rishabha's profileऋषभ की कविताएँPhotosBlogListsMore Tools Help

ऋषभ की कविताएँ

जीवन बहुत बहुत छोटा है,लम्बी है तकरार!और न खींचो रार!! -ऋषभ
August 23

जाने कैसी स्त्री थी वह

जाने कैसी स्त्री थी वह

जाने कैसी स्त्री थी वह , कितनी धीर , कितनी सबल ! कैसे कहा होगा उसने माता पिता से, पीहर और ससुराल से - - नहीं ,मुझे यह विवाह स्वीकार नहीं - न, मैं नहीं मानती बालपने की शादी को - गुडिया के खेल तक की समझ न थी मुझे विवाह की समझ कैसे होती - आपका दिया यह पति मेरा पति नहीं ! कैसे टटोला होगा अपने आप को जवाब दिया होगा दुनिया को - - बंधन है बिना प्रेम का विवाह और मुझे अस्वीकार - कोई पुरुष दीखा ही नहीं प्रेम के योग्य ; एक परमपुरुष के सिवा - वह आलोकसुंदर परमपुरुष ही मेरा प्रियतम है ! कैसे किया होगा सामना तन मन को बींधती ज़हरबुझी नज़रों का , नकारा होगा अध्यात्म का भी आकर्षण तोड़कर शृंखला की कड़ियाँ सारी भारी - - स्त्री पुरुष में जो भेद करे वह धर्म मेरा नहीं - स्त्री जाति से जो भयभीत हो वह गुरु मेरा नहीं ! कैसे बाँटा होगा उसने अपने अस्तित्व को अपने स्वयं रचे परिवार में - किसी विधवा नौकरानी को किसी सेवक को किसी जिज्ञासु को किसी गाय, किसी गिलहरी , किसी मोरनी को ! उसने जीते जी मुक्ति अर्जित की विराटता सिरजी - कभी बदली कभी दीप कभी कीर बनकर. उसी ने दिखाया मुक्ति का मार्ग मेरी स्त्री को संपूर्ण आत्मदान के बहाने न्यस्त करके स्वयं को सर्वजन की आराधना में . वह सच ही महादेवी थी !!

हे अग्नि!

हे अग्नि! हे अग्नि! तुम्हें प्रणाम करते हैं हम। बहुत क्षमता है तुममें बड़ा ताप है - बड़ी जीवंतता। तुम जल में भी सुलगती हो और वायु में भी, भूगर्भ में भी तुम्हीं विराजमान हो और व्यापती हो आकाश में भी तुम। हमारे अस्तित्व में अवस्थित हो तुम प्राण बनकर। परमपावनी! तुममें अनंत संभावनाएँ हैं तुम्हीं से पवित्रता है इस जगत में। फूँकती हो तुम सारे कलुष को, शोधती हो फिर-फिर हिरण्यगर्भ ज्ञान की शिखा को। तुम ही तो जगती हो हमारे अग्निहोत्र में और आवाहन करते हैं तुम्हारा ही तो संध्या के दीप की लौ में हम। जगो, आज फिर, खांडवप्रस्थ फैला है दूर-दूर डँसता है प्रकाश की किरणों को, फैलाता है अँधेरे का जाल उगलता है भ्रम की छायाओं को। उठो, तुम्हें करना है छायाओं में छिपे सत्य का शोध। तुम चिर शोधक हो, हे अग्नि! तुम्हें प्रणाम करते हैं हम।

July 30

राधा क्या चाहे


राधा क्या चाहे 


''राधिके!''
''हूँ?''
''भला क्या तो है तेरे कान्हा में?''
''पता नहीं.''


''पौरुष?''
''होगा.
बहुतों में होता है.''


''सौंदर्य?''
''होगा.
पर वह भी बहुतों में है.''


''प्रभुता?''
''होने दो.
बहुतों में रही है.''


''फिर क्यों खिंची जाती है तू
बस उसी की ओर?''
''उसे मेरी परवाह है न!''

http://streevimarsh.blogspot.com/2009/07/blog-post_17.html

July 15

अम्मा, ग़रज़ पड़ै चली आओ चूल्हे की भटियारी !

 

दो बेटे हैं मेरे.
बहुत प्यार से धरे थे मैंने
इनके नाम - बलजीत और बलजोर!

गबरू जवान निकले दोनों ही.
जब जोट मिलाकर  चलते,
सारे गाँव की छाती पर साँप लोट जाता.
मेरी छातियाँ उमग उमग पड़तीं.
मैं बलि बलि जाती
अपने कलेजे के टुकडों की!

वक़्त बदल गया.
कलेजे के टुकडों ने
कलेजे के टुकड़े कर दिए.
ज़मीन का तो बँटवारा किया ही,
माँ भी बाँट ली!

ज़मीन के लिए लड़े दोनों
      - अपने अपने पास रखने को,
माँ के लिए लड़े दोनों
     - एक दूसरे के मत्थे मढ़ने को!

बलजोर ने बरजोरी लगवा लिया अँगूठा 
तो माँ उसके काम की न रही,
बलजीत के भी तो किसी काम की न रही!

दोनों ने दरवाजे बंद कर लिए,
मैं बाहर खड़ी तप रही हूँ भरी दुपहरी;
                    दो जवान बेटों की माँ!

जीवन भर रोटी थेपती आई.
आज भी जिसका चूल्हा झोंकूँ,
रोटी दे दे ...शायद!

June 16

गाड़िया लुहारिन का प्रेम गीत



पिता ने संडासी जैसे दृढ़ हाथों से
बड़ी संडासी में
पकड़ रखा है तपता हुआ लौहखंड
जकड़कर.

माँ धौंक रही
हवा से फुलाकर
धौंकनी लगातार.

भट्टी तप रही.
दुपहरी भी तप रही.
तप रहे हम दोनों.

मैं और तुम
आमने - सामने,
तुम्हारे हाथ में घन,
मेरे हाथ में भी
उतना ही भारी घन.

पिता ने भरी हुंकारी.
उठे दोनों घन.
चक्राकार घूमे हवा में.
दनादन पड़ने लगे
तपते लौहखंड पर
एक के बाद एक,
क्रम से,
दुगुने दम से.

तुम्हारी आँखें मेरी आँखों में,
मेरी आँखें तुम्हारी आँखों में.
त्राटक! मारणमन्त्र! सम्मोहन!
लोहा पिटता रहा,
कुटता रहा,
ढलता रहा.
साँस फूलती रही
मेरी भी
तुम्हारी भी.

एक गोले में घिरे हम.
सब घेरकर पुकार रहे
तुम्हें उकसाते हुए,
मुझे शाबासी देते हुए.

घन बिजली की तरह चले.
चिंगारियाँ फूटीं.
साँस फूलती रही.
पसीना चू पड़ा तुम्हारी झबरी मूँछों से.
तरबतर हो गई मेरी छींट की कोरी अँगिया.

ढल गया लोहा.
बन गया औजार.
पिता ने डाल दिया पानी में
बुझने को.

चिहुँक उठा सारा कबीला.
न तुम हारे
न मैं हारी,
न तुम जीते
न मैं जीती.
तुम्हारा पौरुष
मेरे बल से टकराकर
हो गया दुगुना.

पंचों ने हमारी शादी तय कर दी है!

लोहा एक बार फिर
लोहे से टकरा रहा है.
आग के फूल खिल रहे हैं
मेरी नज़रों में,
तेरी निगाहों में.

सच में तू मेरी जोट का है !

http://streevimarsh.blogspot.com/2009/06/blog-post_14.html
 

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