rishabha's profileऋषभ की कविताएँPhotosBlogListsMore ![]() | Help |
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June 16 गाड़िया लुहारिन का प्रेम गीतपिता ने संडासी जैसे दृढ़ हाथों से माँ धौंक रही भट्टी तप रही. मैं और तुम पिता ने भरी हुंकारी. तुम्हारी आँखें मेरी आँखों में, एक गोले में घिरे हम. घन बिजली की तरह चले. ढल गया लोहा. चिहुँक उठा सारा कबीला. पंचों ने हमारी शादी तय कर दी है! लोहा एक बार फिर सच में तू मेरी जोट का है ! http://streevimarsh.blogspot.com/2009/06/blog-post_14.htmlJune 03 इतिहास हंता मैं![]() इतिहास हंता मैं तुम्हें पाने को , मैंने धरम की दीवार गिराई थी तुम्हें पाने को, अपने पिता से आँख मिलाई थी - भाई से ज़बान लड़ाई थी - तुम्हें पाने को! माँ अपनी कोख नाखूनों से नोंचती रह गई , पिता ने जीते जी मेरा श्राद्ध कर दिया; मैंने मुड़ कर नहीं देखा. मैं अपना इतिहास जलाकर आई थी - तुम्हें पाने को! तुमने मुझे नया नाम दिया - मैंने स्वीकार किया , तुमने मुझे नया मज़हब दिया - मैंने अंगीकार किया. वैसे ये शब्द उतने ही निरर्थक थे जितना मेरा जला हुआ अतीत. मैंने प्रतिकार नहीं किया था . तुम जैसे भी थे,जो भी थे - बेशर्त मेरे प्रेमपात्र थे. मैं भागी चली आई थी तुम्हें पाने को ; और सो गई थी थककर चकनाचूर. आँख खुली तो तुम्हारी दाढ़ी उग आई थी , तुम हिजाब कहकर मेरे ऊपर कफ़न डाल रहे थे. तुम्हारी आँखों में देखा मैंने झाँककर - ये तो मेरे पिता की आँखें हैं! मैं देखती ही रह गई ; तुमने मुझे ज़िंदा कब्र में गाड़ दिया! एक बार फिर सब कुछ जलाना होगा - मुझे खुद को पाने को!! |
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