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    June 16

    गाड़िया लुहारिन का प्रेम गीत



    पिता ने संडासी जैसे दृढ़ हाथों से
    बड़ी संडासी में
    पकड़ रखा है तपता हुआ लौहखंड
    जकड़कर.

    माँ धौंक रही
    हवा से फुलाकर
    धौंकनी लगातार.

    भट्टी तप रही.
    दुपहरी भी तप रही.
    तप रहे हम दोनों.

    मैं और तुम
    आमने - सामने,
    तुम्हारे हाथ में घन,
    मेरे हाथ में भी
    उतना ही भारी घन.

    पिता ने भरी हुंकारी.
    उठे दोनों घन.
    चक्राकार घूमे हवा में.
    दनादन पड़ने लगे
    तपते लौहखंड पर
    एक के बाद एक,
    क्रम से,
    दुगुने दम से.

    तुम्हारी आँखें मेरी आँखों में,
    मेरी आँखें तुम्हारी आँखों में.
    त्राटक! मारणमन्त्र! सम्मोहन!
    लोहा पिटता रहा,
    कुटता रहा,
    ढलता रहा.
    साँस फूलती रही
    मेरी भी
    तुम्हारी भी.

    एक गोले में घिरे हम.
    सब घेरकर पुकार रहे
    तुम्हें उकसाते हुए,
    मुझे शाबासी देते हुए.

    घन बिजली की तरह चले.
    चिंगारियाँ फूटीं.
    साँस फूलती रही.
    पसीना चू पड़ा तुम्हारी झबरी मूँछों से.
    तरबतर हो गई मेरी छींट की कोरी अँगिया.

    ढल गया लोहा.
    बन गया औजार.
    पिता ने डाल दिया पानी में
    बुझने को.

    चिहुँक उठा सारा कबीला.
    न तुम हारे
    न मैं हारी,
    न तुम जीते
    न मैं जीती.
    तुम्हारा पौरुष
    मेरे बल से टकराकर
    हो गया दुगुना.

    पंचों ने हमारी शादी तय कर दी है!

    लोहा एक बार फिर
    लोहे से टकरा रहा है.
    आग के फूल खिल रहे हैं
    मेरी नज़रों में,
    तेरी निगाहों में.

    सच में तू मेरी जोट का है !

    http://streevimarsh.blogspot.com/2009/06/blog-post_14.html
    June 03

    इतिहास हंता मैं




    इतिहास हंता मैं


    मैं घर से निकल आई थी
    तुम्हें पाने को ,
    मैंने धरम की दीवार गिराई थी
    तुम्हें पाने को,
    अपने पिता से आँख मिलाई थी -
    भाई से ज़बान लड़ाई थी -
    तुम्हें पाने को!




    माँ अपनी कोख नाखूनों से नोंचती रह गई ,
    पिता ने जीते जी मेरा श्राद्ध कर दिया;
    मैंने मुड़ कर नहीं देखा.
    मैं अपना इतिहास जलाकर आई थी -
    तुम्हें पाने को!




    तुमने मुझे नया नाम दिया -
    मैंने स्वीकार किया ,
    तुमने मुझे नया मज़हब दिया -
    मैंने अंगीकार किया.
    वैसे ये शब्द उतने ही निरर्थक थे
    जितना मेरा जला हुआ अतीत.
    मैंने प्रतिकार नहीं किया था .
    तुम जैसे भी थे,जो भी थे -
    बेशर्त मेरे प्रेमपात्र थे.
    मैं भागी चली आई थी
    तुम्हें पाने को ;




    और सो गई थी
    थककर चकनाचूर.




    आँख खुली तो तुम्हारी दाढ़ी उग आई थी ,
    तुम हिजाब कहकर
    मेरे ऊपर कफ़न डाल रहे थे.




    तुम्हारी आँखों में देखा मैंने झाँककर -
    ये तो मेरे पिता की आँखें हैं!
    मैं देखती ही रह गई ;
    तुमने मुझे ज़िंदा कब्र में गाड़ दिया!




    एक बार फिर
    सब कुछ जलाना होगा -
    मुझे
    खुद को पाने को!!