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27 gennaio

आतंक : दस कविताए¡

 
आतंक : दस कविताए¡

युद्धजीवी प्रभु के नाम

ओ नृषंस प्रभु!

क्यों किया तूने ऐसा

कि अपनी ही संतान को

बलिपषु बना डाला

अपनी अधिकार-लिप्सा के हेतु ?

क्यों अपना शासन बनाए रखने को

क्षमा कर दिया तूने

सहोदर के हत्यारे काइन को ?

क्यों दिया तूने

पाप को संरक्षण

अपनी महत्ता को स्थिर रखने हेतु ?

क्यों की तूने गंधक

और आग की वषाZ

हरे भरे सदोम और अमोरा नगरों पर

अपना अस्तित्व मनवाने को ?

क्यों लड़ा दिया तूने

आदमी की एक नस्ल को

आदमी की दूसरी नस्ल से

इस तरह कि

एक नस्ल मनाती रही

फसह का पर्व - निरपेक्ष रहकर

और दूसरी नस्ल के

सब जेठे बेटे और जानवर भी मार डाले तूने

व्यक्तिगत प्रतिषोध में ?

क्यों विवष किया मूसा को तूने

कि वह समुद्र जल में डुबो दे

उस देष को

जो तेरे समक्ष नहीं झुका

और जिसने नहीं किया तेरा स्तुति गान ?

मनुष्यता के विरुद्ध

इतने अपराधों के स्रष्टा ओ नृषंस!

बड़ा नकली लगता है जब पर्वत षिखर पर से

तू देता है पे्रम का संदेष

अपने किसी पुत्र के मु¡ह से।।ž


प्रतिषोध

खिलौनों में बम हैं

ट्रांजिस्टर, कार और साइकिल

सभी में बम हैं

अंधा प्रतिषोध

लेता है मनुष्य

मनुष्य ही से

और बो देता है बीज

कुछ और नए

मनुष्य बमों के।।ž


अवषेष

रिष्ते सब टूट गए

खून के,

दूध के

और परस्पर झूठे पानी के।


ठेके ही बाकी हैं

कुर्सी के,

धर्म के,

माफिया गिरोहों के।।ž

सपना


मेरे पिता ने

देखा था

एक सपना

कि हवाए¡ आज़ाद होंगी ....

और वे हो गई (


फिर मैंने

देखा एक सपना

कि

महक बसेगी

मेरी सा¡सों में ....

