rishabha's profileऋषभ की कविताएँPhotosBlogListsMore ![]() | Help |
|
|
June 23 मेरी वेणी में सवेरे सवेरेबेटी
जब तुम पास नहीं होती
तब मैं अकेली होती हूँ। इसे तुम जानती हो, माँ इसीलिए तो अपने आशीष रोज गूँथ देती हो मेरी वेणी में सवेरे- सवेरे.. आँज देती हो मेरी आंखों में घर से निकलते समय. सबसे अच्छी माँ हो, -मेरी माँ . June 18 प्रकृतिप्रकृति
- ऋषभ देव शर्मा
प्रकृति हमारा पालन करती करती सचमुच पोषण
पर हम अंधे होकर करते उसका दोहन-शोषण
पेड़ कट गए, चिडियाँ गायब नहीं कबूतर मिलते अब तो सिंथेटिक पौधों पर गुलाब नकली खिलते
चलो प्रकृति की ओर चलें अब सब नदियों को जोडें पेड़ लगाएं, फूल खिलायें राम सेतु ना तोडें सुन्दरतासुन्दरता
ऋषभ देव शर्मा http://balsabhaa.blogspot.com/2008/06/blog-post.html मैंने फूलों को देखा खिलते हुए, मैंने चिडियों को देखा चहकते हुए,
मैंने लहरों को देखा मचलते हुए,
मैंने बादल को देखा बरसते हुए,
मैंने लुहार को देखा लोहे सा तपते हुए
मैंने चाँद को देखा घटते-बढ़ते हुए,
मैंने सूरज को देखा चमकते हुए,
यह दुनिया कितनी सुंदर है।
लोग इसे कुरूप क्यों बनाते हैं? यह तो सचमुच सुंदर है!!! |
|
|