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16 dicembre

'न' कहने की सज़ा

 
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Posted By कविता वाचक्नवी to Beyond The Second Sex (स्त्रीविमर्श) at 12/15/2008 08:15:00 PM

एकालाप 
'न' कहने की सज़ा
 
- उन्होंने जोरों से घोषणा की :
अब से तुम आजाद हो,
अपनी मर्जी की मालिक.
 
- मुझे लगा,
मैं अब अपने सारेनिर्णय ख़ुद लूंगी,
इन  देवताओं का बोझ कंधों पर न ढोना  पड़ेगा.
 
-मैंने खुले आसमान में उड़ान भरी ही थी 
कि फ़रिश्ते आ गए. 
बोले-हमारे साथ चलो.
हम तुम्हें अमृत के पंख देंगे.
 
-मैंने इनकार कर दिया.
मेरा अकेले उड़ने का मन था.
-फ़रिश्ते आग-बबूला हो गए.
उनके अमृतवर्षी पंख ज्वालामुखी बन गए.
गंधक और तेजाब की बारिश में मैं झुलस गई.
 
-सर्पविष की पहली ही फुहार ने मेरी दृष्टि छीन ली 
और मेरी त्वचा को वेधकर तेजाब की जलन 
एक एक धमनी में समाती चली गई.
 
-मैं तड़प रही  हूँ.
फ़रिश्ते जश्न मना  रहे हैं - जीत का जश्न.
 
-जब जब वे मुझसे हारे हैं 
उन्होंने यही तो किया है.
 
-जब जब मैंने अपनी राह ख़ुद चुनी ,
जब जब मैंने उन्हें 'ना' कहा,
तब तब या तो  मुझे 
आग के दरिया में कूदना पड़ा
या उन्होंने अपने अग्निदंश से
मुझे जीवित लाश बना दिया.
 
-जब जब मैंने अपनी राह ख़ुद चुनी,
जब जब मैंने उन्हें 'ना' कहा
तब तब या तो मुझे धरती में समाना पडा
या महाभारत रचाना पड़ा.
 
-मैंने कितने रावणों के नाभिकुंड सोखे 
कितने दुर्योधनों के रक्त से केश सींचे
कितनी बार मैं महिषमर्दिनी से लेकर दस्युसुंदरी तक बनी
कितनी बार....
कितनी बार...
 
-पर उनका तेजाब आज भी अक्षय है
घृणा का कोश लिए फिरते हैं वे अपने प्राणों में ;
और जब भी मेरे होठों से निकलती है एक 'ना' 
तो वे सारी नफरत 
सारा तेजाब 
उलट देते हैं मेरे मुँह पर . 
 
-मैं अब नरक में हूँ
अन्धकार और यातना के नरक में . 
 
-अब मुझे नींद नहीं आती
आते हैं जागती आँखों डरावने सपने.
नहीं,
उड़ान के सपने नहीं,
आग के सपने 
तेजाब के सपने 
साँपों  के सपने
यातनागृहों के सपने
वैतरणी के सपने . 
 
-यमदूतो ! मुझे नरक में तो जीने दो!!
 

Oऋषभ देव शर्मा
04 dicembre

'सूँ साँ माणस गंध' : अनुभूति में ऋषभदेव शर्मा की रचनाएँ

 

प्रत्येक सोमवार को प्रकाशित
 
पत्र व्यवहार का पता
teamanu@anubhuti-hindi.org

अभिव्यक्ति  १. १२. २००८

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'सूँ साँ माणस गंध'

 

सुनो दुश्मन!
मैं न तो
किसी फौज का जनरल हूँ,
न किसी देश का प्रधानमंत्री,
मैं दूरदर्शन का निदेशक भी नहीं हूँ
और खुफ़िया विभाग की नौकरी भी
कब का छोड़ चुका हूँ,
मैं कोई वाइस चांसलर भी नहीं हूँ,
न मैं किसी का अंग रक्षक हूँ
न मेरा कोई अंग रक्षक।