और मेरे नथुने

भिड़ गए आपस में

मुझे ही कुरुक्षेत्र बनाकर


अब मेरा बेटा

देख रहा है एक सपना

कि हज़ार गुलाब फिर चटखेंगे

पर उसे क्या मालूम कि

अब की बार

गुलाबों में

महक नहीं होगी ! ž

छिपकली


चिपक गई है

मेरे दिमाग में

एक प्रागैतिहासिक छिपकली


निरंतर फड़फड़ा रही है

अपने लंबे मैले पंख


और प्रदूषित होती जा रही है

पीयूष रस से भरी मेरी डल झील

गोता खोर तलाषेंगे

कुछ दिन बाद

इसके तल में

आक्सीजनवाही मछलियों के

जीवाष्म ! ž


स्नो फॉल


लटकती रहती हैं

फि़रन की खाली बा¡हें

हाथ सटाए रखते हैं

का¡गड़ी को पेट से

राख में दबे अंगारे

झुलसा देते हैं

नर्म गुलाबी जि़ल्द को

सख्त काली होने तक


और फुहिया बर्फ

कुछ और सफेद हो जाती है

स्याह और सुर्ख पर गिरकर ! ž

अनुपस्थित


शहतूत की पत्ती पर

रेषम के कीड़े हैं

भारत के स्विट्ज़रलैंड में

बकरी हैं, भेड़ें हैं

गूजर हैं, बकरवाल हैं

पंडित हैं, शेख हैं

सेव और बादाम हैं

पष्मीना है और केसर भी

चष्मों का जल आज भी

पहले सा ठंडा और मीठा है


पर एक चीज है

जो सिरे से गायब है -

एक उन्मुक्त संगीत

जो दम तोड़ रहा है

`पाकिस्तान जि़ंदाबाद` के

बोझ तले ! ž


बदबू


केसर की क्यारी में

कितने बरस से

लगातार बढ़ती ही जाती है

लाषों की बदबू

घटती नहीं


बर्फ का षिवलिंग

हर बरस आप से आप बढ़ता है

और घट भी जाता है

आप से आप।ž


धर्मयुद्ध जारी है


शहर पगला गया है

खुद को काट रहा है खुद ही,

जिस बस में बैठा है उसी को फू¡क रहा है,

अपनी पिस्तौल

अपनी ही छाती पर तान रहा है,

पैट्रोल और माचिस लेकर

दौड़ रहा है एक बच्चे के पीछे,


बच्चे को शरण नहीं मिलती

मंदिर-मिस्जद-गुरुद्वारे में,

न पुलिस मुख्यालय में,

न संसद-सचिवालय में,


विवष बच्चा एक बार फिर सड़क पर है,


दिषाहीन दौड़ता है लाचार

पीछे-पीछे आता है शहर पैट्रोल और माचिस लिए,

आगे खड़ा है कफ्र्यू हाथों में स्टेनगन थामे

फ्लैगमार्च करता हुआ,


चूहा-बिल्ली का खेल जारी है

कुंभ नहान चल रहा है

प्रकाष पर्व का जुलूस बढ़ा चला आ रहा है

अजान ग¡ूज रही है

गिरजे की घंटिया¡

उत्पन्न कर रही हैं फायर ब्रिरोड का भ्रम,


बच्चा बीच राह में मूछिZत पड़ा है

त्रिषूल और तलवार लेकर

उसकी छाती के पवित्र कुरुक्षेत्र में

शहर धर्मयुद्ध कर रहा है

अपने आप से कि

बच्चे को बचाना है विधर्मियों के स्पषZ से,


बच्चा दम तोड़ रहा है और

धर्मयुद्ध जारी है

पाखंड के समूचे तामझाम के साथ।।ž


ओ मेरे महाप्रभुओ


ओ मेरे महाप्रभुओ!

बहुत हो चुकी लीला,

अब तो अपना जाल समेटो।

बीच आ¡गन में

कांटेदार तारों की बाड़ लगवा दी तुमने,

मेरे जौ-मटर के खेत रौंदकर

बंदूकों के पेड़ उगवा दिए तुमने,

मेरे पिता के अस्थिकलष को

गीदड़ों के हवाले कर दिया,

मेरी मा¡ के शव को

भेडियों से नुचवा दिया,

फा¡सी पर लटका चुके हो

चुन-चुन कर मेरे एक-एक साथी को, मेरी पत्नी समेत,

गुडि़या में बारूद भरकर

परखचे उड़ा दिए तुमने मेरी बेटी के(

और

वह बालक जिसका खून

अभी तक चीख रहा है तुम्हारे

पैरों के समीप वाली बलिवेदी पर,

वह मेरा इकलौता बेटा था,


अब कोई नहीं बचा

सिवा मेरे!

और मैं बलि देने नहीं

बलि लेने आया हू¡।


लो, तोड़ दिए मैंने

सब वर्ग तुम्हारे बनाए हुए,

लो, तिलांजलि देता हू¡,

संप्रदायों को तुम्हारे रचे हुए,

यह लो, उतारता हू¡ यज्ञोपवीत,

यह कड़ा और कंघी भी फेंकता हू¡,

छोड़ता हू¡ पा¡चों वक़्त की नमाज़,

क्रॉस को झोंकता हू¡ चूल्हे में,

मिटा रहा हू¡ ब्राह्मण भंगी का भेद

खंडित करता हू¡ रोटी बेटी के प्रतिबंध

और

लो, उतरता हू¡ अखाड़े में

निहत्था

तुम्हारे साथ जूझने को

निर्णायक द्वंद्वयुद्ध में।


सुनो महाप्रभुओ !

