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    March 02

    अवाक्

     
    अवाक्
     
     
    आओ तनिक यहाँ बैठो तुम
    तुमसे कुछ बातें करनी हैं .
    शोर सुना तुमने लोगों का
    मेरा मौन ज़रा सुन देखो
    .
    पहली बार देखकर कोई
    ताजमहल जैसे भौंचक हो
    जलेपंख वाला संपाति
    बादल-बादल तैर रहा हो,
    वैसे ही मैं
    हर्ष और विस्मय का सागर
    डूब -डूब कर तिरने लगता-
    शब्दों की रेखाओं से तुम
    जब भी कोई चित्र बनाते
    नया-नया सा,
    ताजा,टटका !

    मैं अवाक् हो
    सिर्फ़ ताकता रह जाता हूँ
    कभी तुम्हें तो कभी चित्र को.
    कभी चित्र में तुम दिखते हो,
    कभी चित्र तुममें दिखता है.

    आज अभी तो ऐसा दीखा,
    जबरन ओढी केंचुल कोई
    तुमने स्वयं नोंच डाली है,
    सारी कोमलता को अपनी
    खुली हवा में खोल दिया है ,
    भला हवाओं से क्या डरना
    झंझाओं से शक्ति मिलेगी -
    दीपक का विश्वास नया यह
    शब्द-शब्द में दीपित दीखा .
    बहुत दिनों के बाद
    किसी
    काल कोठरी के कैदी को
    जैसे दीखे धूप गुनगुनी
    और नयन मीलित हों ख़ुद ही,
    तुम क्या जानो
    कुछ -कुछ वैसा मुझ पर बीता
    जब देखा वह
    शब्द- चित्र अपना मन- चीता.

    आओ तनिक पास तो बैठो
    तुमसे कुछ बातें करनी हैं .
    बातें सदा अधूरी हैं जो ,
    बातें सदा अनसुनी हैं जो,
    बातें जो मैंने कह तो दीं- .

    पर सुनने वाला कोई है ?

    तुम तो पीठ फेर बैठे हो -
    सदा-सदा की तरह
    आज भी !!

    __ ऋषभ देव शर्मा 
    २८.१०.२००७.
     

     

    श्राद्ध

     
    श्राद्ध

    हे पितः !

    आपके चरणों में नत है
    आपका यह आत्मज _
    सदा का अकर्मण्य
    बामन का बैल .

    किस अधिकार से करूं
    मैं तर्पण-अर्पण ?
    कहाँ चुका सका आपका ऋण ?
    कभी चुका भी न सकूंगा .


    सभी कुछ तो कर दिया नष्ट मैंने ,
    जो आपने सौंपा था.
    कहाँ सँभाल सका
    आपके तेज को ,तप को,
    आपका यह क्षुद्र छोटा बेटा ?

    आप थे त्याग और दान की प्रतिमूर्ति,
    और मैं बन बैठा भिखारी !
    कामनाओं की वैतरणी में बिलबिलाता
    नारकीय कीट बन गया मैं तो ;
    आपके स्वर्ग से विमुख हो गया न !

    खो दिया मैंने सम्मान
    जो अर्जित किया था आपने .
    लांछित किया आपके यश को
    और व्यर्थ, विद्या को.


    मेरे पिता!
    मेरे गुरू भी थे आप
    और ईश्वर भी .
    आपकी अवज्ञा की मैंने:
    आप मन के शासक थे ,
    मैं देह का दास बन गया !

    अब तो
    इतना भी साहस नहीं बचा -
    छू सकूं आपके पावन चरण ,
    मांग सकूं क्षमा .

    ~*~

    पर आप तो पिता हैं -
    गुरू हैं -
    मेरे भगवान् हैं -
    आशीष रची अपनी हथेलियों से
    छू सकते हैं मेरा माथा,
    जला सकते हैं मेरा कलुष .

    ~*~

    हाँ , मेरे कानों में गूँज रहा है
    आपका स्वस्ति-वाचन .
    बजने लगे हैं मेरे रोमांच में
    वे सारे स्तोत्र
    जो गद्गद कर देते थे आपको-
    आपके कंठ को.

    अपनी सुनहरी भुजाओं में
    भर लिया है आपने मुझे !


    मेरे ये आंसू स्वीकार करो; पितः !!

    ०००० ऋषभ देव शर्मा ...........

     

     

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