rishabha's profileऋषभ की कविताएँPhotosBlogListsMore Tools Help

ऋषभ की कविताएँ

जीवन बहुत बहुत छोटा है,लम्बी है तकरार!और न खींचो रार!! -ऋषभ
June 16

गाड़िया लुहारिन का प्रेम गीत


पिता ने संडासी जैसे दृढ़ हाथों से बड़ी संडासी में पकड़ रखा है तपता हुआ लौहखंड जकड़कर . माँ धौंक रही हवा से फुलाकर धौंकनी लगातार. भट्टी तप रही . दुपहरी भी तप रही . तप रहे हम दोनों. मैं और तुम आमने - सामने , तुम्हारे हाथ में घन , मेरे हाथ में भी उतना ही भारी घन. पिता ने भरी हुंकारी. उठे दोनों घन. चक्राकार घूमे हवा में. दनादन पड़ने लगे तपते लौहखंड पर एक के बाद एक , क्रम से , दुगुने दम से. तुम्हारी आँखें मेरी आँखों में , मेरी आँखें तुम्हारी आँखों में. त्राटक! मारणमन्त्र! सम्मोहन! लोहा पिटता रहा, कुटता रहा, ढलता रहा. साँस फूलती रही मेरी भी तुम्हारी भी . एक गोले में घिरे हम. सब घेरकर पुकार रहे तुम्हें उकसाते हुए, मुझे शाबासी देते हुए. घन बिजली की तरह चले. चिंगारियाँ फूटीं. साँस फूलती रही. पसीना चू पड़ा तुम्हारी झबरी मूँछों से. तरबतर हो गई मेरी छींट की कोरी अँगिया. ढल गया लोहा. बन गया औजार. पिता ने डाल दिया पानी में बुझने को. चिहुँक उठा सारा कबीला . न तुम हारे न मैं हारी , न तुम जीते न मैं जीती. तुम्हारा पौरुष मेरे बल से टकराकर हो गया दुगुना. पंचों ने हमारी शादी तय कर दी है ! लोहा एक बार फिर लोहे से टकरा रहा है. आग के फूल खिल रहे हैं मेरी नज़रों में , तेरी निगाहों में. सच में तू मेरी जोट का है ! 0


June 03

इतिहास हंता मैं




इतिहास हंता मैं


मैं घर से निकल आई थी
तुम्हें पाने को ,
मैंने धरम की दीवार गिराई थी
तुम्हें पाने को,
अपने पिता से आँख मिलाई थी -
भाई से ज़बान लड़ाई थी -
तुम्हें पाने को!




माँ अपनी कोख नाखूनों से नोंचती रह गई ,
पिता ने जीते जी मेरा श्राद्ध कर दिया;
मैंने मुड़ कर नहीं देखा.
मैं अपना इतिहास जलाकर आई थी -
तुम्हें पाने को!




तुमने मुझे नया नाम दिया -
मैंने स्वीकार किया ,
तुमने मुझे नया मज़हब दिया -
मैंने अंगीकार किया.
वैसे ये शब्द उतने ही निरर्थक थे
जितना मेरा जला हुआ अतीत.
मैंने प्रतिकार नहीं किया था .
तुम जैसे भी थे,जो भी थे -
बेशर्त मेरे प्रेमपात्र थे.
मैं भागी चली आई थी
तुम्हें पाने को ;




और सो गई थी
थककर चकनाचूर.




आँख खुली तो तुम्हारी दाढ़ी उग आई थी ,
तुम हिजाब कहकर
मेरे ऊपर कफ़न डाल रहे थे.




तुम्हारी आँखों में देखा मैंने झाँककर -
ये तो मेरे पिता की आँखें हैं!
मैं देखती ही रह गई ;
तुमने मुझे ज़िंदा कब्र में गाड़ दिया!




एक बार फिर
सब कुछ जलाना होगा -
मुझे
खुद को पाने को!!


May 19

प्रशस्तियाँ



प्रशस्तियाँ
मैंने जब भी कुछ पाया मर खप कर पाया खट खट कर पाया अग्नि की धार पर गुज़र कर पाया पाने की खुशी लेकिन कभी नहीं पाई खुशी से पहले हर बार सुनाई देती रहीं मेरी प्रशस्ति में दुर्मुखों की फुसफुसाहटें धोबियों की गालियाँ और मन्थराओं की बोलियाँ शिक्षा हो या व्यवसाय प्रसिद्धि हो या पुरस्कार हर बार उन्होंने यही कहा - चर्म-मुद्रा चल गई! [चर्म-चर्वण से परे वे कभी गए ही नहीं!] मैंने हर दौड़ में उन्हें पीछे छोड़ा हर मैदान में पछाड़ा, उन्होंने मेरा पीछा नहीं छोड़ा मैं कच्चे सूत पर चलकर भर लाई घड़ों पानी वे किनारे पर ही ऊभ-चूभ हैं!! O

April 16

गर्भभार

गर्भभार


सँभलकर, बहुरिया,
त्रिशला देवी के सोलहों सपनों का सच
तेरे गर्भ में है.