मुझे नहीं अब तुम्हारी ज़रूरत

मैं हू¡ स्वयं संप्रभु

और खड़ा हू¡

तुम्हारी समस्त आज्ञाओं के विरुद्ध

यह घोषणापत्र लेकर कि


सभी महाप्रभु खाली कर दें मेरी धरती

मुझे उगाना है एक जातिहीन मनुष्य

धमोंZ से परे ! ž

- ऋषभदेव शर्मा

निवेदन

निवेदन

http://www.sahityakunj.net/ThisIssue/Ankkavita/Ankkavitani_main19.htm

जीवन
बहुत-बहुत छोटा है,
लम्बी है तकरार!
और न खींचो रार!!

यूँ भी हम तुम
मिले देर से
जन्मों के फेरे में,
मिलकर भी अनछुए रह गए
देहों के घेरे में.

जग के घेरे ही क्या कम थे
अपने भी घेरे
रच डाले,
लोकलाज के पट क्या कम थे
डाल दिए
शंका के ताले?

कभी
काँपती पंखुडियों पर
तृण ने जो चुम्बन आँके,
सौ-सौ प्रलयों
झंझाओं में
जीवित है झंकार!
वह अनहद उपहार!!

केवल कुछ पल
मिले हमें यों
एक धार बहने के,
काल कोठरी
मरण प्रतीक्षा
साथ-साथ रहने के.

सूली ऊपर सेज सजाई
दीवानी मीराँ ने,
शीश काट धर दिया
पिया की
चौखट पर
कबिरा ने.

मिलन महोत्सव
दिव्य आरती
रोम-रोम ने गाई,
गगन-थाल में सूरज चन्दा
चौमुख दियना बार!
गूंजे मंगलचार!!

भोर हुए
हम शंख बन गए,
सांझ घिरे मुरली,
लहरों-लहरों बिखर बिखर कर
रेत-रेत हो सुध ली.

स्वाति-बूँद तुम बने
कभी, मैं
चातक-तृषा अधूरी,
सोनचम्पई गंध
बने तुम,
मैं हिरना कस्तूरी .

आज
प्राण जाने-जाने को,
अब तो मान तजो,
मानो,
नयन कोर से झरते टप-टप
तपते हरसिंगार!
मुखर मौन मनुहार!!


-ऋषभ देव शर्मा


स्रोत: ताकि सनद रहे(कविता संग्रह) -२००२

शुभ छब्बीस जनवरी

छब्बीस जनवरी
 
 
 
लोकतंत्र का पर्व शुभंकर
मंगलमय हो !
 
 
तानाशाही मिटे ,
उपनिवेशी सोच हटे ,
सम्प्रदाय औ'  जातिवाद की
 धुंध कटे , अंधियार छंटे !
 
 
गति को वरें -
प्रगति को चुन लें -
दलबंदी के दलदल में जो
संविधान के पाँव फँसे हैं !

धनबल,भुजबल की कीचड में
जन गण जो  आकंठ धँसे हैं , 
प्राणों की पुकार को
 सुन लें !
 
 
अब तक का इतिहास यही है :
प्रभुता पाकर
सब
जनता के खसम बन गए !
 
 
ऐसा ही होता आया है !
ऐसा ही होने वाला है !!
 
 
कब तक
लोक शक्ति मुहताज रहेगी
त्रिशंकुओं के तंत्र मंत्र की ?
 
 
लोकतंत्र में जो निर्णय हो
नीर - क्षीर सबके समक्ष हो !
कुर्सीवालों के समक्ष अब
एक समांतर लोकपक्ष हो !!
 
 
जो हो ,
जनता की इच्छा से तय हो !
 
 
लोकतंत्र का पर्व शुभंकर
मंगलमय हो !! o 
 
23 gennaio

गोल महल The round-about Palace

गोल महल
 
गोल महल में
भारी बदबू,
सीलन औ' अवसाद;
धुप से
टूट गया संवाद .
 