मैं तो एक यात्री हूँ
बस या ट्रेन की सीट पर ऊँघता हुआ,
दफ्तर, बाज़ार और
घर के तिकोन में भटकता हुआ,
और इसीलिए
तुम्हारी हिट-लिस्ट का
एक नाम-रूप-हीन निशाना हूँ।

हर दिशा में मेरा पीछा कर रही है
तुम्हारी आर डी एक्स की दैत्याकार आँख-
सूँघती हुई बारूदी नथुनों से
'सूँ साँ माणस गंध'

लगातार दौड़ रहा हूँ मैं
पर यह निगोड़ी 'माणस गंध'
छिपाए नहीं छिपती।

तो ठीक है
इस गंध को ही
हथियार बनाना पड़ेगा अब मुझे...

लो,
दौड़ना छोड़कर आ खड़ा हुआ हूँ
तुम्हारे सामने
निर्णायक युद्ध में,
क्योंकि अर्थहीन हो गए हैं।
वे सारे देवता
जिन्होंने लिया था भार भारत का,
लोकतंत्र के योगक्षेम का,

जय अथवा पराजय
अप्रासंगिक है
मेरे और तुम्हारे इस युद्ध में...
प्रासंगिक है तो केवल
तुम्हारा आसुरी उन्माद,
प्रभुओं की नपुंसकता
और मेरे अभिमन्युपन की
शाश्वत माणस गंध!!!

-ऋषभदेव शर्मा

अनुभूति में ऋषभदेव शर्मा की रचनाएँ-

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सूँ साँ माणस गंध

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रोटी दस तेवरिया
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हर औरत काँपती है

एकालाप (१३) : स्त्रीविमर्श







हर औरत काँपती है



आज मैं काँप रही हूँ
सदा ऐसा ही होता है
जब जब वे लड़ते हैं
मैं काँपती रहती हूँ





वे लड़ते हैं
लड़ना उनकी फ़ितरत है
कभी ज़र के लिए
कभी जोरू के लिए
कभी ज़मीन के लिए
कभी जुनून के लिए




वे लड़ते हैं
लड़कर उन्हें संतोष मिलता है
कभी शहीद होने का
कभी जीत के जश्न का
कभी स्वर्ग की लिप्सा का
कभी राज्य के भोग का




वे लड़ते हैं
लड़ाई उन्हें महान बनाती है
कभी वे शवाब कमाते हैं
कभी जेहाद करते हैं
कभी क्रांति लाते हैं
कभी तख्ता पलटते हैं




लड़ते वे हैं
काँपती मैं हूँ





लड़े कोई भी
मरे कोई भी
काँपना मुझी को है हर हाल में




वे जिनका खून बहाते हैं
मैं उन सबकी माँ हूँ न
वे जिसके परखचे उड़ाते हैं
वह मेरा सुहाग है न
वे जिससे बलात्कार करते हैं
वह मेरी कोखजनी है न




मुझे काँपना ही है हर हाल में -




वे जो खून पीते हैं
वे जो नरमेध करते हैं
वे जो बलात्कारी हैं
मैं उनकी भी तो माँ हूँ
मैं उनकी भी तो बेटी हूँ
मैं उनकी भी तो बहन हूँ




मैं काँपती हूँ-




उनके लिए मैं माँ नहीं रही न
न बेटी, न बहन
रिश्ते तो मनुष्यों के होते हैं
दरिंदों के कैसे रिश्ते - कैसे नाते




दुनिया को अपने रंग में रंगने का उन्माद
जब जब
मनुष्यों को दरिंदों में तब्दील करता है
तब तब मैं
काँपती हूँ



हर माँ काँपती है
हर औरत काँपती है
और शाप देती है
अपनी ही संतानों को




मैं फिर काँप रही हूँ (26 नवंबर की रात से)
और दे रही हूँ शाप
उन सारी आदमखोर संतानों को
जो दरिंदों में तब्दील होकर
लील रही हैं मनुष्यों को!

- ऋषभदेव शर्मा





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Posted By कविता वाचक्नवी to Beyond The Second Sex (स्त्रीविमर्श) at 12/01/2008 12:40:00 AM