नहीं,
दिव्यता का आलोक
केवल तीर्थंकरों की माताओं के ही
आनन पर नहीं विराजता ;
हर बेटी, हर बहू
जब गर्भ भार वहन करती है
उतनी ही आलोकित होती है.


हिरण्यगर्भ है
हर स्त्री.
उसके भीतर प्रकाश उतरता है,
प्रभा उभरती है,
प्रभामंडल जगमगाते हैं.
प्रकाश फूटता है
उसी के भीतर से.

प्रकाश सोया रहता है
हर लड़की के घट में,
और जब वह माँ बनती है
नहा उठती है
अपने ही प्रकाश में,
अपनी प्रभा में.
अपने प्रभामंडल में.


सँभलकर, बहुरिया,
तेरे अंग अंग से किरणें छलक रही हैं!



-ऋषभ देव शर्मा


Posted to Beyond The Second Sex (स्त्रीविमर्श)

March 17

बनाया था माँ ने वह चूल्हा



बनाया था माँ ने वह चूल्हा


चिकनी पीली मिट्टी को
कुएँ के मीठे पानी में गूँथ कर
बनाया था माँ ने वह चूल्हा
और पूरे पंद्रह दिन तक
तपाया था जेठ की धूप में
दिन - दिन भर



उस दिन
आषाढ़ का पहला दौंगड़ा गिरा,
हमारे घर का बगड़
बूँदों में नहा कर महक उठा था,
रसोई भी महक उठी थी -
नए चूल्हे पर खाना जो बन रहा था.



गाय के गोबर में
गेहूँ का भुस गूँथ कर
उपले थापती थी माँ बड़े मनोयोग से
और आषाढ़ के पहले
बिटौड़े में सजाती थी उन्हें
बड़ी सावधानी से .



बूँदाबाँदी के बीच बिटौड़े में से
बिना भिगोए उपले लाने में
जो सुख मिलता था ,
आज लॉकर से गहने लाने में भी नहीं मिलता.



सूखे उपले
भक्क से पकड़ लेते थे आग
और
उँगलियों को लपटों से बचाती माँ
गही में सेंकती थी हमारे लिए रोटी
- फूले फूले फुलके.



गेहूँ की रोटी सिंकने की गंध
बैठक तक ही नहीं , गली तक जाती थी.
हम सब खिंचे चले आते थे
रसोई की ओर.



जब महकता था बारिश में बगड़
और महमहाती थी गेहूँ की गंध से रसोई -
माँ गुनगुना उठती थी
कोई लोकगीत - पीहर की याद का.



माँ के गीतों में प्यार बहुत था
पर पीड़ा और शिकायत भी थी.



बारिश में बना रही हूँ रोटियाँ,
भीगे झोंके भीतर घुसे आते हैं.
मेरे बीरा ! इन झोंकों को रोक दे न !
बड़े बदमाश हैं ये झोंके,
कभी आग को बढ़ा देते हैं
कभी बुझा देते हैं आग को.



आग बढ़ती है
तो रोटी जलने लगती है.
तेरे बहनोई को जली रोटी पसंद नहीं रे!
रोटी को बचाती हूँ तो उँगली जल जाती है.



माँ की उँगलियाँ छालों से भर जाती थीं
पर पिताजी की रोटी पर एक भी काला निशान कभी नहीं दिखा!



माँ के गीतों में प्यार बहुत था
पर पीड़ा और शिकायत भी थी.



बारिश में बना रही हूँ रोटियाँ,
भीगे झोंके भीतर घुसे आते हैं.
मेरे बीरा ! इन झोंकों को रोक दे न !
बड़े बदमाश हैं ये झोंके ,
कभी आग को बढ़ा देते हैं
कभी बुझा देते हैं आग को.



आग बुझती है
तो रोटी फूलती नहीं
तेरा भानजा अधफूली रोटी नहीं खाता रे!
बुझी आग जलाती हूँ तो आँखें धुएँ से भर जाती हैं.



माँ की आँखों में मोतियांबिंद उतर आया
पर मेरी थाली में कभी अधफूली रोटी नहीं आई!



माँ के गीतों में प्यार बहुत था
पर पीड़ा और शिकायत भी थी.



रोटी बनाना सीखती मेरी बेटी
जब तवे पर हाथ जला लेती है,
आँखें मसलती
रसोई से निकलती है.
तो लगता है
माँ आज भी गुनगुना रही है .



मेरे बीरा ! इन झोंकों को रोक दे न!
बड़े बदमाश हैं ये झोंके,
कभी आग को बढ़ा देते हैं
कभी बुझा देते हैं आग को.



माँ के गीतों में प्यार बहुत था
पर पीड़ा और शिकायत भी थी.



- ऋषभ देव शर्मा


Beyond The Second Sex (स्त्रीविमर्श)

 

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