कुर्सीजीवी कीट
बोझ से
धरती दबा रहे हैं;
मोटी एक किताब,
उसी के
पन्ने चबा रहे हैं;
 
दरवाज़े हैं बंद
झरोखों तक
मलबे की ढेरी;
 
दिवा रात्रि का आवर्तन है
चमगादड़ की फेरी;
 
इसको दफ़न करें मिटटी में
बन जाने दें -
खाद ! o
 
 
 
The round-about Palace
 
uncontrolable stench,grimmace and uncouth
In the round -about palace
No dialogue with the sun .
 
parasites on seats and chairs
 suck the mould.
And  chew
the pages of a   heavy book.
 
doors,windows shut ,closed
No outside air fresh or free reach
mud filled upto the actic.
 
 
there is a  cycle of day and night
the bats come and go
 
Let it decay and die
the very compost for fertility!
 
 
(translated by Dr. Gopal Sharma)

घर बसे हैं Homes - live

 घर बसे हैं
 
तोड़ने की साजिशें हैं
हर तरफ़,
है बहुत अचरज
कि फिर भी
घर बसे हैं,
घर बचे हैं !
 
 
भींत, ओटे
जो खड़े करते रहे
पीढियों से हम;
तानते तंबू रहे
औ' सुरक्षा के लिए
चिक डालते;

एक अपनापन
छतों सा-
छतरियों सा-
शीश पर धारे
युगों से चल रहे;
 
झोंपड़ी में-
छप्परों में-
जिन दियों की
टिमटिमाती रोशनी में
जन्म से
सपने हमारे पल रहे;

लाख झंझा-
सौ झकोरे-
आँधियाँ तूफान कितने
टूटते हैं रोज उन पर
पश्चिमी नभ से से उमड़कर !

दानवों के दंश कितने
तृणावर्तों में हँसे हैं,
है बहुत अचरज
कि फिर भी
घर बसे हैं,
घर बचे हैं !  
 
 
घर नहीं दीवार, ओटे,
घर नहीं तंबू,
घर नहीं घूंघट;
घर नहीं छत,
घर न छतरी;
झोंपड़ी भी घर नहीं है,
घर नहीं छप्पर .
 
तोड़ दो दीवार, ओटे,
फाड़ दो तंबू,
जला दो घूंघटों को,
छत गिरा दो,
छीन लो छतरी,
मटियामेट कर दो झोंपड़ी भी,
छप्परों को
उड़ा ले जाओ भले.
 
घोंसले उजडें भले ही,
घर नहीं ऐसे उजड़ते.
अक्षयवटों जैसे हमारे घर
हमारे अस्तित्व में
गहरे धँसे हैं,
है नहीं अचरज
कि अब भी
घर बसे हैं,
घर बचे हैं !
 
 
घर अडिग विश्वास,
निश्छल स्नेह है घर.
दादियों औ' नानियों की आँख में
तैरते सपने हमारे घर.
घर पिता का है पसीना,
घर बहन की राखियाँ हैं, 
भाइयों की  बाँह पर
ये घर खड़े हैं;
पत्नियों की माँग में
ये घर जड़े हैं.
 
आपसी सद्भाव, माँ की
मुठियों में
घर कसे हैं,
क्यों  भला अचरज
कि अब तक
घर बसे हैं-
घर बचे हैं. o
 
Homes - live
 
 Though conspire they a lot
everywhere everytime
Yet ,wonder! homes stay
Homes live.
 
We have been placing
walls,enclosures and shades
From ages.
 
And tents we put
and draw curtains for
Safety.
 
There is something
you may call it
togetherness
like roof on the head-protection
like umbrella- shelter
from ages- go on.
 
 In the huts
In the tents
In the enclosures
 solitary lamps twinkle
the dreams of generations .
 
A  thousand clouds
millions  of tempests
numberless storms
Fresh from the windy west
try to uproot them.
 
The poisonous laughter
of the demons surpass
Wonder! Homes stay
Homes live.
 
