है पर्याय रंग का -
    रँगें
    और
    रंग जाएँ हम;
    होली है पर्याय प्रेम का -
    मिलें
    और
    खो जाएँ हम;
    होली है पर्याय क्षमा का -
    घुलें
    और
    धुल जाएँ गम !

    मन के घाव
    सभी भर जाएँ,
    मिटें द्वेष जंजाल;
    चले हम
    धोने रंज मलाल !




    होली है उल्लास
    हास से भरी ठिठोली,
    होली ही है रास
    और है वंशी होली
    होली स्वयम् मिठास
    प्रेम की गाली है,
    पके चने के खेत
    गेहुँ की बाली है
    सरसों के पीले सर में
    लहरी हरियाली है,
    यह रात पूर्णिमा वाली
    पगली
    मतवाली है।

    मादकता में सब डूबें
    नाचें
    गलबहियाँ डालें;
    तुम रहो न राजा
    राजा
    मैं आज नहीं कंगाल;
    चले हम
    धोने रंज मलाल !




    गाली दे तुम हँसो
    और मैं तुमको गले लगाऊँ,
    अभी कृष्ण मैं बनूँ
    और फिर राधा भी बन जाऊँ;
    पल में शिव-शंकर बन जाएँ
    पल में भूत मंडली हो।


    ढोल बजें,
    थिरकें नट-नागर,
    जनगण करें धमाल;
    चले हम
    धोने रंज मलाल !

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