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19 maggio

प्रशस्तियाँ



प्रशस्तियाँ
मैंने जब भी कुछ पाया मर खप कर पाया खट खट कर पाया अग्नि की धार पर गुज़र कर पाया पाने की खुशी लेकिन कभी नहीं पाई खुशी से पहले हर बार सुनाई देती रहीं मेरी प्रशस्ति में दुर्मुखों की फुसफुसाहटें धोबियों की गालियाँ और मन्थराओं की बोलियाँ शिक्षा हो या व्यवसाय प्रसिद्धि हो या पुरस्कार हर बार उन्होंने यही कहा - चर्म-मुद्रा चल गई! [चर्म-चर्वण से परे वे कभी गए ही नहीं!] मैंने हर दौड़ में उन्हें पीछे छोड़ा हर मैदान में पछाड़ा, उन्होंने मेरा पीछा नहीं छोड़ा मैं कच्चे सूत पर चलकर भर लाई घड़ों पानी वे किनारे पर ही ऊभ-चूभ हैं!! O