Home is neither  shade nor walls
Nor tent nor hut
Nor veil nor umbrella
Nor roof nor  anything
Home is not the name of shade .
nor what we have over our head.
dismantle every wall
hut , roof ,umbrella,shade or anything
to protect.
 
You can do it
But this is the way to destroy nests
or the place we live
And what you call house.
Home You can not uproot
Homes cannot be
they are deep-rooted Akshayavat.
 
Home is unstintited faith
Home is selflessness
placed in the eyes of our
mothers and grannies like dreams .
Home is the sweat of father and the
love -knot of sisters
On the arms of brothers.
Home is deeply knitted in the hair-partings
Of a homely wife.
Togetherness ,oneness,the  unbreakable bond
is firmly placed in the tender fist of the mother.
that is home .
Do You still wonder?
Why homes stay ,homes live .
 
*Translated by
 Dr. Gopal Sharma

मारणास्त्र CATASTROPHIC

मारणास्त्र
 
मैं
तैयार बैठा हूँ
मारणास्त्र को अभिमंत्रित किए हुए,
किसी भी क्षण
तुम पर चला सकता हूँ.
 
 
तुम भी
तैयार बैठे हो
मारणास्त्र को अभिमंत्रित किए हुए
किसी भी क्षण
मुझ पर चलाने के लिए.
 
 
मेरा निशाना
ठीक बैठ गया
तो तुम मारे जाओगे.
तुम्हारा निशाना
ठीक बैठ गया
तो मैं मारा जाऊँगा.
 
 
यह भी हो सकता है:
इस महाभारत में
हम दोनों ही मारे जाएँ.
 
 
या फिर
यह भी हो सकता है
कि हम दोनों ही बच जाएँ
और
हमारे मारणास्त्र
नष्ट हो जाएँ
परस्पर टकराकर
बीच आकाश में.
 
इन तमाम
अनिश्चित संभावनाओं के बीच
एक बात निश्चित है:
 
 
घृणा के विकिरण
जो निकलेंगे
इन मारणास्त्रों के प्रयोग से....
 
 
उनसे काँप-काँप जाएगी
हमारे घर की हवा...
 
 
उनसे जहर बन जाएगा
हमारे बच्चों का पीने का पानी...
 
 
उनसे दहकती बारूद में बदल जाएगी
हमारे पुरखों के लहू से जुती यह ज़मीन ...
 
 
उनसे कसैले नीले हरे धुएँ में
तब्दील हो जाएगी
हमारे अग्निहोत्र की पवित्र ज्वाला....
 
 
और उनसे जीवनभक्षी ब्लैकहोल
लपलपाने लगेंगे
अपनी खुरदरी जीभ
हमारे सपनों के नीले आकाश में......
 
 
क्या हम अपनी आत्मा पर ले लें
इतने सारे पाप
पंचतत्वों के विरुद्ध-
                         (केवल टकराते हुए
                          अपने-अपने अहं के लिए)? o   
 
 
Catastrophic

I
am here  ready to aim
with the weapon of mass-destruction
any moment it will strike you.
 
You
Too
are there ready to aim
with the weapon
any moment to strike.
 
If  i could aim right
You will be nowhere in sight
and if you could
i shall be no more.
 
It is also possible
that in this war of nerves:The Mahabharat
Both of us perish.
 
Or both of us
escape unhurt.
 
and the weapons that
aimed at each one
strike  in the mid -sky
and
Fall like a withered tree.
 
Out of  all these uncertainties
One thing is certain
the hatred being born out of this conflict
and the radiation thus spread
will poison the environment
and the water our children might drink
will be just the sip of death.
 the  homely air shudder
at the  very thought of it.
 
My native land-the land of of our forefathers
they tilled it with their blood and sweat
 will trasform into  flaming metal.
 and the green trite smoke will
come out of our pious agnihotra.
 
The life-sucker blackholes
will be visible in the  blue sky of our rainbow dreams .
Should we take all these sins on our souls
against all the firmament ?
( Only for the sake of our unquenched egos).
 
 
tranlated by Dr. Gopal Sharma
Prof. Dept. of english,
Univ. of Bengazi
Libya