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    March 17

    बनाया था माँ ने वह चूल्हा



    बनाया था माँ ने वह चूल्हा


    चिकनी पीली मिट्टी को
    कुएँ के मीठे पानी में गूँथ कर
    बनाया था माँ ने वह चूल्हा
    और पूरे पंद्रह दिन तक
    तपाया था जेठ की धूप में
    दिन - दिन भर



    उस दिन
    आषाढ़ का पहला दौंगड़ा गिरा,
    हमारे घर का बगड़
    बूँदों में नहा कर महक उठा था,
    रसोई भी महक उठी थी -
    नए चूल्हे पर खाना जो बन रहा था.



    गाय के गोबर में
    गेहूँ का भुस गूँथ कर
    उपले थापती थी माँ बड़े मनोयोग से
    और आषाढ़ के पहले
    बिटौड़े में सजाती थी उन्हें
    बड़ी सावधानी से .



    बूँदाबाँदी के बीच बिटौड़े में से
    बिना भिगोए उपले लाने में
    जो सुख मिलता था ,
    आज लॉकर से गहने लाने में भी नहीं मिलता.



    सूखे उपले
    भक्क से पकड़ लेते थे आग
    और
    उँगलियों को लपटों से बचाती माँ
    गही में सेंकती थी हमारे लिए रोटी
    - फूले फूले फुलके.



    गेहूँ की रोटी सिंकने की गंध
    बैठक तक ही नहीं , गली तक जाती थी.
    हम सब खिंचे चले आते थे
    रसोई की ओर.



    जब महकता था बारिश में बगड़
    और महमहाती थी गेहूँ की गंध से रसोई -
    माँ गुनगुना उठती थी
    कोई लोकगीत - पीहर की याद का.



    माँ के गीतों में प्यार बहुत था
    पर पीड़ा और शिकायत भी थी.



    बारिश में बना रही हूँ रोटियाँ,
    भीगे झोंके भीतर घुसे आते हैं.
    मेरे बीरा ! इन झोंकों को रोक दे न !
    बड़े बदमाश हैं ये झोंके,
    कभी आग को बढ़ा देते हैं
    कभी बुझा देते हैं आग को.



    आग बढ़ती है
    तो रोटी जलने लगती है.
    तेरे बहनोई को जली रोटी पसंद नहीं रे!
    रोटी को बचाती हूँ तो उँगली जल जाती है.



    माँ की उँगलियाँ छालों से भर जाती थीं
    पर पिताजी की रोटी पर एक भी काला निशान कभी नहीं दिखा!



    माँ के गीतों में प्यार बहुत था
    पर पीड़ा और शिकायत भी थी.



    बारिश में बना रही हूँ रोटियाँ,
    भीगे झोंके भीतर घुसे आते हैं.
    मेरे बीरा ! इन झोंकों को रोक दे न !
    बड़े बदमाश हैं ये झोंके ,
    कभी आग को बढ़ा देते हैं
    कभी बुझा देते हैं आग को.



    आग बुझती है
    तो रोटी फूलती नहीं
    तेरा भानजा अधफूली रोटी नहीं खाता रे!
    बुझी आग जलाती हूँ तो आँखें धुएँ से भर जाती हैं.



    माँ की आँखों में मोतियांबिंद उतर आया
    पर मेरी थाली में कभी अधफूली रोटी नहीं आई!



    माँ के गीतों में प्यार बहुत था
    पर पीड़ा और शिकायत भी थी.



    रोटी बनाना सीखती मेरी बेटी
    जब तवे पर हाथ जला लेती है,
    आँखें मसलती
    रसोई से निकलती है.
    तो लगता है
    माँ आज भी गुनगुना रही है .



    मेरे बीरा ! इन झोंकों को रोक दे न!
    बड़े बदमाश हैं ये झोंके,
    कभी आग को बढ़ा देते हैं
    कभी बुझा देते हैं आग को.



    माँ के गीतों में प्यार बहुत था
    पर पीड़ा और शिकायत भी थी.



    - ऋषभ देव शर्मा


    Beyond The Second Sex (स्त्रीविमर्श)

    March 06

    औरतें औरतें नहीं हैं !



    औरतें औरतें नहीं हैं !

    वे वीर हैं
    मैं वसुंधरा.
    उनके-मेरे बीच एक ही सम्बन्ध -
    'वीर भोग्या वसुंधरा.'

    वे सदा से मुझे जीतते आए हैं
    भोगते आए हैं,
    उनकी विजयलिप्सा अनादि है
    अनंत है
    विराट है.

    जब वे मुझे नहीं जीत पाते
    तो मेरी बेटियों पर निकालते हैं अपनी खीझ
    दिखाते हैं अपनी वीरता.

    युद्ध कहने को राजनीति है
    पर सच में जघन्य अपराध !
    अपराध - मेरी बेटियों के खिलाफ
    औरतों के खिलाफ !

    युद्धों में पहले भी औरतें चुराई जाती थीं
    उनके वस्त्र उतारे जाते थे
    बाल खींचे जाते थे
    अंग काटे जाते थे
    शील छीना जाता था ,
    आज भी यही सब होता है.
    पुरुष तब भी असभ्य था
    आज भी असभ्य है,
    तब भी राक्षस था
    आज भी असुर है.

    वह बदलता है हार को जीत में
    औरतों पर अत्याचार करके.

    सिपाही और फौजी
    बन जाते हैं दुर्दांत दस्यु
    और रौंद डालते हैं मेरी बेटियों की देह ,
    निचोड़ लेते हैं प्राण देह से.

    औरते या तो मर जाती हैं
    [ लाखों मर रही हैं ]
    या बन जाती हैं गूँगी गुलाम
    ..

    वे विजय दर्प में ठहाके लगाते हैं !

    वे रौंद रहे हैं रोज मेरी बेटियों को
    मेरी आँखों के आगे.
    पति की आँखों के आगे
    पत्नी के गर्भ में घुसेड़ दी जाती हैं गर्म सलाखें.
    माता-पिता की आँखों आगे
    कुचल दिए जाते हैं अंकुर कन्याओं के.

    एक एक औरत की जंघाओं पर से
    फ्लैग मार्च करती गुज़रती है पूरी फौज,
    माँ के विवर में ठूँस दिया जाता है बेटे का अंग !

    औरतें औरतें हैं
    न बेटियाँ हैं, न बहनें;
    वे बस औरतें हैं
    बेबस औरतें हैं.
    दुश्मनों की औरतें !

    फौजें जानती हैं
    जनरल जानते हैं
    सिपाही जानते हैं
    औरतें औरतें नहीं होतीं
    अस्मत होती हैं किसी जाति की.

    औरतें हैं लज्जा
    औरतें हैं शील
    औरतें हैं अस्मिता
    औरते हैं आज़ादी
    औरतें गौरव हैं
    औरतें स्वाभिमान.

    औरतें औरतें नहीं
    औरतें देश होती हैं.
    औरत होती है जाति
    औरत राष्ट्र होती है.

    जानते हैं राजनीति के धुरंधर
    जानते हैं रावण और दुर्योधन
    जानते हैं शुम्भ और निशुम्भ
    जानते हैं हिटलर और याहिया
    कि औरतें औरतें नहीं हैं,
    औरतें देश होती हैं.
    औरत को रौंदो
    तो देश रौंदा गया ,
    औरत को भोगो
    तो देश भोगा गया ,
    औरत को नंगा किया
    तो देश नंगा होगा,
    औरत को काट डाला
    तो देश कट गया.

    जानते हैं वे
    देश नहीं जीते जाते जीत कर भी,
    जब तक स्वाभिमान बचा रहे!

    इसीलिए
    औरत के जननांग पर
    फहरा दो विजय की पताका
    देश हार जाएगा आप से आप!

    इसी कूटनीति में
    वीरगति पा रही हैं
    मेरी लाखों लाख बेटियाँ
    और आकाश में फहर रही हैं
    कोटि कोटि विजय पताकाएँ!

    इन पताकाओं की जड़ में
    दफ़न हैं मासूम सिसकियाँ
    बच्चियों की
    उनकी माताओं की
    उनकी दादियों-नानियों की.

    उन सबको सजा मिली
    औरत होने की
    संस्कृति होने की
    सभ्यता होने की.

    औरतें औरतें नहीं हैं
    औरतें हैं संस्कृति
    औरतें हैं सभ्यता
    औरतें मनुष्यता हैं
    देवत्व की संभावनाएँ हैं औरतें!

    औरत को जीतने का अर्थ है
    संस्कृति को जीतना
    सभ्यता को जीतना,
    औरत को हराने का अर्थ है
    मनुष्यता को हराना,
    औरत को कुचलने का अर्थ है
    कुचलना देवत्व की संभावनाओं को,

    इसीलिए तो
    उनके लिए
    औरतें ज़मीनें हैं;
    वे ज़मीन जीतने के लिए
    औरतों को जीतते हैं!



    -ऋषभ देव शर्मा

    Posted By कविता वाचक्नवी to Beyond The Second Sex (स्त्रीविमर्श) at 3/05/2009 04:52:00 AM